
पितृपक्ष (Pitru Paksha 2026) के इन पावन और आध्यात्मिक दिनों में हर कोई अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन करा रहा है। पितृपक्ष के सोलह दिनों में आने वाली तिथियों का सनातन धर्म में बहुत बड़ा महत्व होता है, जिनमें मातृ नवमी (Matri Navami 2026) की तिथि का स्थान सबसे विशिष्ट माना जाता है। इस विशेष दिन को ‘अविघ्न नवमी’ या ‘सौभाग्यवती नवमी’ भी कहा जाता है, जो परिवार की उन दिवंगत महिलाओं—जैसे माता, दादी, नानी, चाची और अन्य मातृ शक्ति—को समर्पित होती है, जिनका निधन परिवार में जीवित रहते हुए हुआ था। इस वर्ष मातृ नवमी की तिथि को लेकर लोगों के मन में यह असमंजस बना हुआ है कि यह पर्व 4 अक्टूबर को है या 5 अक्टूबर को, जिसके कारण सही तारीख और शुभ मुहूर्त को जानना बेहद आवश्यक हो गया है। पंचांग और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, मातृ नवमी का यह पावन श्राद्ध कर्म उन सभी महिला पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा अवसर है जिन्होंने अपने परिवार के संस्कार और उसकी नींव को मजबूत करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। आइए इस विस्तृत लेख में जानते हैं मातृ नवमी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, तर्पण विधि और इससे जुड़े सभी महत्वपूर्ण धार्मिक नियमों के बारे में।
हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी का श्राद्ध किया जाता है। इस वर्ष 2026 में आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि का प्रारंभ और समापन का जो नक्षत्र व तिथि गणितीय संयोग बन रहा है, उसके अनुसार मातृ नवमी का यह महत्वपूर्ण श्राद्ध कर्म मुख्य रूप से 4 अक्टूबर 2026 को ही मान्य और निर्धारित किया गया है। उदया तिथि और मध्याह्न काल (दोपहर का समय) को ध्यान में रखते हुए, जिस समय पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान किया जाता है, वह 4 अक्टूबर का दिन सबसे उत्तम और शास्त्रसम्मत माना गया है। जो लोग अपने परिवार की दिवंगत माताओं, सुहागिन स्त्रियों और अन्य महिला परिजनों का श्राद्ध करना चाहते हैं, वे इसी दिन विधि-विधान से अनुष्ठान संपन्न कर सकते हैं। सही तिथि पर श्राद्ध करने से ही पितरों को उसका पूर्ण भाग प्राप्त होता है और उनका आशीर्वाद पूरे परिवार पर सदैव बना रहता है।
आम तौर पर पितृपक्ष में लोग अपने परिवार के पुरुषों और बुजुर्गों के श्राद्ध तिथि पर उनका तर्पण करते हैं, लेकिन सर्वपितृ अमावस्या से पहले आने वाली मातृ नवमी एक ऐसा दिन है जब परिवार की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध एक साथ किया जा सकता है। चाहे वे घर की सुहागिन महिला रही हों या फिर ऐसी स्त्रियां जिनका निधन किसी भी आयु में हुआ हो, मातृ नवमी के दिन उन सभी के निमित्त भोजन, वस्त्र और जल अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी परिवार को अपनी किसी महिला पूर्वज की मृत्यु की तिथि (देहांत का दिन) याद न हो, तो भी वे मातृ नवमी के दिन उनका श्राद्ध और पिंडदान करके उन्हें तृप्त कर सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन माताएं और कुल की स्त्रियां अपने वंशजों को सुख, समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देने के लिए पृथ्वी लोक पर सूक्ष्म रूप में आती हैं।
मातृ नवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए और साफ-सुथरे स्थान पर पूजा की वेदी तैयार करनी चाहिए। श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर के समय यानी कुतुप काल और रौहिण काल में करना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि यही वह समय होता है जब पितृगण हमारे द्वार पर तृप्ति की आशा में आते हैं। पूजा के दौरान एक पाटे पर पीला या सफेद कपड़ा बिछाकर अपनी महिला पूर्वजों की तस्वीर या कुश के आसन पर उनके नाम का स्मरण करते हुए जल, दूध, काले तिल, जौ, कुशा और सफेद फूल अर्पित करने चाहिए। इसके बाद पूरी श्रद्धा के साथ ‘पिंडदान’ करें और गाय, कुत्ते, कौवे तथा चीटियों के लिए भोजन का एक हिस्सा निकालकर उन्हें आदरपूर्वक खिलाएं। ब्राह्मण को या किसी जरूरतमंद सुहागिन महिला को भोजन कराना और वस्त्र दान करना इस दिन का सबसे बड़ा पुण्यकारी कार्य माना जाता है।
मातृ नवमी या किसी भी अन्य श्राद्ध कर्म को करते समय कुछ विशेष नियमों और पवित्रता का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। इस दिन घर में सात्विक भोजन ही बनना चाहिए और लहसुन-प्याज या मांसाहारी भोजन का पूर्ण रूप से त्याग करना चाहिए। श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को मन में पूरी तरह से शांति, पवित्रता और पितरों के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए, क्योंकि गुस्से या नकारात्मकता के साथ किया गया अनुष्ठान पूर्ण फल नहीं देता है। इस दिन गरीबों और ब्राह्मणों का अपमान करने से बचना चाहिए और यथाशक्ति दान-पुण्य करना चाहिए। जब आप पूरी निष्ठा और विधि-विधान के साथ अपनी माता और कुल की देवियों का स्मरण करते हैं, तो पितृ दोष शांत होता है और घर में आ रही तमाम बाधाएं स्वतः दूर होने लगती हैं।
संक्षेप में कहें तो मातृ नवमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारी उस महान संस्कृति का परिचायक है जो अपने पुरखों और विशेषकर महिलाओं के त्याग को कभी नहीं भूलती। 4 अक्टूबर 2026 को पड़ने वाली इस मातृ नवमी पर पूरी आस्था के साथ अपने पितरों का तर्पण करें, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को खुशहाल बनाएं। आपके द्वारा किया गया यह छोटा सा प्रयास आपके पूरे परिवार को सुख, शांति, ऐश्वर्य और अटूट सफलता प्रदान करेगा, जिससे आपकी पीढ़ियां हमेशा सुरक्षित और समृद्ध रहेंगी।


















