
शिवपुरी के 111 करोड़ के सीवरेज प्रोजेक्ट मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि 111 करोड़ रुपये की भारी बर्बादी और मामला डेढ़ साल से लंबित होने के बावजूद राज्य सरकार पूरी तरह से अनजान है और गहरी नींद (हाइबरनेशन) की स्थिति में है.
कोर्ट ने सरकार के अपर मुख्य सचिव (नगरीय प्रशासन) के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि यह परियोजना खराब योजना और खराब कार्यान्वयन का स्पष्ट उदाहरण है, जिसमें भारी धनराशि खर्च करने के बावजूद उद्देश्य पूरा नहीं हो सका.
सुनवाई के दौरान कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ और निर्देश
- अलका उपाध्याय को नोटिस: हाईकोर्ट ने ईपीसीओ की पूर्व कार्यकारी निदेशक अलका उपाध्याय को नोटिस जारी कर सवाल किया कि जब करोड़ों रुपये बर्बाद होने का खतरा था तो अधूरे प्रोजेक्ट को मंजूरी क्यों दी गई।
- वीके छारी को फटकार: कोर्ट ने चीफ इंजीनियर वीके छारी को अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल बताते हुए फटकार लगाई. सीवेज लीकेज मिलने के बावजूद उन्होंने न तो रिपोर्ट तैयार की और न ही कोई कार्रवाई की.
- हरिओम पर सख्त टिप्पणी: माधव टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक हरिओम द्वारा अधिकारियों को बचाने की कोशिश पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने जांच में सुधार के लिए सात दिन का अंतिम मौका दिया.
- सरकारी वकील की दलील खारिज: कोर्ट ने घाटे की भरपाई अधिकारियों से करने की दलील पर सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि बिना विभागीय जांच के वसूली का कोई कानूनी आधार नहीं है।
- जनता के पैसे की सुरक्षा जरूरी: कोर्ट ने कहा कि सरकारी खजाना जनता की मेहनत की कमाई से बनता है. राज्य तो इसका संरक्षक मात्र है; इसे निजी हितों के लिए बर्बाद नहीं किया जा सकता।
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