
भारत में हर साल शरद पूर्णिमा के आसपास अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय दशमी यानी दशहरा का पर्व बेहद उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर देश के कोने-कोने में असत्य पर सत्य की और अधर्म पर धर्म की जीत के प्रतीक के रूप में रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के विशालकाय पुतलों का दहन किया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और सनातन संस्कृति में इसे बुराई के अंत के रूप में देखा जाता है। लेकिन हाल ही में जब देश के प्रशासनिक और जनशिकायत तंत्र के सामने एक ऐसा मामला आया, जिसने सबको हैरान कर दिया। लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा कि आखिर युगों से चली आ रही इस परंपरा में रावण की जगह महाभारत के खलनायक दुर्योधन का पुतला क्यों नहीं जलाया जाता है? इस प्रकार के अनूठे और पेचीदे सवालों को लेकर जब सरकारी पोर्टलों और आयोग के पास हजारों की संख्या में शिकायतें पहुँचीं, तो जिम्मेदार अधिकारियों के भी होश उड़ गए।
भारतीय शासन व्यवस्था में नागरिकों की समस्याओं के समाधान के लिए कई मंच और आयोग बनाए गए हैं, जहाँ लोग अपनी परेशानियां दर्ज कराते हैं। लेकिन जब एक विशेष समय अवधि के दौरान देश भर से लगभग 74 हजार से अधिक ऐसी शिकायतें और सुझाव दर्ज कराए गए, जिनका संबंध किसी सामाजिक बुनियादी सुविधा या भ्रष्टाचार से न होकर पूरी तरह से पौराणिक मान्यताओं और परंपराओं से था, तो प्रशासनिक महकमे में खलबली मच गई। शिकायतों में यह मुख्य रूप से तर्क दिया गया कि रावण ने तो केवल सीता का अपहरण किया था और मर्यादा का पालन भी किया था, जबकि महाभारत काल में द्रौपदी का चीरहरण करने वाले और जुए की साजिश रचने वाले दुर्योधन और उनके सहयोगियों का पुतला क्यों नहीं जलाया जाता? इतनी भारी मात्रा में एक ही विषय पर शिकायतों के आने से राष्ट्रीय स्तर के आयोग भी असमंजस में पड़ गए कि आखिर इस प्रकार के सांस्कृतिक और धार्मिक बहसों पर प्रशासनिक निकाय क्या प्रतिक्रिया दे।
इस पूरे विवाद और ऑनलाइन बहसों के बीच यह समझना बेहद जरूरी है कि सनातन संस्कृति में रावण दहन का धार्मिक और दार्शनिक महत्व क्या है। शास्त्रों के अनुसार, रावण वेदों का ज्ञाता और परम विद्वान था, लेकिन उसका अहंकार, घमंड और पराई स्त्री पर बुरी नजर रखना उसके विनाश का कारण बना। रावण वध को अहंकार और बुराई के सर्वनाश के रूप में देखा जाता है, जिसे विजय दशमी के दिन सार्वजनिक रूप से जलाकर समाज को यह संदेश दिया जाता है कि अंततः पाप का नाश निश्चित है। वहीं दूसरी ओर, दुर्योधन का चरित्र लोभ, ईर्ष्या और हठधर्मिता का प्रतीक माना जाता है। हालांकि महाभारत के पात्रों और कथाओं को लेकर देश के कुछ हिस्सों में अलग-अलग क्षेत्रीय मान्यताएं और मंदिर भी मौजूद हैं, जहां दुर्योधन की पूजा भी की जाती है, लेकिन सामूहिक उत्सव के रूप में रावण दहन की परंपरा रामलीला और विजयादशमी के उत्सव का एक अटूट हिस्सा बन चुकी है, जिसे बदलना या उसमें फेरबदल करना किसी प्रशासनिक आयोग के दायरे में नहीं आता है।
आज के डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में किसी भी पुरानी परंपरा पर सवाल उठाना, उस पर बहस छेड़ना और उसे मीम्स या शिकायतों के जरिए ट्रेंड कराना एक आम बात बन गई है। 74 हजार से ज्यादा शिकायतों का यह पूरा मामला भी इसी आधुनिक परिप्रेक्ष्य का एक हिस्सा है, जहां युवा पीढ़ी पौराणिक कथाओं के विभिन्न पात्रों के ग्रे शेड्स (Grey Shades) पर खुलकर चर्चा करती है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस तरह की बहसें यह दिखाती हैं कि आज के नागरिक अपने इतिहास और पौराणिक ग्रंथों को कितने गहरे स्तर पर खंगाल रहे हैं और उन पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं। हालांकि, आयोग ने स्पष्ट किया कि धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और लोक परंपराओं में बदलाव करना किसी भी सरकारी या वैधानिक संस्था के कार्यक्षेत्र से बाहर है। अंततः रावण दहन का यह पर्व आज भी बुराई पर अच्छाई की विजय का सबसे बड़ा उत्सव बना हुआ है, जो समाज को सदा सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।


















