
भारतीय मनोरंजन जगत और सोशल मीडिया पर इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानूनी विवादों को लेकर एक नया भूचाल आया हुआ है। मशहूर स्टैंड-अप कॉमेडियन प्रणित मोरे (Pranit More) से जुड़ा ‘370 रुपये की बिरयानी’ वाला विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) तक जा पहुंचा है। इस चर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए याचिका पर नोटिस जारी किया है। एक तरफ जहां इस कानूनी पचड़े ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है, वहीं दूसरी तरफ कॉमेडियन प्रणित मोरे ने अपनी सफाई में एक बहुत बड़ा खुलासा करते हुए कहा है कि उनकी टीम ने बिना उनकी जानकारी और अनुमति के वह विवादित वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया था। आइए इस पूरे मामले के हर एक पहलू और कानूनी कानूनी दांव-पेच को गहराई से समझते हैं।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रणित मोरे के एक शो या वीडियो क्लिप से जुड़ा अंश तेजी से वायरल होने लगा। वीडियो में कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए बयानों और संदर्भों को लेकर कुछ सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। आलोचकों का तर्क था कि इस तरह की कॉमेडी से धार्मिक या वैचारिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है, जिसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में कानूनी शिकायतें दर्ज कराई जाने लगीं। जब इस मामले में स्थानीय अदालतों और उच्च स्तर पर कानूनी शिकंजा कसने लगा, तो कॉमेडियन को अपनी कानूनी सुरक्षा और राहत के लिए देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
प्रणित मोरे द्वारा दायर की गई विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझा है। अदालत ने इस प्रकरण में संबंधित पक्षों और अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और फैसला आने वाले समय में डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स, स्टैंड-अप कॉमेडियंस और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं तय करने में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है। अदालत यह तय करेगी कि ऑनलाइन कंटेंट के लिए सीधे तौर पर क्रिएटर कितना जवाबदेह है और क्या इस पर आपराधिक कार्रवाई जायज है या नहीं।
इस पूरे विवाद के तूल पकड़ने के बाद प्रणित मोरे ने अपनी सफाई में एक चौंकाने वाला बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विवाद का कारण बना वह वीडियो उन्होंने खुद अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर पोस्ट नहीं किया था। कॉमेडियन के मुताबिक, उनकी डिजिटल टीम और सोशल मीडिया मैनेजर्स ने बिना उनकी अनुमति, जानकारी या समीक्षा के उस हिस्से को ऑनलाइन अपलोड कर दिया था। जैसे ही उन्हें इस बात का अहसास हुआ, वीडियो को तुरंत हटा भी लिया गया था। मोरे का कहना है कि उनका इरादा किसी की भावनाओं को आहत करने का बिल्कुल नहीं था और उनकी टीम की तकनीकी चूक के कारण उन्हें इस अनचाहे कानूनी विवाद का सामना करना पड़ रहा है।
इस घटना ने डिजिटल कंटेंट क्रिएशन की दुनिया में एक बहुत ही गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। आज के समय में अधिकांश बड़े कलाकारों और इन्फ्लुएंसर्स के पास अपनी रीच बढ़ाने और वीडियो एडिट करने के लिए पूरी टीमें होती हैं, जो उनके अकाउंट्स को हैंडल करती हैं। लेकिन इस तरह की चूक होने पर कानूनी गाज सीधे मुख्य कलाकार पर ही गिरती है। यह मामला इस बात की सीख देता है कि कलाकारों को अपनी टीम के साथ काम करते समय कंटेंट की फाइनल मॉडरेशन और अप्रूवल प्रक्रिया को कितना सख्त रखना चाहिए। जैसे-जैसे सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अदालत इस तकनीकी और रचनात्मक जिम्मेदारी के संतुलन को किस रूप में परिभाषित करती है।









