September 23, 2026 7:53 am

मजबूत आर्थिक ग्रोथ के बावजूद विदेशी निवेशक क्यों निकाल रहे हैं भारतीय बाजार से पैसा, FIIs बिकवाली के 5 बड़े कारण

भारतीय अर्थव्यवस्था आज पूरी दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, और देश के कॉरपोरेट जगत के बुनियादी फंडामेंटल्स भी बेहद मजबूत नजर आ रहे हैं। इसके बावजूद पिछले कुछ समय से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा बाहर निकाले जाने का सिलसिला जारी है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, केवल सितंबर के महीने में ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजारों से करीब 1.7 अरब अमेरिकी डॉलर की भारी-भरकम रकम निकाल ली है। इसके साथ ही वर्ष 2026 में अब तक कुल FPI आउटफ्लो बढ़कर लगभग 26 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जिसने बाजार विश्लेषकों और निवेशकों को गहरी चिंता में डाल दिया है। आइए गहराई से समझते हैं कि मजबूत घरेलू ग्रोथ के बावजूद विदेशी निवेशक आखिर भारत से अपना पैसा क्यों खींच रहे हैं और इसके पीछे कौन से 5 बड़े आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं।

1. लार्ज कैप कंपनियों में टेक्नोलॉजी और भविष्य के बदलावों की सुस्त रफ्तार

वैश्विक ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन (Bernstein) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कई बड़ी और दिग्गज लार्ज कैप कंपनियां (Large Cap Companies) तेजी से बदल रहे वैश्विक तकनीकी और आर्थिक परिदृश्य के हिसाब से खुद को पर्याप्त गति से नहीं ढाल पा रही हैं। निवेशकों के मन में इन बड़ी कंपनियों के मौजूदा और ऊंचे वैल्यूएशंस (Valuations) को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। बर्नस्टीन का कहना है कि भारत की कई पुरानी और स्थापित बड़ी कंपनियां आज भी पुराने आर्थिक दौर के कामकाज के तरीकों पर टिकी हुई हैं और वे मौजूदा ऊंचे वैल्यूएशंस को सही ठहराने के लिए जरूरी ‘हाई ग्रोथ’ देने में विफल हो रही हैं। इसके अलावा कई बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां नए और उभरते क्षेत्रों में भारी जोखिम उठाकर निवेश करने के बजाय अपने पारंपरिक और मौजूदा कारोबार को ही सुरक्षित रखने पर ज्यादा जोर दे रही हैं।

2. इलेक्ट्रिक वाहन और सेमीकंडक्टर जैसे नए क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश की कमी

बड़ी कंपनियों के पास भारी मात्रा में पूंजी (Capital) और नकदी उपलब्ध होने के बावजूद, वे इलेक्ट्रिक वाहन (EV), सेमीकंडक्टर निर्माण (Semiconductor) और डीप-टेक जैसे भविष्य के उभरते हुए टेक्नोलॉजी सेक्टरों में उस स्तर पर बड़े पैमाने पर निवेश (Scale Investment) नहीं कर पा रही हैं जिसकी आज वैश्विक स्तर पर मांग है। कई बड़ी कंपनियां अभी भी सरकारी नीतियों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बचाने वाले संरक्षणवादी उपायों के सहारे टिके रहने की उम्मीद कर रही हैं। हालांकि, रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) और महिंद्रा एंड महिंद्रा (Mahindra & Mahindra) जैसे कुछ बड़े लार्ज कैप समूह इसके अपवाद जरूर हैं, जिन्होंने न्यू एनर्जी, डिजिटल सर्विसेज और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे हाई-ग्रोथ क्षेत्रों में बड़ा निवेश कर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। इसके बावजूद आईटी सेक्टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते असर और राजस्व पर दबाव के कारण कई बड़ी कंपनियों के शेयर अपने 52-हफ्ते के निचले स्तर के आसपास कारोबार कर रहे हैं।

3. लार्ज कैप और मिडकैप कंपनियों की कमाई (Earnings Growth) में बड़ा अंतर

भारतीय ब्रोकरेज फर्म एम्बिट कैपिटल (Ambit Capital) की एक रिपोर्ट में लार्ज कैप और मिडकैप कंपनियों के बीच कमाई की ग्रोथ में एक बड़ा अंतर सामने आया है। आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की जून तिमाही में निफ्टी 50 (Nifty 50) की बड़ी कंपनियों की औसत कमाई में महज 11 प्रतिशत की ग्रोथ दर्ज की गई, जबकि इसके विपरीत मिडकैप कंपनियों की कमाई की ग्रोथ शानदार 31 प्रतिशत तक पहुंच गई। देश की मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियां मैन्युफैक्चरिंग, फिनटेक, कंज्यूमर टेक्नोलॉजी और नए जमाने के डिजिटल क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। हालांकि, बड़ी संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) के लिए इन मिडकैप कंपनियों में बड़े पैमाने पर पैसा लगाना आसान नहीं होता, क्योंकि इनमें फ्री-फ्लोट और लिक्विडिटी कम होती है और उनका एनालिस्ट कवरेज भी सीमित रहता है।

 4. लगातार ऊंची बनी हुई अमेरिकी बॉन्ड यील्ड (US Bond Yields) का दबाव

जेएम फाइनेंशियल (JM Financial) के वाइस-चेयरमैन विशाल कामपाणी के अनुसार, भारतीय बाजारों से लगातार हो रहे FPI आउटफ्लो के पीछे घरेलू कारणों के साथ-साथ अमेरिका में लगातार ऊंची बनी हुई बॉन्ड यील्ड भी एक मुख्य वजह है। वैश्विक निवेशकों के लिए अमेरिकी बॉन्ड सुरक्षित निवेश विकल्प बन जाते हैं जब वहां रिटर्न आकर्षक मिलता है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी माना कि भारतीय शेयर बाजार के कुछ खास हिस्सों में वैल्यूएशंस शॉर्ट-टर्म के लिहाज से काफी आगे निकल चुके थे, जिसके चलते करेक्शन स्वाभाविक था। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में यूरोप और उत्तर एशिया (North Asia) के निवेशकों की मजबूत रुचि के चलते विदेशी पूंजी का प्रवाह फिर से भारतीय बाजारों की ओर लौट सकता है।

5. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बढ़ता प्रसार और बाजार की धारणा

वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल भारतीय आईटी सेक्टर के लिए एक नई और बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। भारत में अभी तक कोई बड़ा घरेलू ‘AI चैंपियन’ नहीं बन पाया है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के एक वर्ग के बीच भारत को लेकर “एंटी-एआई” (Anti-AI) बाजार की धारणा भी फैलने लगी है। पिछले एक साल में ग्लोबल कैपिटल का बड़ा हिस्सा AI इंफ्रास्ट्रक्चर और एप्लीकेशन डेवलपमेंट की ओर डायवर्ट हुआ है। हालांकि विश्लेषकों का यह भी मानना है कि केवल वैश्विक AI ट्रेड के कमजोर होने या भू-राजनीतिक तनाव थमने से विदेशी पैसा अपने आप भारत नहीं लौट आएगा, बल्कि असली चुनौती यही होगी कि भारत की बड़ी कंपनियां भविष्य की जरूरतों के मुताबिक कितनी तेजी से अपने बिजनेस मॉडल को ट्रांसफॉर्म करती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!