October 3, 2026 12:53 pm

BREAKING NEWS

अनुकंपा नियुक्ति लेकर ससुराल छोड़ा और की दूसरी शादी, क्या सास को मिलेगा पैसा? हाईकोर्ट का बड़ा फैसला- कटेगी 25% सैलरी

सरकारी सेवा के दौरान किसी कर्मचारी के आकस्मिक निधन के बाद उसके आश्रित परिवार को भुखमरी और गंभीर आर्थिक तंगी से बचाने के लिए ‘अनुकंपा नियुक्ति’ (Compassionate Appointment) का प्रावधान किया गया है। लेकिन हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां दिवंगत कर्मचारी की पत्नी ने अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल की, लेकिन बाद में बुजुर्ग सास-ससुर को बेसहारा छोड़कर दूसरी शादी कर ली और ससुराल से नाता तोड़ लिया। ऐसे में यह गंभीर कानूनी और सामाजिक सवाल खड़ा होता है कि क्या ऐसी स्थिति में बुजुर्ग सास को बहू की सैलरी या मृतक बेटे के पेंशन-फंड से आर्थिक सहायता पाने का कानूनी अधिकार है? हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक विवाद पर ऐतिहासिक और बेहद कड़ा फैसला सुनाते हुए कानून की स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है।

राजस्थान के अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) से जुड़े एक चर्चित मामले की सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि कर्मचारी की विधवा की मासिक सैलरी में से 25 फीसदी राशि काटकर सीधे उसकी बुजुर्ग सास के बैंक खाते में जमा कराई जाए।

  • मामले की पृष्ठभूमि: विद्युत निगम में कार्यरत एक कर्मचारी की सेवाकाल के दौरान आकस्मिक मृत्यु हो गई थी। इसके बाद परिवार और सास-ससुर की लिखित सहमति से मृतक की पत्नी को अनुकंपा के आधार पर नौकरी दिलाई गई।

  • नौकरी मिलने के बाद का विवाद: नौकरी मिलने के कुछ समय बाद महिला ने ससुराल छोड़ दिया, अलग रहने लगी और उसने दूसरा विवाह कर लिया। दिवंगत बेटे के वृद्ध माता-पिता आर्थिक संकट और अकेलेपन में आ गए, जिसके बाद न्याय के लिए बुजुर्ग सास को हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

  • अदालत का स्पष्ट रुख: अदालत ने नियोक्ता विभाग को निर्देश दिया कि बहू की हर महीने की सैलरी से 25% की अनिवार्य कटौती की जाए और उसे सीधे सास को दिया जाए, ताकि उनका भरण-पोषण सुनिश्चित हो सके।

अदालत ने अपने फैसले में अनुकंपा नियुक्ति के मूल उद्देश्य और दर्शन को विस्तार से रेखांकित किया। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति किसी व्यक्ति की निजी जागीर या केवल विधवा का व्यक्तिगत लाभ नहीं है।

  • ‘परिवार’ की कानूनी परिभाषा: लागू सेवा नियमों के तहत ‘परिवार’ की अवधारणा सिर्फ पत्नी तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसमें मृत कर्मचारी पर आश्रित रहने वाले उसके वृद्ध माता-पिता भी समान रूप से शामिल हैं।

  • योजना का मूल उद्देश्य: इस योजना का निर्माण इसलिए किया गया था ताकि कमाने वाले सदस्य की असमय मौत से बेसहारा हुआ पूरा परिवार आर्थिक बदहाली से बच सके। यदि नौकरी पाने वाला सदस्य पद संभालते ही परिवार के अन्य कमजोर आश्रितों को त्याग देता है, तो यह इस कल्याणकारी नीति की मूल भावना के साथ सीधा धोखा है।

हाईकोर्ट ने फैसले में उस कानूनी हलफनामे (Affidavit/Undertaking) को सबसे बड़ा आधार बनाया, जो अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया के दौरान जमा कराया जाता है।

  • जब परिवार के अन्य सदस्य (जैसे माता-पिता या अन्य भाई-बहन) किसी एक सदस्य के पक्ष में ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) देते हैं, तो अभ्यर्थी एक औपचारिक शपथ पत्र देता है कि वह नौकरी मिलने के बाद मृतक के सभी कानूनी आश्रितों की पूरी देखभाल और वित्तीय भरण-पोषण करेगा।

  • अदालत ने टिप्पणी की कि जब महिला ने इसी वचन और अंडरटेकिंग के आधार पर सरकारी सेवा का लाभ उठाया, तो बाद में वह उस कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी से मुकर नहीं सकती। दूसरी शादी कर लेने या ससुराल छोड़ देने से वह शपथ पत्र निष्प्रभावी नहीं हो जाता।

सैलरी से 25 फीसदी मासिक भरण-पोषण तय करने के साथ ही हाईकोर्ट ने दिवंगत कर्मचारी के सेवा संबंधी देयों (Terminal Benefits) को लेकर भी बड़ा आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि मृतक कर्मचारी के पीएफ, ग्रेच्युटी और अन्य फंड लाभों को केवल पत्नी को न दिया जाए, बल्कि इस पूरी एकमुश्त राशि का 50 फीसदी हिस्सा पत्नी को और 50 फीसदी हिस्सा मृतक की मां को समान रूप से आवंटित किया जाए। इससे यह सिद्धांत दोबारा स्थापित हुआ है कि हिंदू उत्तराधिकार कानून और सेवा नियमों के तहत मां भी क्लास-1 लीगल हेयर (प्रथम श्रेणी की विधिक उत्तराधिकारी) होती है, और बेटे की मृत्यु के बाद उसके टर्मिनल फंड्स पर मां का आधा हक बनता है।

यह फैसला केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर की विभिन्न उच्च अदालतों और सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर इस व्यवस्था को दोहराया है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी पूर्व में व्यवस्था दी थी कि अनुकंपा नियुक्ति पाने वाली बहू अपने उस वादे से बंधी होती है जिसके तहत उसने सास की देखभाल की जिम्मेदारी ली थी। इसके अतिरिक्त, ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम’ (Senior Citizens Maintenance Act) के तहत भी वृद्ध सास-ससुर अपने बेटे की संपत्ति या उससे लाभान्वित होने वाले आश्रितों से मासिक गुजारा भत्ता पाने के हकदार हैं। ऐसे मामलों में जहां बहू नौकरी पाकर जिम्मेदारी से भागती है, वृद्ध माता-पिता संबंधित विभाग, ट्रिब्यूनल या हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर सीधे वेतन से कटौती का आदेश प्राप्त कर सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!