नई दिल्ली
SBI रिसर्च ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से रेपो रेट को लेकर ज्यादा अग्रेसिव नजरिया अपनाने का सुझाव दिया है और कहा है कि संभव हो तो दिसंबर तक 50 बेसिस पॉइंट रेपो रेट में बढ़ोतरी करनी चाहिए, क्योंकि ग्लोबल स्तर पर महंगाई तेजी से बढ़ रही है, फाइनेंशियल उथल-पुथल जारी है, कैपिटल की लागत भी बढ़ रही है और मुद्रा भी अस्थिर है।
9 अक्टूबर को Ecowrap में SBI रिसर्च ने कहा कि अभी के माहौल में रणनीति बदलने की आवश्यकता है, जिसमें ब्याज दरों में बड़ी बढ़ोतरी, लिक्विडिटी और विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता रोकना शामिल है. इस रिपोर्ट में अगली आरबीआई की मॉनिटरी पॉलिसी के इंतजार के बजाय ऑफ सर्किल पॉलिसी एक्शन की भी बात कही गई है।
कितनी रहेगी भारत की जीडीपी ग्रोथ?
SBI रिसर्च को उम्मीद है कि आर्थिक विकास दर लचीला बना रहेगा, जो संभावित 7.5 फीसदी से ज्यादा हो सकता है और उनका मानना है कि दिसंबर की पॉलिसी बैठक में ब्याज दरों मं बड़ी बढ़ोतरी उचित हो सकती है. हालांकि, रिपोर्ट में इन उपायों को RBI से सिफारिश के तौर पर पेश किया गया है।
क्यों बढ़ानी चाहिए और रेट?
रिपोर्ट में ग्लोबल अनिश्चितता में बढ़ोतरी, सरकारी बॉन्ड पर मिले ब्याज में उतार-चढ़ाव, वस्तुओं की आपूार्ति को लेकर चिंताएं और अमेरिकी ब्याज दरों के बारे में बदलती उम्मीदों की ओर इशारा किया गया है. इन घटनाक्रमों ने वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव तेज कर दिया है. एसबीआई रिसर्च का तर्क है कि उभरते बाजारों को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है, क्योंकि ग्लोबल कैपिटल फ्लो अधिक अस्थिर हो जाता है और फंड की लागत और उपलब्धता बिगड़ जाती है।
रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई है कि RBI द्वारा हाल ही में की गई ब्याज दर में बदलाव का बॉन्ड यील्ड और विनिमय दर पर प्रभाव सीमित रहा है, क्योंकि बाजारों ने पहले ही इस बदलाव को ध्यान में रख लिया है. इस कारण अगली नीतिगत प्रतिक्रिया का समय और दायरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
आरबीआई को एसबीआई रिसर्च ने दिया ये भी सुझाव
ब्याज दर में बढ़ोतरी के साथ-साथ, एसबीआई रिसर्च ने लिक्विडिटी एटजेस्टमेंट फैसिलिटी (LAF) कॉरिडोर को 50 आधार अंकों से बढ़ाकर सीमित अवधि के लिए उच्च स्तर पर करने का प्रस्ताव दिया है. अभी रेपो रेट 5.5 फीसदी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई अपनी लिक्विडिटी मैनेजमेंट के तहत, MPC के नीतिगत दर पर लिए गए निर्णय से स्वतंत्र रूप से, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी और रिवर्स रेपो दरों को समायोजित कर सकता है. इसमें 2013 के टेपर टैंट्रम और 2020 के कोविड-19 संकट के दौरान केंद्रीय बैंक की कार्रवाइयों को वित्तीय तनाव की अवधि के दौरान कॉरिडोर को चौड़ा करने के लिए मिसाल के तौर पर अपडेट किया गया है।
इस बड़ी बढ़ोतरी से क्या मतलब है?
ब्याज दरों में ज्यादा बढ़ोतरी से मॉनिटरी पॉलिसी की विश्वसनीयता को मजबूत करने और महंगाई की आशंकाओं को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे फैमिली और बिजनेस के लिए उधार लेने की लागत भी बढ़ सकती है. उच्च ब्याज दरें, निवेश और लोन की मांग पर दबाव डाल सकती हैं, जबकि सख्त वित्तीय स्थितियां आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं।
एसबीआई रिसर्च ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन को मजबूत करने, लोन और इक्विटी बाजारों में लॉन्गटर्म कैपिटल आकर्षित करने के लिए सरकारी उपायों की भी मांग की है. आखिर में रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि RBI को विकास और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना होगा और लगातार आने वाले झटकों का सामना करना होगा।









