September 29, 2026 4:05 am

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एमएलसी चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम पर भाजपा क्यों बरत रही है बेहद सावधानी

बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के उभार और उनकी आक्रामक राजनीतिक सक्रियता के बाद से राज्य के सभी प्रमुख दलों ने अपनी कार्यशैली में भारी बदलाव करना शुरू कर दिया है। इसी सियासी सरगर्मी के बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) आगामी विधान परिषद (MLC) चुनावों के लिए अपने उम्मीदवारों के चयन को लेकर बेहद फूंक-फूंक कर और सावधानी से कदम बढ़ा रही है। पार्टी के भीतर इस बात को लेकर गहन मंथन चल रहा है कि किस चेहरे को मैदान में उतारा जाए ताकि किसी भी प्रकार की एंटी-इन्कंबेंसी या अंदरूनी कलह का सामना न करना पड़े। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या यह सतर्कता प्रशांत किशोर द्वारा लगातार बनाई जा रही राजनीतिक दबाव की स्थिति का परिणाम है, या फिर यह एनडीए की किसी सोची-समझी बड़ी चुनावी रणनीति का हिस्सा है जो सही समय पर अपने पत्तों का खुलासा करेगी।

बिहार के कोने-कोने में प्रशांत किशोर द्वारा चलाई जा रही पदयात्राओं और आम जनता के बीच सीधे संवाद ने पारंपरिक राजनीतिक दलों की पेशानी पर बल ला दिया है। बीजेपी जैसे बड़े संगठन के रणनीतिकार भी इस बात को भली-भांति समझ रहे हैं कि अब जनता केवल जातिगत समीकरणों के भरोसे वोट देने वाली नहीं है, बल्कि वह सुशासन, पारदर्शिता और विकास के पुख्ता विकल्प की तलाश में है। यही कारण है कि एमएलसी चुनावों जैसे महत्वपूर्ण मंच पर किसी भी दांव को चलने से पहले पार्टी आलाकमान राज्य के हर एक जिले की जमीनी रिपोर्ट को बारीकी से खंगाल रहा है। विपक्ष की हर चाल और जन सुराज की बढ़ती मुखरता के बीच भाजपा यह सुनिश्चित करना चाहती है कि उसका हर एक उम्मीदवार पूरी तरह से बेदाग और जिताऊ साबित हो, ताकि किसी भी मोर्चे पर मात न खानी पड़े।

विधान परिषद के आगामी चुनावों को लेकर भाजपा कार्यालयों में बैठकों का दौर लगातार जारी है, लेकिन अभी तक आधिकारिक तौर पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा न होना इस बात का प्रमाण है कि पार्टी इस बार कोई भी जोखिम उठाने के मूड में नहीं है। टिकट चाहने वाले तमाम दावेदार पटना से लेकर दिल्ली तक अपनी गोटी बिछाने में जुटे हुए हैं, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश के वरिष्ठ पदाधिकारी हर एक नाम की स्क्रूटनी बेहद कड़े मानदंडों के आधार पर कर रहे हैं। उम्मीदवारों की सूची में देरी होने के पीछे मुख्य वजह यह भी बताई जा रही है कि पार्टी जातीय संतुलन, स्थानीय प्रभाव और बौद्धिक वर्ग की स्वीकार्यता—तीनों पैमानों पर शत-प्रतिशत खरा उतरने वाले चेहरे को ही मैदान में उतारना चाहती है। इस सस्पेंस ने जहां एक तरफ पार्टी के भीतर उत्सुकता बढ़ा दी है, वहीं विरोधी दलों को भी कशमकश में डाल रखा है कि आखिर भाजपा का अगला तुरुप का इक्का कौन होगा।

बिहार में एनडीए गठबंधन के भीतर भी सीटों के तालमेल और उम्मीदवारों के चयन को लेकर आपसी संवाद और समन्वय का दौर पूरी गंभीरता से चल रहा है। भाजपा अकेले अपने दम पर कोई भी जल्दबाजी दिखाने के बजाय अपने सहयोगियों के साथ मिलकर एक ऐसा फूलप्रूफ प्लान तैयार करने में जुटी है जो चुनाव के अंतिम परिणामों को पूरी तरह से प्रभावित कर सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर के आने से भले ही राजनीतिक समीकरणों में नयापन आया हो, लेकिन एनडीए के पास प्रशासनिक अनुभव और मजबूत कैडर बेस की जो ताकत है, वह उसे हर चुनौती से निपटने की क्षमता प्रदान करती है। एमएलसी चुनाव का यह रण इस बात की स्पष्ट बानगी पेश करेगा कि क्या पारंपरिक दलों की रणनीति नए राजनीतिक विकल्पों पर भारी पड़ती है या फिर समीकरणों में कोई बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिलता है।

भाजपा इस चुनाव में केवल शीर्ष नेतृत्व के फैसलों पर निर्भर रहने के बजाय जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और स्थानीय पदाधिकारियों के फीडबैक को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दे रही है। पार्टी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि यदि टिकट वितरण में जरा भी चूक हुई, तो भीतरघात का खतरा बढ़ सकता है, जिसका सीधा फायदा विपक्ष या नए राजनीतिक दलों को मिल सकता है। यही वजह है कि हर एक संभावित उम्मीदवार की पृष्ठभूमि, उसकी सामाजिक पैठ और जनता के बीच उसकी छवि की स्वतंत्र एजेंसियों के माध्यम से जांच कराई जा रही है। यह पूरी प्रक्रिया दर्शाती है कि बदलते हुए राजनीतिक परिदृश्य में अब किसी भी पार्टी के लिए हल्के में चुनाव लड़ना मुमकिन नहीं रह गया है और हर एक कदम बहुत ही नपे-तुले तरीके से उठाया जा रहा है।

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