
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों में उस समय एक बड़ा भूचाल आ गया जब पड़ोसी देश बांग्लादेश की अंतरिम और कार्यवाहक सरकार ने भारत के साथ अपने रिश्तों को लेकर एक बेहद सख्त और अप्रत्याशित कदम उठाया। पड़ोसी मुल्क में हुए बड़े राजनीतिक सत्ता परिवर्तन और उथल-पुथल के बाद अब वहाँ की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है, जहाँ बांग्लादेश ने भारत के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों में सैन्य, सामरिक और प्रशासनिक प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके अपने तमाम वरिष्ठ और मध्यम स्तर के अधिकारियों की उच्च स्तरीय जाँच शुरू करने का फैसला किया है। इसके साथ ही, पिछले कुछ दशकों के दौरान भारत और बांग्लादेश के बीच हुए कुल 101 द्विपक्षीय समझौतों, व्यापारिक करारों और रणनीतिक संधियों की व्यापक समीक्षा (Review of Agreements) करने का भी आधिकारिक ऐलान कर दिया गया है। इस कड़े और संदेहास्पद प्रशासनिक रुख के पीछे वहाँ की कमान संभाल रहे राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व की मंशा को लेकर दुनिया भर के कूटनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, जिससे दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक रूप से जुड़े पारंपरिक संबंधों में एक नया तनाव और अनिश्चितता का दौर शुरू होता हुआ दिखाई दे रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें पिछले साल बांग्लादेश में हुए उस हिंसक छात्र आंदोलन और जनआंदोलन में निहित हैं जिसके परिणामस्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपनी सत्ता छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। इसके बाद से ही देश की सत्ता पर काबिज हुए नए नेतृत्व और तारिक रहमान से जुड़े राजनीतिक समीकरणों के प्रभाव में वहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था में भारत विरोधी और पक्षपाती दृष्टिकोण रखने वाले तत्वों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। नई व्यवस्था का मानना है कि पिछले कई दशकों से भारत के नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA), डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज (DSSC) और अन्य सिविल सेवा संस्थानों से ट्रेनिंग लेकर लौटे अधिकारी भारत के प्रति नरम रुख रखते हैं या दोनों देशों के बीच हुए समझौतों में भारत के हितों को ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। इसी राजनीतिक और वैचारिक पूर्वाग्रह के चलते अब प्रशासनिक स्तर पर एक ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है जहाँ हर उस अधिकारी की निष्ठा और पृष्ठभूमि पर सवालिया निशान लगाया जा रहा है, जिसने कभी भारतीय जमीन पर रहकर पेशेवर प्रशिक्षण हासिल किया था। इस प्रकार की संकीर्ण राजनीतिक सोच न केवल प्रशासनिक दक्षता को प्रभावित कर रही है, बल्कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच आपसी विश्वास के ताने-बाने को भी अंदर से खोखला करने का काम कर रही है।
भारत के विश्वस्तरीय और अत्याधुनिक सैन्य व सिविल ट्रेनिंग संस्थानों से प्रशिक्षण प्राप्त करना दुनिया भर के कई मित्र देशों के लिए हमेशा से गर्व की बात रही है, क्योंकि यहाँ से निकलने वाले अधिकारी अपनी अनुशासित कार्यशैली और पेशेवर दक्षता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन बांग्लादेश सरकार द्वारा इन अधिकारियों की विशेष जाँच कराने के फैसले से वहाँ के प्रशासनिक ढांचे और सैन्य बलों (Bangladesh Armed Forces) के भीतर भारी असमंजस, अविश्वास और मानसिक तनाव का माहौल पैदा हो गया है। जब देश की रक्षा और सुरक्षा से जुड़े अनुभवी अफसरों को केवल इस आधार पर संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगे कि उन्होंने किस देश से ट्रेनिंग ली है, तो इससे पूरी कार्यप्रणाली का मनोबल गिरता है। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की राजनीतिक बदले की भावना या अनावश्यक संशय से बांग्लादेश की अपनी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था और संस्थागत स्थिरता कमजोर होगी, क्योंकि योग्य और पेशेवर अधिकारियों को हाशिए पर धकेलने से प्रशासनिक सेवाओं में खालीपन और अक्षमता की स्थिति पैदा हो सकती है, जिसका खामियाजा अंततः खुद उसी देश की जनता को भुगतना पड़ेगा।
केवल सैन्य अधिकारियों की जाँच तक ही मामला सीमित नहीं है, बल्कि बांग्लादेश सरकार द्वारा भारत के साथ हुए 101 महत्वपूर्ण द्विपक्षीय समझौतों की व्यापक समीक्षा करने का निर्णय आर्थिक और रणनीतिक मोर्चे पर भी गहरी चिंताएं पैदा कर रहा है। पिछले डेढ़ दशकों में भारत के सहयोग से दोनों देशों के बीच सीमा पार रेल संपर्क, अंतर्देशीय जलमार्ग, ऊर्जा आपूर्ति (बिजली और ईंधन के करार), बुनियादी ढांचा विकास और मुक्त व्यापार से जुड़े दर्जनों ऐसे प्रोजेक्ट्स जमीन पर उतरे हैं जिन्होंने दोनों अर्थव्यवस्थाओं को करीब लाने में अहम भूमिका निभाई है। अब यदि राजनीतिक कारणों से इन सभी ऐतिहासिक समझौतों को रद्द करने, उनमें फेरबदल करने या उन्हें नए सिरे से उलझाने का प्रयास किया जाता है, तो इससे भारत के साथ-साथ बांग्लादेश के अपने आर्थिक विकास को भी तगड़ा झटका लगेगा। भारत से मिलने वाली सस्ती बिजली, पारगमन सुविधाएं और व्यापारिक रियायतें यदि राजनीतिक सनक की भेंट चढ़ती हैं, तो इससे बांग्लादेश के भीतर महंगाई बढ़ेगी और निवेशकों का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा, जिससे वहाँ का औद्योगिक और व्यावसायिक भविष्य गहरे संकट में पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत के विदेश मंत्रालय और रणनीतिक विशेषज्ञों की पैनी नजर बनी हुई है, और नई दिल्ली ने बेहद संयमित लेकिन दृढ़ रुख अपनाते हुए स्थिति पर नजर रखना शुरू कर दिया है। भारत हमेशा से यह मानता आया है कि किसी भी देश के साथ उसके कूटनीतिक और द्विपक्षीय संबंध वहाँ की किसी खास राजनीतिक पार्टी या सरकार के आने-जाने से ऊपर उठकर दोनों देशों की जनता के आपसी हितों पर टिके होने चाहिए। इसके बावजूद, यदि बांग्लादेश का वर्तमान नेतृत्व जानबूझकर भारत विरोधी एजेंडे को बढ़ावा देता है और रणनीतिक समझौतों को कमजोर करने की कोशिश करता है, तो भारत भी अपनी सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कड़े और आवश्यक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। दक्षिण एशिया के इस संवेदनशील भू-राजनीतिक परिदृश्य में बांग्लादेश के इस रुख से क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ना तय माना जा रहा है, और आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद के रास्ते और अधिक कठिन तथा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, जिस पर पूरी दुनिया के सामरिक विश्लेषकों की निगाहें टिकी हुई हैं।








