Mauganj News In Hindi :
मऊगंज कलेक्ट्रेट की ‘पनौती’ आखिर हटी—प्रशासन की सांस लौटी, निज सहायक की कुर्सी गई
मऊगंज कलेक्ट्रेट में आखिरकार वह दिन आ ही गया, जब जिला प्रशासन के गले में अटकी फांस अपने आप ढीली पड़ गई। जिस नाम ने पिछले कई दिनों से कलेक्ट्रेट की नींद, चैन और प्रतिष्ठा तीनों उड़ा रखी थी, उस कलेक्टर के निज सहायक पंकज श्रीवास्तव को आखिरकार हटा दिया गया। यह वही नाम है, जिस पर रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप लगे, वीडियो वायरल हुए, आंदोलन हुए, टेंट उखड़े, गिरफ्तारी हुई और अर्धनग्न विरोध ने पूरे प्रदेश का ध्यान मऊगंज की ओर खींच लिया।
प्रदर्शनकारियों की मांग न तो पहाड़ जितनी बड़ी थी, न ही संविधान बदलने वाली। उनकी सिर्फ एक ही सीधी और साफ मांग थी—कलेक्टर मऊगंज संजय जैन के निज सहायक, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पंकज श्रीवास्तव को उसके मूल पद पर वापस भेजा जाए। वजह भी साधारण थी—जिस कर्मचारी पर रिश्वत के आरोप हों, वह कलेक्ट्रेट में सत्ता के केंद्र में क्यों बैठा रहे। लेकिन प्रशासन ने इस “साधारण मांग” को असाधारण बना दिया।
पहले चरण में आंदोलनकारियों को समझाया गया, फिर टेंट उखाड़े गए, फिर खुले आसमान के नीचे बैठाया गया, फिर पुलिस की सख्ती दिखाई गई और अंत में गिरफ्तारी भी कर ली गई। लगता रहा जैसे समस्या पंकज श्रीवास्तव नहीं, बल्कि उसे हटाने की मांग करने वाले लोग हों। प्रशासन की ऊर्जा, ताकत और रणनीति—सब एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को बचाने में झोंक दी गई।
इस बीच कलेक्ट्रेट के बाहर जो दृश्य बने, वे किसी व्यंग्य कथा से कम नहीं थे। अर्धनग्न अवस्था में लेटे प्रदर्शनकारी, पुलिस की घेराबंदी, गिरफ्तारी के बाद जेल में गूंजते ‘वंदे मातरम’ के नारे—हर दृश्य प्रशासन के लिए आईना बनता चला गया। सवाल उठने लगे कि आखिर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी में ऐसी कौन-सी शक्ति है, जो पूरे सिस्टम को उसके चारों ओर घूमने पर मजबूर कर दे।
आखिरकार जब दबाव असहनीय हो गया, सुर्खियां लगातार चुभने लगीं और प्रशासन की किरकिरी थमने का नाम नहीं ले रही थी, तब वह फैसला आया, जिसका इंतजार आंदोलनकारी पहले दिन से कर रहे थे। पंकज श्रीवास्तव को कलेक्ट्रेट से हटाया गया और मूल पद पर भेजा गया। वही मांग, वही फैसला—बस फर्क इतना कि अब तक प्रशासन बहुत कुछ गंवा चुका था।
कलेक्ट्रेट में अब सन्नाटा नहीं, बल्कि राहत की सांस है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो। वही कलेक्ट्रेट, जो कुछ दिन पहले तक विवादों का अखाड़ा बना हुआ था, अब खुद को “सुधरता हुआ” साबित करने में जुटा है। सवाल यह है कि अगर यही फैसला पहले दिन ले लिया जाता, तो क्या मऊगंज को यह तमाशा देखना पड़ता।
मऊगंज की यह कहानी सिर्फ एक कर्मचारी के हटने की नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की है, जो गलत को गलत कहने में देर करता है और दबाव में आकर सही फैसला लेता है। फिलहाल इतना तय है कि कलेक्ट्रेट की ‘पनौती’ हट चुकी है, लेकिन यह सवाल अभी भी हवा में है—क्या यह कार्रवाई सच में जवाबदेही है, या सिर्फ मजबूरी में लिया गया कदम।







