मनेंद्रगढ़ के फॉसिलों की अनसुनी कहानी, दिल्ली में बजा सम्मान का ढोल—DFO मनीष कश्यप को राष्ट्रीय पहचान

 

मनेंद्रगढ़ के फॉसिलों की अनसुनी कहानी, दिल्ली में बजा सम्मान का ढोल—DFO मनीष कश्यप को राष्ट्रीय पहचान

मनेंद्रगढ़ (MCB)। पहाड़ियों के बीच बसा शांत सा इलाका… चारों ओर जंगलों की हरियाली… और उन चट्टानों के भीतर छिपी करोड़ों साल पुरानी कहानी—यह वही मनेंद्रगढ़ है, जहाँ धरती के इतिहास ने खुद को पत्थरों में कैद कर रखा था। लोग गुजरते थे, बस गुज़र जाते थे।

उन्हें क्या पता था कि इन पत्थरों में समुद्र की सांसें बंद हैं, उन लहरों की छाप है जो कभी इस धरती पर नृत्य करती थीं। लेकिन कहानी तब बदली, जब मनेंद्रगढ़ के डीएफओ मनीष कश्यप ने इन पत्थरों में दबा इतिहास पढ़ा और उसे दुनिया के सामने लाने का संकल्प लिया।

एक समय था, जब गोंडवाना मैरीन फॉसिल पार्क सिर्फ एक नाम था—न कोई सुविधाएँ, न कोई मार्गदर्शक, न कोई पहचान। जंगल के बीच चुपचाप पड़ा यह क्षेत्र सिर्फ स्थानीय लोगों का गुजरने का रास्ता था। पर मनीष कश्यप ने इसमें भविष्य देखा—एक ऐसा भविष्य जिसमें विज्ञान, पर्यटन, संरक्षण और स्थानीय विकास सब एक साथ खड़े हों।

 

कहते हैं कि बड़ी कहानियाँ छोटे कदमों से शुरू होती हैं।

मनेंद्रगढ़ की यह कहानी भी ऐसे ही शुरू हुई।

 

डीएफओ कश्यप ने सबसे पहले फॉसिलों को पहचान दिलाने का काम शुरू किया। वैज्ञानिकों से चर्चा हुई, शोधकर्ताओं को बुलाया गया, और धीरे-धीरे यह स्थान सिर्फ “जंगल का हिस्सा” न रहकर “धरती का इतिहास” बन गया। फॉसिलों की पहचान की गई, उन्हें संरक्षित रखने के उपाय किए गए, और पर्यटकों तथा छात्रों के लिए समझाने वाले बोर्ड लगाए गए। जंगल के भीतर की खामोशी अब ज्ञान की आवाज से भरने लगी थी।

 

फिर आया पर्यटन का नया अध्याय।

नई पगडंडियाँ बनाई गईं, सूचना केंद्र खड़ा हुआ, फॉसिल पॉइंट तैयार हुए।

जहाँ पहले कुछ ही लोग जाते थे, वहाँ अब परिवार, विद्यार्थी, पर्यटक और वैज्ञानिक आने लगे।

धीरे-धीरे 13,000 से अधिक पर्यटक इस धरोहर को देखने पहुँच चुके हैं।

 

मनेंद्रगढ़ के छोटे दुकानदारों को नई रोज़गार संभावनाएँ मिलीं। स्थानीय गाइड तैयार हुए। गाँव वालों में गर्व जागा कि उनके इलाके की पहचान अब राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है।

 

और इसी कहानी का चरम बिंदु तब आया, जब दिल्ली में आयोजित प्रतिष्ठित Nexus of Good Awards में DFO मनीष कश्यप का नाम घोषित किया गया। मंच पर तालियों की गूंज के बीच जब उन्हें पुरस्कार मिला, तो वह सिर्फ एक अधिकारी की उपलब्धि नहीं थी—वह मनेंद्रगढ़ की मिट्टी का मान था, उन फॉसिलों की जीत थी जो सदियों से पहचान की प्रतीक्षा में थे।

 

पुरस्कार के साथ यह संदेश भी स्पष्ट हो गया कि यदि संकल्प ईमानदार हो, तो छोटे से इलाके में भी वैश्विक धरोहर को पहचान दिलाई जा सकती है। मनेंद्रगढ़ का गोंडवाना मैरीन फॉसिल पार्क अब राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है।

 

आज जब लोग फॉसिल पार्क की पगडंडियों पर चलते हैं, तो उन्हें सिर्फ चट्टानें नहीं दिखतीं—उन्हें करोड़ों वर्षों की कहानी दिखती है। और उस कहानी का नया अध्याय लिखने वाले एक ऐसे अधिकारी हैं जिन्होंने मनेंद्रगढ़ की धरोहर में जान डाल दी।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R No. 13379/ 46

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?