
वैदिक सनातन परंपरा में हर दिन का अपना एक विशिष्ट आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व होता है। आज 21 सितंबर 2026, दिन सोमवार है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की इस पावन तिथि पर अत्यंत फलदायी दशावतार व्रत रखा जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार यह पावन दिन जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु के दस दिव्य अवतारों—मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि को समर्पित होता है। मान्यता है कि जो साधक आज के दिन निष्काम भाव से व्रत रखकर भगवान के दशावतार स्वरूप का ध्यान करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और जीवन में हर प्रकार के संकट से मुक्ति मिलती है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या शुभ काम की शुरुआत करने से पहले पंचांग के माध्यम से शुभ और अशुभ मुहूर्तों का ज्ञान होना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि आज सुबह के समय ही राहुकाल का प्रभाव रहेगा।
आज सोमवार का दिन होने से भगवान शिव और चंद्र देव की कृपा का भी शुभ संयोग बन रहा है। पंचांग के अनुसार आज का खगोलीय और ज्योतिषीय विवरण इस प्रकार है:
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संवत: विक्रम संवत 2083, शक संवत 1948
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मास: भाद्रपद (भादों)
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पक्ष: शुक्ल पक्ष
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तिथि: दशमी तिथि (भगवान विष्णु के दशावतार पूजन के लिए सर्वोत्तम)
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वार: सोमवार (चंद्रमा और शिवजी का दिन)
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नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा / श्रवण नक्षत्र का शुभ प्रभाव
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योग: शोभन / सुकर्मा योग का संयोग
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करण: गर और वणिज करण
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सूर्योदय का समय: प्रातः 06:09 बजे
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सूर्यास्त का समय: सायं 06:19 बजे
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चंद्रमा की स्थिति: मकर राशि में संचार (शनि की राशि में चंद्र का प्रभाव)
वैदिक ज्योतिष में राहुकाल को अत्यंत अशुभ और दूषित समय माना जाता है। किसी भी नए व्यवसाय की शुरुआत, गृह प्रवेश, विवाह, बड़ा वित्तीय निवेश, सोने-चांदी की खरीदारी या मांगलिक कार्यों के संकल्प को राहुकाल के दौरान टालना चाहिए।
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राहुकाल का समय: प्रातः 07:40 बजे से लेकर 09:12 बजे तक रहेगा।
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यमगंड काल: प्रातः 10:43 बजे से दोपहर 12:14 बजे तक।
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गुलिक काल: दोपहर 01:46 बजे से 03:17 बजे तक।
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दिशाशूल: सोमवार के दिन पूर्व दिशा में दिशाशूल माना जाता है। यदि पूर्व दिशा में यात्रा करना अत्यंत आवश्यक हो, तो घर से निकलने से पहले दर्पण देखकर या थोड़ा सा दूध/शहद ग्रहण करके ही यात्रा शुरू करनी चाहिए।
यदि आपको किसी नए प्रोजेक्ट की शुरुआत करनी है, धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करना है या कोई महत्वपूर्ण फैसला लेना है, तो दिन के शुभ मुहूर्तों का उपयोग करना सर्वोत्तम रहेगा:
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ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:34 बजे से 05:22 बजे तक (साधना, मंत्र जाप और ईश्वर वंदना के लिए सर्वश्रेष्ठ)।
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:50 बजे से दोपहर 12:38 बजे तक (इस समय में किए गए कार्यों में बिना बाधा के सफलता मिलती है)।
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विजय मुहूर्त: दोपहर 02:16 बजे से दोपहर 03:04 बजे तक।
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गोधूलि मुहूर्त: सायं 06:07 बजे से सायं 06:31 बजे तक (संध्या वंदन और मुख्य द्वार पर दीपक जलाने के लिए सर्वोत्तम)।
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अमृत काल: प्रातःकाल और शाम के समय का वह कालखंड जो पूजा-पाठ को अक्षय फलदायी बनाता है।
दशावतार व्रत का संबंध सृष्टि की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए भगवान विष्णु द्वारा अलग-अलग युगों में लिए गए अवतारों से है। इस दिन साधक को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होना चाहिए। स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करके तांबे के लोटे से सूर्य देव को अर्घ्य दें।
घर के मंदिर में चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा या दशावतार की तस्वीर स्थापित करें। गंगाजल से अभिषेक करें और पीले चंदन, पीले फूल, तुलसी दल, अक्षत और पीले फलों का भोग लगाएं। इसके बाद भगवान के दस अवतारों के नामों का स्मरण करते हुए ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ महामंत्र की कम से कम एक माला जाप करें।
शाम के समय आरती के बाद फलाहार ग्रहण करें और अन्न का त्याग रखें। जो लोग पूर्ण व्रत नहीं रख पाते, वे भी आज के दिन भगवान विष्णु के दशावतार स्तोत्र का पाठ करके विशेष आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।









