
भारतीय चिकित्सा शिक्षा प्रणाली और मेडिकल छात्रों के करियर के सबसे कठिन तथा प्रतिष्ठित पड़ाव माने जाने वाले एनईईट पीजी (NEET PG) की परीक्षा पास करने के बाद जब कोई युवा डॉक्टर जूनियर रेजिडेंट (Junior Resident) के रूप में देश के किसी मेडिकल कॉलेज या अस्पताल में प्रवेश करता है, तो उसके मन में पढ़ाई के साथ-साथ मिलने वाले स्टाइपेंड (Stipend) को लेकर भी कई सवाल और उम्मीदें होती हैं। दिन-रात की लंबी ड्यूटी, आईसीयू का तनाव, मरीजों की लगातार बढ़ती भीड़ और 24 से 36 घंटे तक लगातार अस्पताल में जागकर काम करने के बाद इन युवा डॉक्टरों को मिलने वाला मासिक मानदेय उनकी उस कठिन मेहनत का एक बहुत बड़ा आर्थिक संबल होता है। लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों और केंद्रीय संस्थानों में मिलने वाले इस स्टाइपेंड की राशि में भारी असमानता देखने को मिलती है, जिससे कई बार छात्रों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर किस राज्य में मेडिकल पीजी के दौरान सबसे ज्यादा भुगतान किया जाता है। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के दिशा-निर्देशों के बावजूद देश के विभिन्न राज्यों में राज्य सरकारों द्वारा तय किए जाने वाले बजट और नियमों के कारण मिलने वाली राशि में जमीन-आसमान का फर्क बना हुआ है। आइए इस विस्तृत और विशेष रिपोर्ट में जानते हैं कि एनईईट पीजी की पढ़ाई के दौरान देश के किस राज्य में डॉक्टर्स को सबसे ज्यादा स्टाइपेंड मिलता है और इसकी पूरी व्यवस्था कैसी है।
NEET PG के बाद जूनियर रेजिडेंट्स का संघर्ष और स्टाइपेंड की अनिवार्यता का महत्व
जब कोई छात्र एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री पूरी करने के बाद एमडी (MD) या एमएस (MS) जैसी स्पेशलाइजेशन की डिग्री हासिल करने के लिए एनईईट पीजी की काउंसलिंग प्रक्रिया के जरिए किसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेता है, तो वह एक छात्र होने के साथ-साथ उस अस्पताल का पूर्णकालिक जूनियर डॉक्टर भी बन जाता है। मेडिकल पीजी की यह पढ़ाई अन्य साधारण पोस्ट-ग्रेजुएशन पाठ्यक्रमों से बिल्कुल अलग होती है, क्योंकि इसमें छात्रों को किताबों के साथ-साथ अस्पतालों की इमरजेंसी, वार्ड और ऑपरेशन थिएटर में मरीजों की जान बचाने की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। इस दौरान वे दिन का अधिकांश समय अस्पताल की सेवा में बिताते हैं, जिसके चलते वे किसी अन्य जगह पर पार्ट-टाइम काम करके अपनी आजीविका नहीं चला सकते। यही कारण है कि सरकार द्वारा उन्हें हर महीने मिलने वाला स्टाइपेंड उनके जीवनयापन, किताबों के खर्च और मानसिक स्थिरता के लिए बेहद जरूरी माना जाता है, ताकि वे बिना किसी आर्थिक तनाव के पूरी निष्ठा से अपनी पढ़ाई और मरीजों के इलाज पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
राज्यों के बीच भारी असमानता: देश के विभिन्न हिस्सों में मिलने वाले स्टाइपेंड की वर्तमान स्थिति
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) का यह नियम स्पष्ट रूप से कहता है कि मेडिकल कॉलेज में काम करने वाले सभी रेजिडेंट डॉक्टर्स को उस राज्य या संस्थान के समकक्ष डॉक्टरों के बराबर ही स्टाइपेंड मिलना चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग नजर आती है। देश के कुछ चुनिंदा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छोड़कर अधिकांश राज्यों में आज भी जूनियर रेजिडेंट्स को मिलने वाला मासिक मानदेय उनकी मेहनत और काम के घंटों के मुकाबले बेहद कम है। उदाहरण के लिए, देश के कुछ दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में जहां स्टाइपेंड की राशि एक लाख रुपये प्रति महीने के आसपास पहुंच चुकी है, वहीं कई पूर्वोत्तर और मध्य भारत के राज्यों में आज भी पीजी छात्रों को काफी कम मानदेय से संतोष करना पड़ता है। इस आर्थिक असमानता को लेकर पिछले कई वर्षों से रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (RDA) द्वारा लगातार यह मांग उठाई जा रही है कि पूरे देश में ‘वन नेशन, वन स्टाइपेंड’ (One Nation, One Stipend) की नीति लागू की जानी चाहिए ताकि हर डॉक्टर को उसकी योग्यता और मेहनत के अनुसार समान न्याय मिल सके।
