September 19, 2026 4:24 pm

बांग्लादेश : पूर्व प्रधानमंत्री हसीना सरकार के समय भारत के साथ हुए 101 समझौतों की होगी समीक्षा

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर से गर्माहट आ गई है, क्योंकि पड़ोसी देश बांग्लादेश से एक बेहद बड़ी और चौंकाने वाली कूटनीतिक खबर सामने आ रही है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन और सत्ता में हुए बड़े राजनीतिक बदलावों के बाद, अब वहां की नई व्यवस्था ने भारत के साथ पिछले वर्षों में हुए 101 समझौतों और ज्ञापनों यानी एमओयू (MoUs) की व्यापक समीक्षा करने का बड़ा फैसला लिया है। इस कदम के सामने आने के बाद से ही कूटनीतिक गलियारों और मीडिया में तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं कि क्या इससे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर कोई असर पड़ेगा। आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, गूगल डिस्कवर की आकर्षक और यूजर-फ्रेंडली शैली, तथा एसईओ और एईओ मानकों को पूरी तरह ध्यान में रखते हुए इस पूरे घटनाक्रम का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है कि आखिर इस समीक्षा के पीछे बांग्लादेश का असली मकसद क्या है।

हसीना सरकार के दौर के 101 समझौतों को खंगालने की क्यों पड़ी जरूरत

बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति में सत्तारूढ़ दल और प्रमुख राजनीतिक ताकतों से जुड़े नेताओं ने इस बात के संकेत दिए हैं कि पिछली सरकार के दौरान जितने भी द्विपक्षीय समझौते और एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए थे, उन सबकी नए सिरे से जांच की जानी चाहिए। अधिकारियों का यह तर्क है कि इनमें से कई समझौते ऐसे थे जिन्हें लेकर यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या वे पूरी तरह से देश के राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते थे या नहीं। इसी सिलसिले में बांग्लादेश संसद के मुख्य सचेतक (Chief Whip) नूरुल इस्लाम मोनी ने स्पष्ट किया है कि इन तमाम 101 समझौतों की समीक्षा का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं इनमें कोई विसंगतियां या खामियां तो नहीं थीं। सरकार का यह भी कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया का मकसद किसी समझौते को रातों-रात रद्द करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि दोनों देशों के बीच के रिश्ते पूरी तरह से पारदर्शी और पारस्परिक लाभ पर आधारित हों।

तारिक रहमान के करीबियों और नई हुकूमत ने समीक्षा के पीछे बताया यह खास मकसद

इस पूरी नीतिगत समीक्षा के पीछे के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए शासन के करीबियों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने मीडिया के सामने खुलकर अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि पिछली अवामी लीग सरकार के कार्यकाल के दौरान कई ऐसे व्यापारिक, परिवहन और बुनियादी ढांचे से जुड़े समझौते हुए थे, जिनमें स्थानीय हितों की जगह दूसरे पक्षों को अधिक प्राथमिकता दी गई थी। उदाहरण के तौर पर चटगांव और मोंगला बंदरगाहों के इस्तेमाल तथा पारगमन यानी ट्रांजिट सुविधाओं से जुड़े नियमों की फिर से पड़ताल की जा रही है ताकि यह देखा जा सके कि इससे देश के अपने समुद्री व्यापार और स्थानीय नौवहन को कोई नुकसान तो नहीं पहुंच रहा है। नई सरकार यह जताना चाहती है कि उनकी विदेश नीति और कूटनीतिक प्राथमिकताएं पूरी तरह से संप्रभुता और घरेलू हितों के दायरे से तय होंगी।

भारत की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक मोर्चे पर क्या पड़ रहा है इसका असर

जैसे ही बांग्लादेश द्वारा इन 101 समझौतों की समीक्षा किए जाने की खबरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलीं, वैसे ही नई दिल्ली की तरफ से भी इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अपने साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में यह स्पष्ट किया कि ढाका की तरफ से इस प्रकार के फैसलों या समझौतों की समीक्षा को लेकर अभी तक भारत सरकार को कोई भी औपचारिक कूटनीतिक संदेश नहीं भेजा गया है। हालांकि, भारत ने यह भी साफ कर दिया है कि वह इन तमाम मीडिया रिपोर्ट्स पर अपनी पूरी नजर बनाए हुए है और देश के रणनीतिक तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए जो भी आवश्यक कदम उठाने होंगे, वे पूरी दृढ़ता के साथ उठाए जाएंगे। जानकारों का मानना है कि दोनों देशों के बीच संवाद के पुराने चैनल अभी भी खुले हुए हैं, लेकिन राजनीतिक बदलावों के बाद कूटनीतिक रिश्तों में एक नया दौर और संवेदनशीलता देखने को मिल रही है।

क्षेत्रीय स्थिरता और द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्तों के भविष्य पर इसके क्या होंगे परिणाम

भारत और बांग्लादेश के बीच के संबंध केवल कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति, मेडिकल टूरिज्म, रेडीमेड गारमेंट्स, बुनियादी ढांचा विकास और सीमा सुरक्षा जैसे कई अहम क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे के बेहद करीब रहे हैं। ऐसे में यदि किसी समझौते में आंशिक बदलाव या प्रशासनिक देरी होती है, तो उसका असर दोनों तरफ के व्यापार और प्रोजेक्ट्स की गति पर पड़ सकता है। हालांकि, बांग्लादेश के नीति निर्माताओं ने भी यह बात कई बार दोहराई है कि वे भारत के साथ दोस्ती और सहयोग के रिश्ते बनाए रखना चाहते हैं, बशर्ते हर समझौता ‘विन-विन’ यानी दोनों पक्षों के लिए समान रूप से फायदेमंद हो। आने वाले हफ्तों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जब मंत्रालयी स्तर पर इन समझौतों की समीक्षा की रिपोर्ट पूरी तरह सामने आती है, तो दोनों पड़ोसी देश मिलकर कूटनीतिक तनाव को दूर करने के लिए कौन सा नया रास्ता चुनते हैं।

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