September 14, 2026 4:34 pm

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Mirzapur The Movie: ‘शूरवीर’ गीत पर बवाल, दिल्ली HC में PIL दाखिल; महाराणा प्रताप के सम्मान से जोड़कर फिल्म से हटाने की उठी मांग

लोकप्रिय क्राइम-ड्रामा फ्रैंचाइजी की फीचर फिल्म ‘मिर्जापुर: द मूवी’ रिलीज होते ही एक बड़े कानूनी और सांस्कृतिक विवाद के केंद्र में आ गई है। फिल्म के क्लाइमेक्स दृश्य में बैकग्राउंड ट्रैक के तौर पर इस्तेमाल किए गए बहुचर्चित गीत ‘शूरवीर’ को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिका में अदालत से गुहार लगाई गई है कि वह फिल्म निर्माताओं को तुरंत इस गाने को मूवी से हटाने या बदलने का निर्देश दे। विवाद की मुख्य वजह यह है कि जो गीत मूल रूप से राजस्थान के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के शौर्य, स्वाभिमान और त्याग को समर्पित था, उसे पर्दे पर काल्पनिक अपराधियों, गैंगस्टरों और हिंसक दृश्यों के साथ जोड़कर पेश किया गया है।

दिल्ली हाईकोर्ट में यह जनहित याचिका प्रशांत कुमार सिंह की ओर से दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ‘शूरवीर’ कोई सामान्य बॉलीवुड कमर्शियल ट्रैक नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रनायक और ऐतिहासिक व्यक्तित्व की वीरता को श्रद्धांजलि देने वाला भावपूर्ण गीत है। याचिका में कहा गया है कि जब एक देशभक्ति और श्रद्धा से ओत-प्रोत रचना को पर्दे पर खूंखार गैंगस्टरों, अपराध जगत के किरदारों और हिंसा के दृश्यों के पीछे बजाया जाता है, तो इससे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को गहरा आघात पहुंचता है। याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि यह सिनेमाई चित्रण जनता की स्मृति में एक भ्रामक छवि बनाता है, जो महाराणा प्रताप जैसे राष्ट्रीय नायक की पावन विरासत को काल्पनिक माफिया और अपराधियों के साथ जोड़ता है।

अदालत के समक्ष रखी गई प्रार्थना में मुख्य रूप से यह मांग की गई है कि ‘मिर्जापुर: द मूवी’ के क्लाइमेक्स से इस गीत को फौरन हटाया जाए। इसके साथ ही याचिका में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को यह निर्देश देने का भी आग्रह किया गया है कि वे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्रतीकों या महापुरुषों से जुड़े गीतों के व्यावसायिक व सिनेमाई इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश (Guidelines) तैयार करें। याचिका के अनुसार, हालांकि अभिव्यक्ति और कलात्मक स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन इसकी आड़ में किसी राष्ट्रीय महापुरुष के सम्मान और जनभावनाओं को ठेस पहुंचाने की छूट नहीं दी जा सकती।

इस मामले पर सियासी गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। राजस्थान विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ ने भी इस पूरे प्रकरण पर कड़ा ऐतराज जताया है। राठौड़ ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) के अध्यक्ष को पत्र लिखकर मांग की है कि फिल्म से इस विवादित हिस्से को तत्काल हटाया जाए। उन्होंने अपने बयान में कहा कि राजस्थानी गायक रैपरिया बालम द्वारा गाए गए ‘शूरवीर’ गीत का प्रयोग फिल्म में अपराध, नशा और गैंग संस्कृति को बढ़ावा देने वाले किरदारों पर करना अत्यंत आपत्तिजनक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘शूरवीर’ और ‘गैंगस्टर’ के जीवन मूल्यों में जमीन-आसमान का फर्क होता है; त्याग और मातृभूमि के प्रति समर्पण को अपराध के साथ जोड़ना सर्व समाज की भावनाओं का अपमान है।

हाईकोर्ट में दायर पीआईएल के अलावा, इस गाने को लेकर एक समानांतर कानूनी लड़ाई कॉपीराइट उल्लंघन को लेकर भी शुरू हो चुकी है। इस गीत के मूल रचयिता और राजस्थान के प्रसिद्ध इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट रैपरिया बालम (अशोक मांडा) की टीम ने फिल्म के निर्माता एक्सेल एंटरटेनमेंट (फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी) को कानूनी नोटिस भेजा है। गायक की टीम का दावा है कि इस गीत के मूल कॉपीराइट उनके पास सुरक्षित हैं और फिल्म निर्माताओं ने उनसे बिना अनुमति लिए इसे फिल्म के हिंसक सीन में इस्तेमाल कर लिया। गायक की टीम का कहना है कि यह गीत नई पीढ़ी को इतिहास और वीरों की गाथा से जोड़ने के लिए बनाया गया था, न कि किसी क्राइम थ्रिलर फिल्म में मुन्ना भैया जैसे आपराधिक चरित्रों का महिमामंडन करने के लिए।

न्यायालयीन जानकारों के अनुसार, जब किसी फिल्म को सेंसर बोर्ड (CBFC) द्वारा सार्वजनिक प्रदर्शन का प्रमाण पत्र मिल जाता है, तो सामान्यतः अदालतें उसके प्रदर्शन पर सीधी रोक लगाने से बचती हैं। हालांकि, जब मामला किसी ऐतिहासिक महापुरुष के मान-सम्मान को विकृत करने और जनता की धार्मिक या सांस्कृतिक भावनाओं को आहत करने का बनता है, तो अदालत को कलात्मक स्वतंत्रता बनाम जनभावनाओं के संतुलन की बारीकी से समीक्षा करनी पड़ती है। आने वाले दिनों में दिल्ली हाईकोर्ट इस याचिका पर सुनवाई कर यह तय करेगा कि क्या फिल्म के क्लाइमेक्स से यह गाना हटाया जाएगा या निर्माताओं को कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी।

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