किस राज्य में मिलता है सबसे ज्यादा स्टाइपेंड? जानिए टॉप पर कौन-से राज्य और संस्थान हैं शामिल
जब बात यह आती है कि देश में सबसे ज्यादा स्टाइपेंड किस राज्य या संस्थान में दिया जाता है, तो उसमें केंद्र सरकार के अधीन आने वाले संस्थान जैसे एम्स (AIIMS), सफदरजंग, और जिपमेर (JIPMER) का नाम सबसे ऊपर आता है, जहां पहले साल के रेजिडेंट को लगभग 1.10 लाख रुपये से लेकर 1.20 लाख रुपये तक प्रति माह वेतन मिलता है। वहीं अगर राज्य स्तर पर बात की जाए, तो दिल्ली सरकार के अधीन आने वाले मेडिकल कॉलेजों में भी पीजी छात्रों को सबसे अधिक लगभग 1.11 लाख रुपये से शुरू होकर वरिष्ठता के साथ बढ़ने वाला स्टाइपेंड प्रदान किया जाता है। इसके अलावा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में भी राज्य सरकारों ने हाल के वर्षों में अपने बजट में संशोधन करके स्टाइपेंड की राशि को काफी हद तक बढ़ाया है, जिससे वहां के छात्रों को बड़ी राहत मिली है। इसके विपरीत, कई ऐसे राज्य भी हैं जहां आज भी स्टाइपेंड की राशि 50 हजार से 70 हजार रुपए के बीच ही सिमटी हुई है, जिससे वहां के मेडिकल छात्रों में लगातार नाराजगी देखने को मिलती है।
महंगाई और काम के भारी दबाव के बीच स्टाइपेंड बढ़ोतरी की मांग क्यों बन चुकी है जरूरी?
आज के दौर में मेडिकल पीजी की पढ़ाई करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है, जहां छात्रों को अत्यधिक मानसिक और शारीरिक दबाव के बीच काम करना पड़ता है। बड़े शहरों में रहने का खर्च, महंगे मेडिकल जर्नल्स, रिसर्च प्रोजेक्ट्स का खर्च और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालते हुए कम स्टाइपेंड में गुजारा करना कई युवा डॉक्टरों के लिए मानसिक अवसाद का कारण बन जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) का यह बार-बार कहना रहा है कि जब तक देश के सभी राज्यों में डॉक्टरों के लिए एकमानक और सम्मानजनक स्टाइपेंड की व्यवस्था लागू नहीं होगी, तब तक देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले इन युवा डॉक्टरों का मनोबल पूरी तरह ऊंचा नहीं रह पाएगा। केंद्र सरकार और विभिन्न राज्यों के स्वास्थ्य विभागों को मिलकर इस गंभीर विषय पर एक ठोस नीति तैयार करने की आवश्यकता है, जिससे किसी भी मेडिकल छात्र को आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े।
भविष्य की उम्मीदें और मेडिकल छात्रों के लिए सरकार के नए दिशा-निर्देश
राहत की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट और नेशनल मेडिकल कमीशन के बढ़ते हस्तक्षेप के बाद अब देश के कई राज्य धीरे-धीरे अपने यहां के मेडिकल छात्रों के स्टाइपेंड को संशोधित करने की दिशा में सकारात्मक कदम उठा रहे हैं। कई राज्यों में अब हर साल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर स्टाइपेंड में स्वतः बढ़ोतरी करने का नियम भी बनाया जा रहा है, ताकि महंगाई के हिसाब से डॉक्टरों को आर्थिक सुरक्षा मिल सके। एनईईट पीजी की तैयारी करने वाले देश भर के लाखों युवा जो दिन-रात मेहनत करके इन मेडिकल सीटों को हासिल करते हैं, वे यह उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में उन्हें अपनी मेहनत का उचित और सम्मानजनक सिला जरूर मिलेगा। कुल मिलाकर, मेडिकल पीजी की पढ़ाई के दौरान मिलने वाला स्टाइपेंड केवल एक वेतन नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य के उन विशेषज्ञ डॉक्टरों के प्रति समाज और सरकार का वह सम्मान है जो वे हमारी सेहत की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं।


















