September 22, 2026 11:21 am

‘2 अक्टूबर तक करूंगा इंतजार, बाद में रोना मत’: ओवैसी ने सपा को दिया खुला अल्टीमेटम, बोले- BJP को रोकना है तो साथ आओ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने यूपी के सियासी गलियारों में बड़ा दांव चल दिया है। कानपुर में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और अन्य गैर-भाजपा विपक्षी दलों के पाले में गेंद डालते हुए सीधे तौर पर गठबंधन का खुला प्रस्ताव पेश किया है। मंच से कड़े तेवर दिखाते हुए ओवैसी ने साफ कहा कि वे राज्य में तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने से रोकने के लिए हाथ मिलाने को पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन विपक्षी दलों को इस पर फैसला लेने के लिए केवल 2 अक्टूबर तक का समय है। इसके बाद AIMIM अपनी अलग राह तय करेगी।

कानपुर के छावनी क्षेत्र स्थित बाबूपुरवा ईदगाह मैदान में मुस्लिम युवाओं की भारी भीड़ को संबोधित करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने विपक्षी दलों की हिचकिचाहट पर करारा प्रहार किया। ओवैसी ने कहा कि अक्सर कुछ राजनीतिक दल उनके बार-बार गठबंधन की बात करने को राजनीतिक मजबूरी या कमजोरी समझ लेते हैं। उन्होंने मंच से दो टूक चेतावनी देते हुए कहा, “अगर कोई राजनीतिक पार्टी मेरे बयानों को कमजोरी समझने की भूल कर रही है, तो मैं बड़े अदब से कहना चाहता हूं कि यह केवल तूफान से पहले की खामोशी है। इसे हमारी लाचारी कतई न समझें। हम भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए ईमानदारी से साथ आने की पेशकश कर रहे हैं।”

ओवैसी ने स्पष्ट किया कि कोई भी दल अकेले दम पर सत्ताधारी दल को हराने में सक्षम नहीं है। यदि विपक्षी दल वास्तव में ‘बाबा’ (योगी आदित्यनाथ) को दोबारा मुख्यमंत्री बनने से रोकना चाहते हैं, तो उन्हें धर्मनिरपेक्षता का ढोंग छोड़कर जमीनी हकीकत स्वीकार करनी होगी और एआईएमआईएम से हाथ मिलाना होगा।

ओवैसी ने अपने भाषण में 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) की तारीख को निर्णायक बताते हुए विपक्षी खेमे को अल्टीमेटम थमा दिया। उन्होंने कहा, “मैं केवल 2 अक्टूबर तक इंतजार करूंगा। अगर विपक्षी दल साथ आने को तैयार होते हैं तो ठीक, वरना 2 अक्टूबर के बाद हम जिससे भी चाहेंगे गठबंधन करेंगे और मजबूती से पूरे राज्य में चुनाव लड़ेंगे। इसके बाद परिणाम आने पर कोई हम पर वोट काटने या भाजपा की मदद करने का झूठा आरोप न लगाए और चुनाव हारने के बाद कोई रोना न रोए।”

ओवैसी ने इस दौरान बिहार विधानसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए याद दिलाया कि सीमांचल में उनकी पार्टी ने महज 6 सीटों की मांग की थी, लेकिन विपक्षी महागठबंधन ने उनका मजाक उड़ाया था। इसके बावजूद जनता ने AIMIM के पक्ष में मतदान किया और उनके उम्मीदवारों को जीत दिलाई। ओवैसी ने कहा कि यूपी में भी मुसलमानों को अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज और हिस्सेदारी की दरकार है, न कि केवल किसी दल का बंधुआ वोट बैंक बने रहने की।

समाजवादी पार्टी पर सीधा हमला बोलते हुए ओवैसी ने अखिलेश सरकार के कार्यकाल के ट्रैक रिकॉर्ड को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने जनसभा में मौजूद लोगों से पूछा, “जब आपके ‘अखिलेश भैया’ मुख्यमंत्री थे, तब उत्तर प्रदेश में कितने दंगे हुए थे?” उन्होंने वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि उस त्रासदी में 50 हजार से अधिक लोग अपने ही घरों से बेघर और विस्थापित हो गए थे।

ओवैसी ने आरोप लगाया कि सपा समेत तथाकथित सेक्युलर दलों ने दशकों तक मुसलमानों के वोटों से सत्ता का सुख भोगा, लेकिन समुदाय की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक बदहाली दूर करने के लिए ठोस काम नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि जब भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात आती है, तो मुस्लिम नेतृत्व को किनारे कर दिया जाता है। इसके अलावा, हाल ही में केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी को लेकर सपा प्रमुख द्वारा की गई टिप्पणी का भी ओवैसी ने विरोध किया और कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन किसी के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाना अशोभनीय मानसिकता का प्रमाण है।

अपने संबोधन में ओवैसी ने राज्य की भाजपा सरकार पर भी तीखा वार किया। उन्होंने राज्य में मदरसों की जांच, कानूनी कदमों और बुलडोजर एक्शन पर निशाना साधते हुए कहा कि ऐतिहासिक धरोहरों, मस्जिदों और कब्रिस्तानों को निशाना बनाया जा रहा है। ओवैसी ने स्वतंत्रता संग्राम में कानपुर के मदरसों और उलेमाओं के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ फतवे जारी किए, आज उन्हीं की देशभक्ति पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

ओवैसी ने जनता से अपील की कि वे एकजुट होकर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करें और किसी भी कीमत पर वोटों का बिखराव न होने दें। कानपुर की इस सभा और 2 अक्टूबर के अल्टीमेटम ने अब समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति के कर्ता-धर्ताओं को गंभीर असमंजस में डाल दिया है कि वे ओवैसी के इस समझौते के प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं या 2027 की लड़ाई में एक बार फिर त्रिकोणीय मुकाबले का जोखिम उठाते हैं।

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