September 14, 2026 4:32 pm

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पाकिस्तान के धोखे के बाद इजरायल की शरण में पहुंचा सऊदी अरब, हूती विद्रोहियों का खात्मा करने के लिए MBS ने मांगी मदद

मध्य पूर्व (Middle East) के बेहद संवेदनशील और तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच एक ऐसी चौंकाने वाली और सनसनीखेज खबर सामने आई है, जिसने पूरी दुनिया के कूटनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। खाड़ी देशों के सबसे ताकतवर मुल्क सऊदी अरब और लंबे समय से कट्टर दुश्मन माने जाने वाले यहूदी देश इजरायल के बीच अंदरखाने एक बहुत बड़ा रणनीतिक समझौता पक रहा है। हालिया खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान द्वारा यमन संकट और हूती विद्रोहियों के मुद्दे पर कथित तौर पर पीठ पीछे धोखा दिए जाने के बाद, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को बचाने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अब इजरायल की शरण ली है। रियाद ने लाल सागर और अपने तेल भंडारों पर लगातार मंडरा रहे हूतियों के खौफनाक खतरों को नेस्तनाबूद करने के लिए इजरायल से सैन्य और खुफिया मदद की गुहार लगाई है, जिसने वैश्विक राजनीति के पुराने सभी समीकरणों को पूरी तरह से उलट कर रख दिया है।

कुछ समय पहले तक सऊदी अरब अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य साजो-सामान के लिए मुख्य रूप से पाकिस्तान और अन्य पारंपरिक मुस्लिम सहयोगियों पर आंख मूंदकर भरोसा करता था। लेकिन हाल ही में जब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब के अहम तेल प्रतिष्ठानों और शहरों को निशाना बना रहे थे, तब पर्दे के पीछे पाकिस्तान की तरफ से अपनाई गई दोहरी कूटनीति और असहयोगात्मक रुख ने रियाद के हुक्मरानों को झकझोर कर रख दिया। सऊदी नेतृत्व को यह अहसास हो गया कि संकट के वक्त जिन देशों को वे अपना पक्का इस्लामिक भाई मानते थे, वे घरेलू राजनीति या अन्य मजबूरियों के चलते उनकी रक्षा करने से पीछे हट रहे हैं। इसी कूटनीतिक अलगाव और भरोसे के टूटने की वजह से सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस MBS को अपनी पारंपरिक प्राथमिकताओं को दरकिनार कर उन देशों की तरफ देखना पड़ा, जिनके पास इस समय आधुनिक सैन्य तकनीक और सटीक खुफिया जानकारी मौजूद है।

इजरायल दुनिया का वह देश है जिसकी खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ (Mossad) और अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम (जैसे आयरन डोम और एरो सिस्टम) की ताकत का लोहा पूरी दुनिया मानती है। हूती विद्रोही जिस तरह से उन्नत किस्म के ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल करके सऊदी अरब और लाल सागर के समुद्री मार्गों को तबाह कर रहे हैं, उसका मुकाबला करने के लिए पारंपरिक हथियारों से काम नहीं चल रहा था। सऊदी अरब को अब यह अच्छी तरह समझ आ चुका है कि यदि उसे अपनी अर्थव्यवस्था और तेल के बुनियादी ढांचे को बचाना है, तो उसे दुनिया की सबसे बेहतरीन एंटी-ड्रोन और रडार तकनीक हासिल करनी होगी, जो केवल इजरायल के पास उपलब्ध है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच खुफिया चैनलों के माध्यम से उच्च स्तरीय बातचीत का दौर शुरू हो चुका है, जहां इजरायल सऊदी अरब को हूतियों के ठिकानों का सटीक ठिकाना ढूंढने और उन्हें हवा में ही नेस्तनाबूद करने के लिए तकनीकी सहायता प्रदान करने पर विचार कर रहा है।

यद्यपि सऊदी अरब और इजरायल के बीच अभी तक औपचारिक रूप से राजनयिक संबंध (Diplomatic Relations) स्थापित नहीं हुए हैं, लेकिन ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ (Abraham Accords) के बाद से मध्य पूर्व में दोनों देशों के बीच अनौपचारिक और सामरिक सहयोग की जमीन तैयार हो चुकी थी। पाकिस्तान जैसे देशों से मिलने वाले रणनीतिक झटकों ने इस प्रक्रिया को और अधिक तेज कर दिया है। खाड़ी देशों के मीडिया और अंतरराष्ट्रीय खुफिया सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आ रही है कि खाड़ी के एक गुप्त स्थान पर सऊदी और इजरायली सैन्य अधिकारियों के बीच कई दौर की गोपनीय बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें हूती विद्रोहियों के कमांड सेंटर्स को जॉइंट ऑपरेशन के तहत तबाह करने का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया है। सऊदी अरब के लिए यह कदम उठाना आसान नहीं था क्योंकि घरेलू जनता और इस्लामिक दुनिया की प्रतिक्रिया का डर हमेशा बना रहता है, लेकिन देश की संप्रभुता और आर्थिक सुरक्षा के आगे अब रियाद ने व्यावहारिक कूटनीति (Pragmatic Diplomacy) को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है।

सऊदी अरब और इजरायल की यह बढ़ती नजदीकियां ईरान और उसके क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठनों (जैसे हूती, हिजबुल्लाह और हमास) के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। ईरान जो अब तक यह समझता था कि इस्लामिक देशों के बीच आपसी मतभेदों और फिलिस्तीन के मुद्दों पर सऊदी अरब कभी भी इजरायल के करीब नहीं जा सकता, उसका यह भ्रम अब पूरी तरह से टूट चुका है। इसके साथ ही, इस पूरी घटना ने पाकिस्तान की क्षेत्रीय प्रासंगिकता को एक बहुत बड़ा धक्का पहुंचाया है, क्योंकि जो देश कभी खाड़ी की सुरक्षा का ठेकेदार हुआ करता था, आज वह खुद अपनी अविश्श्वसनीयता के कारण हाशिए पर धकेल दिया गया है। आने वाले दिनों में यदि सऊदी अरब और इजरायल का यह सुरक्षा गठबंधन औपचारिक रूप से जमीन पर उतरता है, तो मध्य पूर्व का नक्शा और वहां की भू-राजनीति हमेशा के लिए बदल जाएगी, जिसका असर भारत सहित पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों पर स्पष्ट रूप से देखने को मिलेगा।

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