September 28, 2026 2:20 am

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बीजों की कोठरी में सहेजी है पीढ़ियों की खुशहाली, मझगवां के आदिवासी परिवारों ने बचाकर रखी देसी अनाज की विरासत

भोपाल

खुशियों की दास्तां

शहडोल जिले के मझगवां गांव के सलैया टोला में रहने वाले आदिवासी परिवारों के लिए अनाज सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि उनकी पीढ़ियों की पहचान, परंपरा और खुशियों का आधार है। घर की कोठरियों में सहेजे गए छोटे-छोटे बीज उनके लिए किसी खजाने से कम नहीं हैं। इन्हीं बीजों से खेतों में फसल लहलहाती है, घर में अनाज आता है और पूरे परिवार की जरूरतें पूरी होती हैं।

आज जब खेती में आधुनिक और हाइब्रिड किस्मों का चलन बढ़ रहा है, वहीं मझगवां के बैगा एवं भूमिया समाज के किसान अपनी पुरानी देसी किस्मों को आज भी संजोए हुए हैं। झोलार, बांसपोर, ठर्री, सरैय्या, गुरमटिया, करन फूल और भेजरी जैसी पारंपरिक धान की किस्में यहां के खेतों में आज भी दिखाई देती हैं। इसी तरह लेदरी कोदो, बासिन कोदो, कोदैली कोदो, बेमेरहा कुटकी, जाली कुटकी, छोटाही कुटकी, भदैली कुटकी, कागुन, समा और मिलो जैसे श्री अन्न भी यहां की खेती और भोजन का हिस्सा हैं।

भोल्ली सिंह के लिए बीज ही असली पूंजी

मझगवां के किसान भोल्ली सिंह ने अपने खेतों में कई पारंपरिक फसलों को बचाकर रखा है। उनके खेत में झोलार धान, बांसपोर, सरैय्या, गुरमटिया, करन फूल और भेजरी जैसी देसी धान की किस्में हैं। साथ ही कोदो, मक्का, मिलो, कागुन, कुटकी, लेदरी कोदो और बासिन कोदो भी उगाए जाते हैं।

भोल्ली सिंह के लिए इन फसलों की खुशी सिर्फ अच्छी पैदावार तक सीमित नहीं है। जब खेत से अनाज घर आता है और परिवार के भोजन में शामिल होता है, तो उन्हें अपनी मेहनत सफल होने का एहसास होता है। वे बताते हैं कि मोटा अनाज उनके रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा है। उनका कहना है कि 60 वर्ष से अधिक उम्र में भी वे 20 से 25 किलोमीटर तक साइकिल चला लेते हैं और पारंपरिक भोजन को अपनी तंदुरुस्ती से जोड़कर देखते हैं।

बिरमतिया बैगा के लिए देसी बीज, अपनी पहचान और अपनी परंपरा

मझगवां के सलैया टोला की बिरमतिया बैगा ने भी अपने खेतों में पारंपरिक अनाज और धान की कई किस्मों को सुरक्षित रखा है। उनके खेत में समा, कुटकी, सिकिया, काकुन, सरैय्या और ठर्री धान जैसी फसलें उगाई जाती हैं। अलग-अलग मौसम में इन फसलों की खेती करना और उनसे प्राप्त अनाज को सुरक्षित रखना उनके परिवार की पुरानी परंपरा का हिस्सा है।

बिरमतिया बैगा के लिए खेत में उगने वाला हर अनाज केवल फसल नहीं है। उसके साथ उनके परिवार की यादें, पुरखों की खेती की पद्धति और वर्षों से चली आ रही खाद्य परंपरा जुड़ी हुई है। वे पुराने बीजों को संभालकर रखती हैं, ताकि अगली फसल के समय इन्हीं बीजों से फिर खेती की जा सके। इस तरह एक मौसम की फसल अगले मौसम के लिए बीज बन जाती है और पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आगे बढ़ती रहती है।

