September 18, 2026 10:02 am

BREAKING NEWS

Minor Passport Rules Changed: बच्चों के पासपोर्ट नियमों में सरकार का बड़ा फेरबदल! 15 साल से कम उम्र वालों की वैधता पर नया नियम लागू आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से अधिकारी तक, सेवा संबंधी समस्याओं का होगा त्वरित निराकरण UP Weather Alert: यूपी में मॉनसून की विदाई से पहले बदलेगा मौसम! कहीं गरज-चमक के साथ बारिश तो कहीं सताएगी चिपचिपी उमस, जानें अपने जिले का हाल Cumulative vs Non Cumulative FD: क्या होती है क्यूमुलेटिव और नॉन-क्यूमुलेटिव FD? किसमें है तगड़ा मुनाफा और कैसे पहचानें अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट का प्रकार Foods to Avoid with Tea: सावधान! चाय की चुस्की के साथ भूलकर भी न खाएं ये 5 चीजें, पेट में जाकर बन सकती हैं धीमा जहर Education Ministry Updates APAAR ID Policy; Student Employment Verification

US Russia Sanctions Bill: रूस पर नए कड़े प्रतिबंधों वाले बिल पर जल्द मुहर लगाएंगे ट्रंप! भारत पर 100% टैरिफ का खतरा? जानें क्रूड ऑयल, एक्सपोर्ट और द्विपक्षीय व्यापार पर क्या होगा इसका असर

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच मॉस्को की युद्ध अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने के मकसद से अमेरिकी संसद (कांग्रेस) ने अब तक का सबसे आक्रामक और व्यापक प्रतिबंध विधेयक पारित कर दिया है। अमेरिकी सीनेट के बाद प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) ने भी ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026’ (Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026) को हरी झंडी दे दी है। अब यह विधेयक सीधे व्हाइट हाउस पहुंच चुका है, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जल्द ही इस पर हस्ताक्षर कर इसे औपचारिक कानून का रूप देने जा रहे हैं। इस विधेयक का मुख्य लक्ष्य रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र, शीर्ष अधिकारियों और तेल प्रतिबंधों से बचने वाले ‘शैडो फ्लीट’ (टैंकरों के गुप्त नेटवर्क) पर कड़ा शिकंजा कसना है। किंतु इस कानून का सबसे विस्फोटक पहलू वह प्रावधान है, जो रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष आयातक देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम आयात शुल्क (Tariff) लगाने का अधिकार सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति को सौंपता है।

भारत अपनी कुल पेट्रोलियम आवश्यकताओं का 88 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। वर्ष 2022 में यूक्रेन संघर्ष शुरू होने और पश्चिमी देशों द्वारा रूसी तेल पर पाबंदियां लगाए जाने के बाद से भारत ने रियायती दरों पर रूसी क्रूड ऑयल की खरीद में भारी बढ़ोतरी की। आज भारत, चीन के बाद रूसी कच्चे तेल का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। देश के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 40 से 45 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।

अमेरिकी सांसदों की दलील है कि भारत और चीन द्वारा की जा रही तेल की यह भारी खरीद रूसी अर्थव्यवस्था को वित्तीय ऑक्सीजन दे रही है। नए अमेरिकी विधेयक में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले शीर्ष 5 आयातक देशों (जिनमें भारत, चीन, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं) को सीधे तौर पर लक्षित किया गया है।

इस विधेयक के पारित होते ही भारतीय व्यापार और कूटनीतिक हलकों में यह चिंता फैल गई कि क्या भारतीय वस्तुओं पर अमेरिका तुरंत 100% टैरिफ थोप देगा। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने स्पष्ट किया है कि:

  • स्वतः लागू नहीं होगा टैरिफ: यह कानून बनते ही भारत के सभी आयातों पर अपने आप 100% शुल्क नहीं लगेगा।

  • राष्ट्रपति का विवेकाधिकार (Discretionary Power): यह कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को केवल यह ‘अधिकार’ देता है कि यदि कोई देश 30 दिनों की निर्धारित अवधि के बाद भी रूसी तेल की नई खरीद जारी रखता है, तो वे उस देश से आने वाले सामानों पर 100% तक दंडात्मक टैरिफ लगाने का विकल्प चुन सकते हैं।

  • वेवर (छूट) का प्रावधान: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा या भू-राजनीतिक हितों को देखते हुए किसी सहयोगी देश को इन प्रतिबंधों से विशेष ‘वेवर’ यानी छूट देने का अधिकार भी दिया गया है।

यदि वाशिंगटन ने दबाव बनाने की रणनीति के तहत भारतीय उत्पादों पर आंशिक या पूर्ण टैरिफ लगाने का फैसला लिया, तो इसका सबसे गंभीर असर भारत के निर्यात क्षेत्र पर पड़ेगा। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और एकलौता सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है।

उच्च टैरिफ लगने की स्थिति में निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों को भारी नुकसान हो सकता है:

  • इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन: भारत से अमेरिका जाने वाले ‘मेड इन इंडिया’ आईफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स महंगे हो जाएंगे।

  • फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयां): अमेरिका को जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करने वाली भारतीय दवा कंपनियों के मुनाफे और बाजार हिस्सेदारी पर असर पड़ेगा।

  • कपड़ा, गारमेंट्स और परिधान: तिरुपुर, सूरत और नोएडा के टेक्सटाइल हब के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाएगा।

  • रत्न एवं आभूषण (Gems & Jewellery): सूरत और मुंबई के हीरा पॉलिशिंग उद्योग को बड़ा झटका लग सकता है।

  • ऑटो कंपोनेंट्स और इंजीनियरिंग गुड्स: अमेरिकी वाहन निर्माताओं को पार्ट्स सप्लाई करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी।

रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन इस कानून का उपयोग वास्तव में कठोर प्रतिबंध लगाने के बजाय भारत के साथ चल रही द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Deal) की वार्ताओं में एक ‘प्रेशर टूल’ (सौदाबाजी के हथियार) के रूप में कर सकता है। अमेरिका काफी समय से भारत के विशाल कृषि, डेयरी और मेडिकल डिवाइस बाजार में अपने उत्पादों के लिए अधिक पहुंच की मांग कर रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम पर भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने दो टूक शब्दों में कहा है कि भारत अपने 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बाजार की व्यावहारिक परिस्थितियों और विविध स्रोतों (Diversified Sourcing) के आधार पर ही तेल की खरीद जारी रखेगा। नई दिल्ली ने अमेरिकी पक्ष को स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय आर्थिक और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाने के लिए दृढ़ संकल्पित है।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, भारत के लिए रातों-रात अपने 40% से अधिक कच्चे तेल के स्रोत को बदलना व्यावहारिक रूप से असंभव है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और लाल सागर संकट के चलते वैश्विक तेल बाजार पहले से ही नाजुक दौर में है। यदि भारत रूसी तेल की खरीद अचानक बंद करता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 120-130 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकते हैं, जिसका खामियाजा खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी भुगतना पड़ेगा। ऐसे में उम्मीद यही जताई जा रही है कि कानून बनने के बाद नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच बैक-चैनल कूटनीति सक्रिय होगी और भारत को ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर विशेष छूट (Waiver) दिलाने का रास्ता तलाशा जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!