
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इन दिनों पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक एक नया भू-राजनीतिक भूचाल आया हुआ है, जिसके केंद्र में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ 'मक्का डिफेंस एलायंस' (Mecca Defence Alliance) है। इस रक्षा समझौते को लेकर तुर्की की राजनीति मेंवान और आंतरिक मोर्चे पर हड़कंप मच गया है। अंकारा स्थित तुर्की की संसद में इस पैक्ट के अनुमोदन के दौरान जमकर हंगामा हुआ और विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन को घेर लिया। सांसदों के बीच इस बात को लेकर तीखी बहस छिड़ गई कि क्या इस समझौते के दायरे में आने से तुर्की किसी ऐसे क्षेत्रीय संघर्ष में खिंच सकता है जिसका उसके अपने राष्ट्रीय हितों से कोई लेना-देना नहीं है। इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या इस सैन्य समझौते का असर भारत की सुरक्षा पर पड़ेगा और क्या तुर्की भविष्य में भारत के खिलाफ किसी सैन्य दुसाहस का हिस्सा बनेगा? इन तमाम तीखे सवालों और घरेलू विरोध के बीच मक्का पैक्ट को लेकर वैश्विक कूटनीति का पारा चढ़ गया है।
मक्का डिफेंस एलायंस और तुर्की की संसद में मचा बवाल
तुर्की की संसद में जब पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ हुए 10 वर्षों के इस महत्वपूर्ण रक्षा समझौते (Mecca Pact) को मंजूरी के लिए पेश किया गया, तो सदन का माहौल पूरी तरह गरमा गया। राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन की सरकार और विपक्षी दलों के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। विपक्षी सांसदों ने सीधे तौर पर एर्दोगन सरकार से सवाल किया कि इस त्रिपक्षीय सैन्य गठबंधन में शामिल होने से तुर्की को रणनीतिक रूप से क्या हासिल होगा। समझौते के प्रावधानों के तहत यदि किसी एक भी सदस्य देश पर बाहरी हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस क्लॉज को लेकर तुर्की के भीतर यह चिंता सता रही है कि पाकिस्तान और खाड़ी देशों के पुराने व जटिल क्षेत्रीय विवादों में तुर्की की सेना को झोंका जा सकता है। संसद में बढ़ते हंगामे और विरोध के कारण कार्यवाही तक को स्थगित करना पड़ा, जो यह बताने के लिए काफी है कि एर्दोगन के लिए यह पैक्ट जितना कूटनीतिक जीत है, उतना ही घरेलू स्तर पर जी का जंजाल बनता जा रहा है।
क्या भारत पर हमला करेगा तुर्की? डिफेंस पैक्ट के मायने
इस समझौते के सामने आने के बाद से ही नई दिल्ली से लेकर तमाम कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या तुर्की, पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के खिलाफ किसी सामरिक कार्रवाई का हिस्सा बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते का मूल उद्देश्य मुख्य रूप से पश्चिम एशिया की सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त प्रयास करना है, जिसमें सऊदी अरब का पैसा, तुर्की की आधुनिक ड्रोन तकनीक और पाकिस्तान की सैन्य मैनपॉवर शामिल है। हालांकि, पाकिस्तान लगातार यह कोशिश कर रहा है कि इस मंच का इस्तेमाल भारत विरोधी प्रोपेगेंडा या क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ने के लिए किया जाए। तुर्की की संसद में भी विपक्षी नेताओं ने यही आशंका जताई कि पाकिस्तान के साथ गहरे सैन्य रिश्ते बनाने से भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के साथ तुर्की के कूटनीतिक और आर्थिक संबंध स्थायी रूप से खराब हो सकते हैं। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम और तीनों देशों की हर एक गतिविधि पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं ताकि देश की संप्रभुता पर किसी भी तरह का आंच न आ सके।
पाकिस्तान और सऊदी के साथ एर्दोगन की रणनीति के नफे-नुकसान
राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन तुर्की को एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए लगातार मुस्लिम जगत में अपनी धमक बढ़ा रहे हैं। मक्का डिफेंस पैक्ट इसी बड़ी भू-राजनीतिक रणनीति का एक हिस्सा है, जिसके तहत सऊदी अरब की वित्तीय ताकत और पाकिस्तान के परमाणु तथा सैन्य बल के साथ तुर्की अपने रक्षा उद्योग को वैश्विक स्तर पर पंख देना चाहता है। लेकिन इस एर्दोगन के इस कदम से देश के भीतर आर्थिक संकट से जूझ रही जनता और सेक्युलर धड़े में गहरी नाराजगी है। आलोचकों का मानना है कि तुर्की की अर्थव्यवस्था पहले ही भारी मुद्रास्फीति और आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रही है, ऐसे में विदेशों में सैन्य गठजोड़ और समझौतों में उलझना देशहित में नहीं है। संसद के अंदर और बाहर उठ रहे इन तीखे सवालों ने एर्दोगन सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि घरेलू राजनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच एर्दोगन इस मक्का डिफेंस पैक्ट की नाव को किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं।









