
सुनवाई के दौरान मंडला जिला अस्पताल की विशेषज्ञ चिकित्सा समिति की रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश की गई. रिपोर्ट के मुताबिक, नाबालिग 31 सप्ताह की गर्भवती है और उसका हीमोग्लोबिन स्तर 7.5 ग्राम है, जो गंभीर एनीमिया की स्थिति का संकेत देता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भ्रूण स्वस्थ और जीवित है और इस स्तर पर गर्भपात नाबालिग के जीवन के लिए बेहद जोखिम भरा हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'एक्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' फैसले का हवाला दिया. अदालत ने कहा कि 24 सप्ताह से अधिक के गर्भ को केवल विशेष परिस्थितियों में ही समाप्त किया जा सकता है, जैसे कि मां के जीवन को गंभीर खतरा हो या भ्रूण में कोई लाइलाज चिकित्सीय विकार हो। वर्तमान मामले में ऐसी कोई स्थिति नहीं पाई गई।
बच्चे की जिम्मेदारी राज्य सरकार ले
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि किशोरी को अस्पताल में भर्ती कराया जाए और आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं और निगरानी प्रदान की जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे के जन्म के बाद उसकी सुरक्षा, देखभाल और पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता या उसके परिवार के सदस्य बच्चे का पालन-पोषण नहीं करना चाहते हैं, तो वे कानूनी प्रक्रिया के तहत गोद लेने के लिए दिशानिर्देश प्राप्त करने के लिए फिर से अदालत का रुख कर सकते हैं।









