वाशिम कोर्ट का फैसला: हिरासत में मौत के मामले में 9 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा

महाराष्ट्र के वाशिम जिले की एक अदालत ने गुरुवार को भाग्य पवार की 2011 में हिरासत में हुई मौत के मामले में नौ पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिससे लगभग 15 साल लंबी कानूनी लड़ाई का अंत हो गया।

जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जेपी झाप्ते ने रिसोड़ पुलिस थाने के तत्कालीन प्रभारी माधव धांडे समेत नौ आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के विभिन्न प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया।

हिरासत में लिए जाने के बाद युवक की मौत हो गई

मामला भाग्य पवार की मौत से संबंधित है, जिसे रिसोड पुलिस ने चोरी के एक मामले में पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था। बाद में पुलिस हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई।

पवार के परिवार ने आरोप लगाया कि उन्हें हिरासत में गंभीर यातना दी गई। उन्होंने दावा किया कि पुलिस ने उन्हें सूचित किया था कि उसे केवल पूछताछ के लिए ले जाया जा रहा था, लेकिन कथित तौर पर पुलिस स्टेशन के अंदर उस पर हमला किया गया, जिससे उसकी मौत हो गई।

34 दिनों में पूरी हुई सीआईडी ​​जांच

आरोपों के बाद, महाराष्ट्र अपराध जांच विभाग (सीआईडी) ने जांच अपने हाथ में ले ली। एजेंसी ने 34 दिनों के भीतर अपनी जांच पूरी की और आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया।

मुकदमे के दौरान, अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि हिरासत में मौत कोई प्राकृतिक घटना नहीं थी, बल्कि कथित पुलिस हिंसा का परिणाम थी। मामले को गवाहों की गवाही, चिकित्सा साक्ष्य और जांच के दौरान एकत्र किए गए अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा समर्थित किया गया था।

9 पुलिसकर्मी दोषी करार

अदालत ने रिसोड़ के पूर्व थाना प्रभारी माधव धांडे समेत मदन पवार, शिवाजी खिल्लारी, पंजाब पाटकर, रमेश पवार, प्रकाश ताराम, नागोराव खांडके, अशोक वैद्य और वसंत जाधव को दोषी ठहराया।

सभी नौ को आईपीसी के विभिन्न प्रावधानों के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

कोर्ट का मानना ​​है कि हिरासत में हिंसा लोकतंत्र पर हमला है

लोक अभियोजक श्रीराम नारायणराव कालू ने अदालत को बताया कि भाग्य पवार का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और पुलिस के पास कानून की उचित प्रक्रिया के माध्यम से अपराध स्थापित होने से पहले किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करने का कोई अधिकार नहीं था।

अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि किसी भी कानून प्रवर्तन एजेंसी को कानून अपने हाथ में लेने या किसी आरोपी व्यक्ति को हिंसा का शिकार बनाने का अधिकार नहीं है।

अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में किसी नागरिक के खिलाफ अमानवीय व्यवहार और हिंसा देश के लोकतांत्रिक और कानूनी ढांचे पर गंभीर हमला है, और आरोपी को दोषी ठहराते समय उसने इसी तर्क पर भरोसा किया।

मेडिकल रिपोर्ट में मल्टीपल फ्रैक्चर सामने आया

अभियोजन पक्ष के अनुसार, पोस्टमार्टम और मेडिकल जांच से पता चला कि भाग्य पवार को कई फ्रैक्चर हुए थे, उनके शरीर की कई हड्डियां टूटी हुई पाई गईं, जो गंभीर हिरासत में हमले के आरोपों का समर्थन करती हैं।

पवार पारधी समुदाय से थे और उनकी मौत के बाद न्याय की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इस घटना ने काफी लोगों का ध्यान खींचा था, जिसके बाद सीआईडी ​​को जांच का जिम्मा सौंपा गया था।

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