
आज की भागदौड़ भरी और तनावपूर्ण जीवनशैली में महिलाओं को कई तरह की स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें मानसिक तनाव, अवसाद और हार्मोनल असंतुलन (Hormonal Imbalance) सबसे आम समस्याएं बन चुकी हैं। इन समस्याओं का सीधा असर महिलाओं की प्रजनन क्षमता (Fertility) पर पड़ता है, जिससे कई बार प्राकृतिक रूप से गर्भधारण (Conceive) करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। नई दिल्ली में आयोजित सातवीं राष्ट्रमंडल परिचारिका एवं प्रसूति विद्या महासंघ की संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए एक नए और क्रांतिकारी शोध ने चिकित्सा जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।
उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित संस्थान संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) के चिकित्सकों और शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन ने बांझपन और गर्भधारण की चुनौती से जूझ रही महिलाओं के लिए उम्मीद की एक नई किरण जगाई है। इस शोध के अनुसार, यदि महिलाएं अपनी दैनिकचर्या में हठयोग (Hathayoga) को शामिल करें, तो न केवल उनका मानसिक तनाव कम होता है, बल्कि हार्मोनल संतुलन सुधरने से गर्भधारण की संभावनाएं भी काफी हद तक बढ़ जाती हैं।
एसजीपीजीआई के मातृ एवं प्रजनन स्वास्थ्य विभाग की विशेषज्ञ प्रो. डॉ. इंदुलता साहू के अनुसार, गर्भधारण न हो पाने या कंसीव करने में देरी होने के पीछे मानसिक तनाव और अवसाद सबसे बड़ी बाधा के रूप में सामने आते हैं। जब महिला के शरीर में तनाव का स्तर बढ़ता है, तो शरीर में कार्टिसोल (Cortisol) नामक स्ट्रेस हॉर्मोन का स्राव तेजी से बढ़ जाता है।
इस रसायन का सीधा और नकारात्मक प्रभाव महिला के अंडाशय (Ovaries) पर पड़ता है, जिससे अंडों के निर्माण की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है और भ्रूण का गर्भाशय में रोपण (Implantation) होना कठिन हो जाता है। शोधकर्ताओं ने बांझपन परामर्श केंद्र में उपचार करा रही महिलाओं पर यह अध्ययन किया, जिसमें लगातार दो सप्ताह तक प्रतिदिन 60 मिनट का हठयोग अभ्यास कराया गया। इसके चौंकाने वाले और सकारात्मक परिणाम सामने आए:
महिलाओं में चिंता (Anxiety) का स्तर 41.3 प्रतिशत तक घट गया।
अवसाद (Depression) का स्तर 35.3 प्रतिशत तक कम हो गया।
मानसिक तनाव (Mental Stress) में 30.3 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई।
योगाचार्य डॉ. सत्यराम के अनुसार, हठयोग शरीर की चंद्र और सूर्य दोनों प्रकार की ऊर्जाओं में अद्भुत संतुलन स्थापित करने का काम करता है। इसमें शारीरिक आसन, श्वास लेने की प्रक्रिया (प्राणायाम) और ध्यान को एक साथ जोड़ा जाता है। शोध में अपनाई गई 60 मिनट की इस विशेष दिनचर्या को आप भी आसानी से अपना सकती हैं:
वार्म-अप और प्रारंभिक तैयारी (5 मिनट): सुबह के समय खाली पेट, किसी स्वच्छ और हवादार स्थान पर योगा मैट बिछाएं। ढीले और सूती वस्त्र पहनें। इसके बाद गर्दन, कंधों और कमर को हल्के-हल्के घुमाकर मांसपेशियों को खोलें।
योगासन का अभ्यास (30 मिनट): हर आसन में 20 से 30 सेकंड तक रुकें और सामान्य सांस लेते रहें। इसमें भद्रासन (तितली आसन) जो श्रोणि क्षेत्र में रक्त संचार तेज करता है, भुजंगासन जो गर्भाशय को सक्रिय करता है, सेतुबंधासन जो थायराइड को संतुलित कर दबाव घटाता है, और विपरित करणी मुद्रा जो शरीर को पूर्ण विश्राम देती है, शामिल हैं।
प्राणायाम (15 मिनट): नाड़ी शुद्धि के लिए अनुलोम-विलोम (5 मिनट), चिंता तुरंत शांत करने के लिए भ्रामरी (5 मिनट) और गहरी सांस लेने का दीर्घ श्वसन (5 मिनट) अभ्यास करें।
ध्यान और विश्राम (10 मिनट): पालथी मारकर बैठकर सांसों पर ध्यान केंद्रित करें (8 मिनट) और अंत में शवासन (2 मिनट) के माध्यम से पूरे शरीर को पूर्ण रूप से ढीला छोड़ दें।


















