September 20, 2026 4:45 pm

कभी छोड़ना पड़ा था जिलाध्यक्ष का पद, अब जानें कैसे हुई सुनील कोठारी की ‘टाइगर इज बैक’ वाली धमाकेदार वापसी

राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा नाम सबसे ज्यादा चर्चा का केंद्र बना हुआ है, जिसने अपने राजनीतिक जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्षों से सबको हैरान कर दिया है। हम बात कर रहे हैं वरिष्ठ और कद्दावर नेता सुनील कोठारी (Sunil Kothari) की, जिनकी राजनीतिक वापसी को उनके समर्थक और स्थानीय कार्यकर्ता किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं मान रहे हैं। एक समय ऐसा भी था जब राजनीतिक समीकरणों, आपसी खींचतान और अंदरखाने के भारी दबाव के चलते उन्हें अपने संगठन में जिलाध्यक्ष के महत्वपूर्ण पद से इस्तीफा देकर पीछे हटना पड़ा था। उस वक्त उनके विरोधियों ने यह मान लिया था कि शायद अब जयपुर की सक्रिय राजनीति में उनका प्रभाव कम हो जाएगा और वे हाशिए पर चले जाएंगे। लेकिन राजनीति भी खेल निराले दिखाती है, और जो लोग जमीन से जुड़े होते हैं तथा जनता के बीच अपनी पकड़ रखते हैं, उन्हें लंबे समय तक मैदान से बाहर नहीं रखा जा सकता। सुनील कोठारी ने अपने ऊपर आए राजनीतिक संकट को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदला और चुपचाप अपने संगठन के प्रति वफादार रहते हुए जनता के बीच काम करते रहे। उनके इसी लंबे धैर्य, अनुशासन और सांगठनिक क्षमताओं का परिणाम है कि आज एक बार फिर से जयपुर से लेकर प्रदेश स्तर तक उनके नाम की गूंज सुनाई दे रही है, और उनकी यह वापसी किसी भी लिहाज से एक आम घटना नहीं कही जा सकती है।

‘टाइगर इज बैक’ स्टाइल में सुनील कोठारी की धमाकेदार एंट्री और कार्यकर्ताओं में उमड़ा भारी जोश

जैसे ही सुनील कोठारी की एक बार फिर से मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय और मजबूत वापसी की खबर सामने आई, उनके समर्थकों और चाहने वालों में जश्न का माहौल बन गया। सोशल मीडिया से लेकर जयपुर की सड़कों तक उनके स्वागत में ‘टाइगर इज बैक’ (Tiger is Back) के नारे गूंजने लगे, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जमीनी स्तर पर उनकी पकड़ आज भी कितनी मजबूत और असरदार है। जब किसी नेता को उसके ही राजनीतिक सफर में अनपेक्षित झटके लगते हैं, तो अक्सर उसका राजनीतिक वजूद कमजोर पड़ जाता है, लेकिन सुनील कोठारी ने अपने आलोचकों को अपने काम और जनता के समर्थन से करारा जवाब दिया है। इस वापसी के पीछे उनकी कुशल रणनीतिक समझ, स्थानीय मुद्दों पर गहरी पकड़ और हर वर्ग के कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने की अनूठी शैली ने बहुत बड़ा योगदान दिया है। जब उन्होंने अपने विरोधियों के बीच दोबारा मजबूती के साथ कदम रखा, तो उनका अंदाज और तेवर पूरी तरह बदला हुआ था, जिसे देखकर विरोधी खेमे में भी खलबली मच गई है। इस ‘टाइगर इज बैक’ वाली एंट्री ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति में असली ताकत कुर्सियों या पदों से नहीं, बल्कि जनता के दिलों में बनाई गई जगह से मिलती है, और सुनील कोठारी ने इस बात को एक बार फिर से सच साबित करके दिखा दिया है।

आगामी राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा गहरा असर और जयपुर की स्थानीय सियासत का नया भविष्य

सुनील कोठारी की इस जोरदार और धमाकेदार वापसी का असर केवल उनके व्यक्तिगत राजनीतिक करियर तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसका सीधा और दूरगामी प्रभाव जयपुर और आसपास के क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ने की पूरी संभावना है। जब कोई मजबूत नेता तमाम बाधाओं को पार करके फिर से उभरता है, तो पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह शक्ति संतुलन में बदलाव आने लगता है। स्थानीय कार्यकर्ता अब पूरी ऊर्जा के साथ आगामी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार नजर आ रहे हैं, और कोठारी का अनुभव पार्टी की नैया पार लगाने में बेहद मददगार साबित हो सकता है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस वापसी के बाद अब जयपुर की राजनीति में सुनील कोठारी की भूमिका और अधिक अहम हो जाएगी, और हर दल को उनके प्रभाव को ध्यान में रखकर ही अपनी नीतियां तय करनी पड़ेंगी। यह पूरी कहानी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि राजनीति में कभी भी किसी को कम नहीं आंकना चाहिए, क्योंकि सही समय और मजबूत इरादों के साथ की गई वापसी इतिहास बदल देती है। आने वाले दिनों में उनकी यह सक्रियता राज्य की मुख्यधारा की राजनीति में नए आयाम गढ़ने का काम करेगी, जिस पर हर राजनीतिक विश्लेषक की पैनी नजर बनी रहेगी।

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