वे बताती हैं कि घर में सुरक्षित रखा अनाज परिवार के भोजन में उपयोग होता है। खेत से निकला अपना धान और मोटा अनाज जब घर की रसोई तक पहुंचता है तो उसमें मेहनत के साथ अपनेपन का एहसास भी जुड़ा होता है। समा, कुटकी, सिकिया और काकुन जैसे अनाज उनके भोजन का हिस्सा हैं, वहीं सरैय्या और ठर्री जैसे पारंपरिक धान की किस्में उनकी खेती की विविधता को बनाए रखती हैं।

बिरमतिया के लिए पुराने बीजों को बचाकर रखना अपनी परंपरा को बचाकर रखने जैसा है। उनका मानना है कि इन बीजों की पहचान गांव के खेतों और परिवारों से जुड़ी है। इसलिए उन्हें सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि आने वाले समय में भी इन पारंपरिक फसलों की खेती होती रहे और नई पीढ़ी इन अनाजों के बारे में जान सके। उनके घर में रखे बीजों की यह छोटी-सी दुनिया इस बात की गवाही देती है कि मझगवां के आदिवासी परिवारों ने आधुनिक खेती के दौर में भी अपनी पारंपरिक फसलों के लिए जगह बनाए रखी है। बिरमतिया के लिए इन बीजों की सबसे बड़ी खुशी यही है कि वे आज भी खेत में बोए जाते हैं, फसल बनकर घर आते हैं और परिवार के भोजन का हिस्सा बनते हैं।

धनवतिया बैगा ने संभाल रखी है बीजों की विरासत

धनवतिया बैगा भी देसी अनाज की खेती और बीज संरक्षण से जुड़ी हैं। उनके खेत में झुंझरु, पैलहाई, बरबट्टी, मक्का, कोदो, कुटकी, कागुन, भदैला कुटकी और सऊटहा कुटकी जैसी फसलें हैं। जब उनसे इन फसलों के बीजों के बारे में पूछा जाता है तो उनका सहज जवाब होता है कि बीज मिल जाएंगे और जो यहां न मिलें, वे आसपास के पहाड़ी गांवों में मिल जाएंगे। यह जवाब बताता है कि यहां बीजों का संरक्षण केवल एक परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि गांव और आसपास के समुदाय की साझा परंपरा है।

सालभर का अनाज, सालभर की निश्चिंतता

इन परिवारों की खुशियों का एक बड़ा कारण उनकी खाद्य आत्मनिर्भरता भी है। वे खेतों में उगाए गए अलग-अलग अनाज को घर में सुरक्षित रखते हैं और सालभर उसका उपयोग करते हैं। धान की देसी किस्म हो या कोदो-कुटकी, कागुन या समा—इनका उपयोग परिवार के भोजन में होता है। फसल घर आने के बाद कोठरी में अनाज का सुरक्षित होना इन परिवारों के लिए आने वाले दिनों की निश्चिंतता भी है। मेहनत से उगाया अपना अनाज, अपने घर का भोजन और अपने ही सुरक्षित किए बीज—यही उनकी खुशहाल जिंदगी की सरल कहानी है।

पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ा रहे किसान

कृषि वैज्ञानिक डॉ. बी.के. प्रजापति के अनुसार मझगवां क्षेत्र के बैगा और भूमिया समाज के किसान प्राचीन काल से मोटे अनाज और पारंपरिक फसलों की खेती करते आ रहे हैं। इन किसानों ने कई पुरानी किस्मों के बीजों को आज भी सुरक्षित रखा है।

मझगवां के किसानों की यह पहल केवल खेती नहीं, बल्कि पारंपरिक कृषि ज्ञान और जैव विविधता को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है। उनके घरों की कोठरियों में रखे ये बीज आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक ऐसी विरासत हैं, जिसे उन्होंने मेहनत, विश्वास और अपनी परंपरा से संभालकर रखा है।

 

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