
रायपुर, 23 जुलाई 2026

घने जंगल, ऊँचे पहाड़, उफान पर नदियाँ-नाले और 40 से 50 किलोमीटर की थका देने वाली पैदल यात्रा… वर्षों से छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के ग्रामीणों के लिए सरकारी राशन पाना किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं था। दो से तीन दिन का लंबा सफर तय करने के बाद ही उन्हें अपने हिस्से का अनाज नसीब होता था। बारिश के दिनों में तो कई गाँव बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाते थे, जिससे राशन पहुँचना लगभग असंभव हो जाता था।
लेकिन आज, नारायणपुर जिला प्रशासन की एक अभिनव सोच ने अबूझमाड़ की इस पुरानी और दुखद तस्वीर को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।
दुर्गम रास्तों पर ट्रैक्टर बना जन-सेवा का सारथी
कलेक्टर के नेतृत्व में जिला प्रशासन ने पारंपरिक परिवहन व्यवस्था की सीमाओं को तोड़ते हुए श्ट्रैक्टर आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) मॉडल की शुरुआत की। ओरछा क्षेत्र के थुलथुली, गोमागाल, मुरूमवाड़ा, आदेर, जाटलूर, जटवर, बालेबेड़ा, हांदावाड़ा और पीडियाकोट जैसे गाँव, जो दशकों से बुनियादी सड़क और परिवहन सुविधाओं के तरस रहे थे, वहाँ मुख्य गोदामों से सीधे ट्रैक्टरों के जरिए 35 किलोग्राम चावल और आवश्यक खाद्यान्न पहुँचाया जा रहा है। जहाँ बड़ी गाड़ियाँ और ट्रक घुटने टेक देते थे, वहाँ ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट ने विकास की नई आहट दी है।
मुख्य गोदामों से सीधे ट्रैक्टरों द्वारा सुदूर गाँवों तक राशन की सीधी आपूर्ति। मानसून की दस्तक से पहले ही गाँवों में 3 से 4 महीने का खाद्यान्न अग्रिम रूप से सुरक्षित किया गया। ग्राम पंचायत स्तर पर नए पीडीएस भवनों का निर्माण और हर गाँव के लिए समर्पित नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की गई।
राशन कार्ड बना अधिकार का सशक्त प्रतीक
अबूझमाड़ के ग्रामीणों का कहना है कि जब पहली बार राशन से लदा ट्रैक्टर हमारे गाँव पहुँचा, तो लगा जैसे केवल अनाज नहीं आया, बल्कि सरकार का भरोसा और सुरक्षा हमारे द्वार पर पहुँची है। इस पहल ने न केवल ग्रामीणों को दिन-रात के थकाऊ सफर से मुक्ति दिलाई है, बल्कि उनके समय, श्रम और आत्म-सम्मान की भी रक्षा की है। अब उनके लिए राशन कार्ड सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि समय पर मिलने वाले उनके हक और अधिकार की गारंटी बन चुका है।
नारायणपुर जिला प्रशासन का यह ट्रैक्टर मॉडल सिर्फ खाद्यान्न आपूर्ति की एक व्यवस्था भर नहीं है, बल्कि यह संवेदनशीलता, दृढ़ इच्छाशक्ति और अंतिम व्यक्ति तक पहुँच के राज्य सरकार के संकल्प का सशक्त उदाहरण है। अबूझमाड़ के बीहड़ों में ट्रैक्टर के पहियों से लिखी गई यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे बुलंद हों, तो नवाचार के जरिए दुर्गम से दुर्गम बाधाओं को भी पार किया जा सकता है।








