
मनेंद्रगढ़ में पांच घंटे का ‘तानाशाही महाभारत’ — भालुओं के बहाने, डीएफओ के रवैये पर गरजे नेता
मनेन्द्रगढ़, एमसीबी जिला।
गुरुवार का दिन मनेंद्रगढ़ में राजनीति, नारेबाजी और गुस्से का मिला-जुला मेला बन गया। भालुओं के शहर में खुलेआम विचरण और घरों में घुसने की शिकायत लेकर नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिमा यादव, उपाध्यक्ष धर्मेंद्र पटवा, वार्ड पार्षद और अन्य जनप्रतिनिधि डीएफओ मनीष कश्यप से मिलने पहुंचे थे। लेकिन मुलाकात में जो हुआ, उसने पूरे माहौल को गर्मा दिया।
कहानी की शुरुआत सामान्य थी—जनप्रतिनिधि, जनता की सुरक्षा को लेकर चर्चा करने आए थे। लेकिन आरोप है कि डीएफओ ने ‘अधिकार’ की कुर्सी पर बैठते ही ‘तानाशाही मोड’ ऑन कर लिया और अभद्र व्यवहार किया। जैसे ही यह खबर बाहर निकली, डीएफओ कार्यालय के सामने नारेबाजी शुरू हो गई—
“डीएफओ हटाओ! भ्रष्टाचार रोको!”
भालुओं से ज्यादा खतरनाक डीएफओ?
भीड़ बढ़ने लगी। भाजपा के नेता, कार्यकर्ता और यहां तक कि कांग्रेस के कुछ जनप्रतिनिधि भी विरोध में कूद पड़े। भरतपुर-सोनहत की विधायक रेणुका सिंह, पूर्व विधायक गुलाब कमरों, कैबिनेट मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के प्रतिनिधि सरजू यादव—सबके कदम विरोध की तरफ मुड़ गए। आरोपों की झड़ी लग गई—वन विभाग में अवैध काम, निर्माण कार्यों में गड़बड़ी, शिकायतों को ठंडे बस्ते में डालना।
एक बुजुर्ग पार्षद ने तंज कसा—
> “साहब, भालू तो सिर्फ खेत में आता है, ये तो घर में घुसकर मनमानी करता है।”
पुराना रिकॉर्ड भी खोला गया
किसी ने याद दिलाया कि बैकुंठपुर में पदस्थ रहते हुए भी इन पर तानाशाही का आरोप लगा था और तत्कालीन सरकार ने फोन पर ही कार्रवाई कर दी थी।
एक कार्यकर्ता बोला—
> “शेर की खाल में भालू छुपा हो, तो उससे न भालू डरता है न शेर।”
पांच घंटे का ‘चैंबर से बाहर न निकलने’ का खेल
करीब पांच घंटे तक डीएफओ अपने चेंबर में ही बैठे रहे। बाहर नारेबाजी होती रही, अंदर सन्नाटा। शाम पांच बजे तक विरोध का यह ‘राजनीतिक महाकुंभ’ जारी रहा।
आखिर भाजपा जिला अध्यक्ष चंपा देवी पावले और विधायक रेणुका सिंह, एसडीएम के और अपमानित जनप्रतिनिधियों के साथ डीएफओ से मिलने अंदर गईं। बाहर खड़े समर्थकों ने उम्मीद बांध ली—“अब तो माफी ही माफी।”
लेकिन…
बंद कमरे में लंबी बातचीत के बाद जो खबर बाहर आई, उसने सबके अरमानों पर पानी फेर दिया—डीएफओ ने केवल “खेद प्रकट” किया, माफी का नाम तक नहीं लिया।
एक युवा नेता ने खीझकर कहा—
> “हम तो समझे थे सत्ता हमारी है, तो हमारी सुनी जाएगी… यहां तो डीएफओ की सुनाई जा रही है।”
अंत में—सवाल बाकी है
विरोध खत्म हुआ, नेता लौट गए, लेकिन सवाल हवा में तैर रहा है—आखिर कब तक डीएफओ का यह रवैया चलेगा? और क्या अगली बार भालुओं के साथ-साथ जनता को भी वन विभाग की ‘मानव तानाशाही’ से जूझना पड़ेगा?








