
देश के आईटी और बिजनेस प्रोसेस मैनेजमेंट (BPM) सेक्टर से जुड़ी एक बड़ी कानूनी खबर सामने आई है। कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) ने वैश्विक सेवा प्रदाता कंपनी जेनपैक्ट इंडिया (Genpact India) को करारा झटका देते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा जारी संपत्ति जब्ती के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) और संबंधित वित्तीय कानूनों के तहत की गई कार्रवाई कानूनी दायरे में है और इस चरण में इसमें हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं बनता।
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट जगत में विदेशी फंडिंग, आउटबाउंड रेमिटेंस और विदेशी मुद्रा लेन-देन के अनुपालन को लेकर बहस तेज हो गई है। जांच एजेंसियों के सख्त रुख से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए कानूनी जवाबदेही अब और अधिक सख्त होती दिखाई दे रही है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जेनपैक्ट इंडिया के खिलाफ कुछ वित्तीय लेन-देन, विदेशी प्रेषण (Foreign Remittance) और फेमा (FEMA) के कथित उल्लंघनों की जांच के तहत संपत्तियों को जब्त करने का अंतरिम आदेश जारी किया था। केंद्रीय एजेंसी का आरोप था कि कंपनी द्वारा देश से बाहर भेजे गए कुछ फंड और कॉर्पोरेट रीस्ट्रक्चरिंग के दौरान किए गए मौद्रिक ट्रांसफर निर्धारित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं थे।
ईडी द्वारा जब्ती की इस कार्रवाई के खिलाफ जेनपैक्ट ने कर्नाटक उच्च न्यायालय की एकल पीठ के समक्ष रिट याचिका दायर की थी। कंपनी का मुख्य तर्क था कि एजेंसी की जब्ती की कार्रवाई मनमानी, अधिकार क्षेत्र से बाहर और नियमित व्यावसायिक लेन-देन में अनुचित हस्तक्षेप है। कंपनी ने अदालत से अंतरिम राहत और जब्ती आदेश को रद्द करने की गुहार लगाई थी।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद जेनपैक्ट की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने रेखांकित किया कि फेमा (FEMA) की धारा 37A या अन्य संबंधित वैधानिक प्रावधानों के तहत सक्षम प्राधिकारी को यह अधिकार है कि यदि उसे विदेशी खातों में संदिग्ध लेन-देन या भारतीय परिसंपत्तियों के अवैध अंतरण का अंदेशा हो, तो वह जांच लंबित रहने तक संपत्तियों को कुर्क या जब्त कर सकता है।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि जब तक जांच एजेंसी की कार्रवाई में प्रक्रियात्मक खामी या दुर्भावना स्पष्ट रूप से साबित न हो, तब तक संवैधानिक अदालतों को प्रारंभिक जांच या जब्ती आदेशों में दखल नहीं देना चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि कंपनी के पास फेमा के तहत गठित अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunal) के समक्ष अपनी बात रखने का वैधानिक विकल्प खुला है, इसलिए सीधे रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग करके एजेंसी की कार्यवाही को रोकना उचित नहीं है।
कर्नाटक, विशेष रूप से बेंगलुरु, भारत की सिलिकॉन वैली और वैश्विक आईटी कंपनियों का प्रमुख केंद्र है। जेनपैक्ट जैसी विशाल बीपीओ और आईटी सेवा प्रदाता कंपनी के खिलाफ उच्च न्यायालय का यह कड़ा फैसला राज्य और देश भर के तकनीकी गलियारों में बड़ा संदेश लेकर आया है। बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम, नोएडा और पुणे जैसे आईटी हब में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के लिए विदेशी मुद्रा हस्तांतरण से जुड़े नियम अब पहले से कहीं अधिक संवेदनशील हो गए हैं।
स्थानीय व्यापारिक और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय के बाद बेंगलुरु और कर्नाटक में स्थित विदेशी सहायक कंपनियों के अनुपालन (कम्प्लायंस) विभागों पर ऑडिट का दबाव बढ़ेगा। रॉयल्टी भुगतान, विदेशी पैरेंट कंपनियों को परामर्श शुल्क का प्रेषण और क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजैक्शन की जांच अब केवल आयकर विभाग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि फेमा और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के चश्मे से भी अधिक गहनता से परखी जाएगी।
जेनपैक्ट के खिलाफ जब्ती आदेश के बरकरार रहने से उन वैश्विक कंपनियों की चिंताएं बढ़ सकती हैं जो भारत में बड़े ऑपरेशंस चलाती हैं। आमतौर पर विदेशी कंपनियां भारत में अर्जित लाभ या इंटर-कंपनी शुल्क को विभिन्न वित्तीय ढांचों के जरिए अपनी मूल (Parent) कंपनियों को भेजती हैं। केंद्रीय जांच एजेंसियां पिछले कुछ वर्षों से लगातार ऐसे वित्तीय लेन-देन की बारीकी से पड़ताल कर रही हैं ताकि टैक्स चोरी या अवैध फंड ट्रांसफर को रोका जा सके।
अदालत द्वारा ईडी के आदेश को सही ठहराए जाने से जांच एजेंसी के हाथ मजबूत हुए हैं। अब ईडी के पास जब्त संपत्तियों की पुष्टि के लिए सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करने और जांच को आगे बढ़ाते हुए विस्तृत कारण बताओ नोटिस जारी करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय से याचिका खारिज होने के बाद अब जेनपैक्ट इंडिया के सामने मुख्य रूप से दो कानूनी रास्ते बचते हैं। पहला विकल्प यह है कि कंपनी इस एकल पीठ के फैसले को हाई कोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) के समक्ष चुनौती दे सकती है या फिर देश की शीर्ष अदालत, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) का दरवाजा खटखटा सकती है।
दूसरा विकल्प फेमा कानून के तहत उपलब्ध आंतरिक वैधानिक व्यवस्था है। कंपनी ईडी के जब्ती आदेश के खिलाफ अधिकृत सक्षम प्राधिकारी और अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष अपने ऑडिट रिकॉर्ड्स, अनुबंध दस्तावेज और बैंक खातों का विस्तृत ब्योरा प्रस्तुत कर यह सिद्ध करने का प्रयास कर सकती है कि संबंधित वित्तीय लेन-देन पूरी तरह वैध और अधिकृत बैंकिंग चैनलों के माध्यम से किए गए थे।









