
हरियाणा के औद्योगिक नगर फरीदाबाद से इस वक्त एक बेहद दर्दनाक, झकझोर देने वाली और आंखें नम कर देने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे देश के लोगों को स्तब्ध कर दिया है। शहर के एक इलाके में खेलते-खेलते एक मासूम बच्ची काल के गाल में समा गई, जिससे पूरे परिवार और आसपास के क्षेत्र में मातम पसरा हुआ है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, मात्र 3 साल की एक मासूम बच्ची जिसका नाम नेहा था, सड़क पर आवारा सांड के अचानक हमले से बचने के लिए भाग रही थी, और इसी आपाधापी में वह पास ही में बिना ढंके खुले पड़े एक गहरे बोरवेल (Open Borewell) में जा गिरी। घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन, पुलिस और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ (NDRF) तथा एसडीआरएफ की टीमों ने तुरंत मोर्चा संभाला और बच्ची को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए युद्ध स्तर पर लगभग 10 घंटे तक लगातार राहत एवं बचाव अभियान चलाया। तमाम कोशिशों और जांबाज रेस्क्यू टीमों के अथक प्रयासों के बावजूद आखिरकार उस मासूम की जिंदगी नहीं बचाई जा सकी, जिससे पूरे सिस्टम और समाज की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानिए कैसे हुआ यह खौफनाक हादसा और क्या थी उस वक्त की परिस्थितियां
यह दिल दहला देने वाली घटना फरीदाबाद के एक रिहायशी इलाके में उस वक्त घटी जब 3 साल की नेहा अपने घर के बाहर खेल रही थी। ग्रामीण और बाहरी इलाकों की तरह इन दिनों शहरों की कॉलोनियों और सड़कों पर भी आवारा पशुओं खासकर सांड़ों का आतंक आम बात हो गई है। नेहा जब सड़क पर खेल रही थी, तभी अचानक एक गुस्सैल सांड उसकी तरफ दौड़ा, जिसे देखकर बच्ची बुरी तरह घबरा गई और अपनी जान बचाने के लिए तेजी से भागी। भागने की इस अफरातफरी में उसका ध्यान सामने खुले पड़े उस बोरवेल पर नहीं गया जिसे बिना किसी ढक्कन या सुरक्षा दीवार के लापरवाही से छोड़ दिया गया था। देखते ही देखते वह मासूम पैर फिसलने से सीधे उस गहरे बोरवेल के अंदर जा समाई। जब परिजनों ने बच्ची को अचानक गायब देखा और आसपास तलाश शुरू की, तो बोरवेल के अंदर से उसकी रोने की दबी हुई आवाज सुनाई दी, जिसके बाद परिवार वालों के पैरों तले जमीन खिसक गई और उन्होंने तुरंत पुलिस व प्रशासन को इस भयानक हादसे की सूचना दी।
10 घंटे तक चला मैराथन रेस्क्यू अभियान: एनडीआरएफ और प्रशासन ने झोंक दी पूरी ताकत
घटना की गंभीरता को देखते हुए फरीदाबाद जिला प्रशासन ने बिना एक पल गंवाए मौके पर राहत कार्यों की पूरी फौज उतार दी। राज्य आपदा मोचन बल (SDRF), स्थानीय पुलिस, दमकल विभाग और स्वास्थ्य कर्मियों की टीमें तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गईं। बच्ची को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए अत्याधुनिक कैमरों, ऑक्सीजन पाइप्स और जेसीबी मशीनों की मदद से बोरवेल के समानांतर एक और गड्ढा खोदने का काम युद्ध स्तर पर शुरू किया गया। रात का अंधेरा और मिट्टी धंसने के खतरे के बावजूद रेस्क्यू टीमों ने अपनी जान जोखिम में डालकर लगातार 10 घंटे तक नॉन-स्टॉप रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। बोरवेल के अंदर कैमरा डालकर नेहा की हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही थी और उसे लगातार ऑक्सीजन पहुंचाई जा रही थी ताकि वह सांस ले सके। देश भर की दुआएं उस मासूम के साथ जुड़ी हुई थीं और हर कोई यही प्रार्थना कर रहा था कि किसी तरह नेहा को सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाए, लेकिन वक्त बीतने के साथ-साथ बोरवेल के भीतर की परिस्थितियां और अधिक चुनौतीपूर्ण होती चली गईं।
तमाम कोशिशों के बाद भी नहीं बची जान: डॉक्टरों ने घोषित किया मृत
लगभग 10 घंटे के लंबे, संघर्षपूर्ण और तनाव से भरे रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद आखिरकार राहत कर्मियों ने बोरवेल के समानांतर सुरंग बनाकर अंदर फंसे तक पहुंचने में सफलता हासिल कर ली थी। जैसे ही रेस्क्यू टीम ने बच्ची को बाहर निकाला, वहां मौजूद मेडिकल टीम ने बिना किसी देरी के उसे प्राथमिक उपचार दिया और तुरंत नजदीकी अस्पताल के लिए रवाना कर दिया। हालांकि, जब डॉक्टरों ने उसकी जांच की तो उन्होंने बताया कि बोरवेल के भीतर ज्यादा समय तक रहने, ऑक्सीजन की कमी और गंभीर चोटों के कारण मासूम नेहा की सांसें पहले ही थम चुकी थीं। इस दुखद समाचार के मिलते ही अस्पताल परिसर में कोहराम मच गया और बच्ची के माता-पिता तथा परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। इस हृदयविदारक अंत ने वहां मौजूद हर एक पुलिसकर्मी, प्रशासनिक अधिकारी और स्थानीय नागरिक की आंखें नम कर दीं।
प्रशासन की घोर लापरवाही और खुले बोरवेलों पर उठते गंभीर सवाल
इस दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर देश भर में खुले पड़े बोरवेलों (Open Borewells) की सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक लापरवाही और ठेकेदारों की गैर-जिम्मेदाराना रवैये को उजागर कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट और सरकार के कड़े दिशा-निर्देशों के बावजूद देश के कई हिस्सों में आज भी बोरवेल खोदने के बाद उन्हें या तो खुला छोड़ दिया जाता है या बहुत ही कमजोर तरीके से ढंका जाता है। फरीदाबाद की इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि कागजी निर्देश और वादे तब तक बेमानी हैं जब तक जमीनी स्तर पर सख्त निगरानी और कार्रवाई नहीं की जाती। आवारा पशुओं का बढ़ता आतंक और खुले बोरवेल किसी भी हंसते-खेलते परिवार को पलभर में उजाड़ने के लिए काफी हैं। जनता और सामाजिक संगठनों द्वारा अब यह मांग जोर-शोर से उठाई जा रही है कि इस प्रकार की लापरवाही के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में किसी अन्य मासूम को अपनी जान न गंवानी पड़े।

















