September 19, 2026 4:23 pm

केरल की पहली आदिवासी महिला IAS श्रीधन्या सुरेश की संघर्ष गाथा: UPSC इंटरव्यू के लिए नहीं थे जेब में पैसे

सफलता जब कड़ी मेहनत, अटूट संघर्ष और कभी हार ना मानने वाले जज्बे के साथ मिलती है, तो वह इतिहास बन जाती है। कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक और दिल को छू लेने वाली कहानी है केरल की पहली आदिवासी महिला आईएएस अधिकारी श्रीधन्या सुरेश (Sreedhanya Suresh) की, जिन्होंने अपनी जिंदगी के हर मोड़ पर विपरीत परिस्थितियों का डटकर सामना किया। वायनाड के एक बेहद साधारण और पिछड़े आदिवासी परिवार से ताल्लुक रखने वाली श्रीधन्या के लिए आईएएस (IAS) बनने का यह सफर फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों भरा रास्ता था। एक ऐसा समय भी उनकी जिंदगी में आया जब यूपीएससी (UPSC) के इंटरव्यू के लिए दिल्ली जाने तक के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे, और वे अपनी शुरुआती पढ़ाई के दौरान हर रोज मीलों का सफर पैदल तय करती थीं। आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, गूगल डिस्कवर की यूजर-फ्रेंडली और आकर्षक शैली, तथा एसईओ और एईओ मानकों को पूरी तरह ध्यान में रखते हुए इस प्रेरणादायक जीवन गाथा का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है कि आखिर कैसे श्रीधन्या ने संघर्षों के आंधियों को चीरकर देश की सबसे कठिन परीक्षा में सफलता का परचम लहराया।

केरल के वायनाड जिले के एक बेहद गरीब आदिवासी परिवार से जुड़ा शुरुआती संघर्ष

केरल के खूबसूरत लेकिन आदिवासी बहुल और पिछड़े जिले वायनाड के इडियमकुडी गांव में जन्मीं श्रीधन्या सुरेश का शुरुआती जीवन अभावों और तंगहाली के साये में बीता। उनके माता-पिता दैनिक मजदूरी करते थे और परिवार का गुजारा चलाना भी बेहद मुश्किल हुआ करता था। आर्थिक तंगी इतनी अधिक थी कि कई बार दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी संघर्ष बन जाता था। इन तमाम मुश्किलों के बावजूद उनके माता-पिता ने अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में कभी कोई कमी नहीं आने दी और उन्हें शिक्षित करने का संकल्प लिया। ग्रामीण इलाके में होने के कारण पक्की सड़कों और परिवहन के साधनों का अभाव था, जिसके चलते छोटी उम्र से ही श्रीधन्या को अपनी बुनियादी पढ़ाई पूरी करने के लिए रोज अपने घर से स्कूल तक की दूरी पैदल ही तय करनी पड़ती थी।

स्कूल और कॉलेज के दिनों में पढ़ाई के प्रति लगन और मीलों पैदल चलने का सफर

श्रीधन्या अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि उनके गांव से स्कूल की दूरी लगभग चार किलोमीटर थी, जिसे वे हर रोज पैदल चलकर ही तय करती थीं। उस दौर में न तो पक्के रास्ते थे और न ही उनके पास साइकिल जैसी कोई सुविधा थी, लेकिन शिक्षा के प्रति उनकी लगन और कुछ कर दिखाने का जज्बा इतना मजबूत था कि धूप, बारिश या ठंड—हर मौसम में उनके कदम कभी नहीं रुके। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कालीकट यूनिवर्सिटी से अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की और इसके बाद तिरुवनंतपुरम से एप्लाइड जूलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया। अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने कई तरह की छोटी-मोटी नौकरियों और छात्रवृत्तियों के सहारे अपने खर्चों को मैनेज किया, लेकिन उनके भीतर सिविल सेवा (Civil Services) में जाने का सपना पल-पल मजबूत होता जा रहा था।

जब UPSC इंटरव्यू के लिए नहीं थे पैसे, दोस्तों की मदद से तय किया दिल्ली का सफर

श्रीधन्या सुरेश के जीवन का सबसे संघर्षपूर्ण और परीक्षा की घड़ी वह दौर था जब उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर देश की सबसे प्रतिष्ठित यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के मुख्य चरण को पास कर लिया और उन्हें इंटरव्यू के लिए दिल्ली बुलाया गया। लेकिन इस बड़ी खुशी के साथ उनके सामने सबसे बड़ा आर्थिक संकट यह खड़ा हो गया कि उनके परिवार के पास दिल्ली जाने के लिए ट्रेन या हवाई जहाज के टिकट के पैसे तक नहीं थे। ऐसे कठिन समय में उनके कुछ शुभचिंतक दोस्तों और कॉलेज के प्रोफेसरों ने आगे आकर उनकी आर्थिक मदद की और आपस में चंदा इकट्ठा करके उनके लिए दिल्ली जाने का किराया जुटाया। जब वे पहली बार दिल्ली के धौलपुर हाउस स्थित यूपीएससी बोर्ड के सामने इंटरव्यू के लिए बैठीं, तो उनके पास न तो महंगे कपड़े थे और न ही कोई हाई-फाई कोचिंग का अनुभव, लेकिन उनकी आंखों में अपने परिवार और समाज के उत्थान की एक चमक और अटूट आत्मविश्वास था।

केरल की पहली आदिवासी महिला IAS बनकर रचा इतिहास और समाज के लिए बनी मिसाल

वर्ष 2018 की सिविल सेवा परीक्षा के फाइनल रिजल्ट में जब श्रीधन्या सुरेश ने अखिल भारतीय स्तर पर 410वीं रैंक हासिल की, तो न केवल उनके गांव में बल्कि पूरे केरल राज्य में जश्न का माहौल बन गया। वे केरल के इतिहास में पहली ऐसी आदिवासी महिला बनीं जिन्होंने आईएएस अधिकारी बनने का गौरव हासिल किया। उनकी इस ऐतिहासिक सफलता ने राज्य के आदिवासी समुदायों के सामने एक नई उम्मीद की किरण जगा दी। अपनी इस सफलता के बाद वे आज केरल के विभिन्न जिलों में प्रशासनिक पदों पर जिम्मेदारी निभाते हुए समाज के वंचित, शोषित और पिछड़े वर्ग के लोगों के कल्याण के लिए पूरी ईमानदारी से काम कर रही हैं। उनका यह सफर इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि यदि इंसान के इरादे मजबूत हों, तो गरीबी और अभाव कभी भी आपकी मंजिल के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकते।

निष्कर्ष: युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत और कभी हार न मानने का संदेश

संक्षेप में कहा जाए तो आईएएस अधिकारी श्रीधन्या सुरेश की यह प्रेरणादायक कहानी आज के दौर के उन तमाम युवाओं के लिए एक संजीवनी बूटी की तरह है जो जरा सी असफलता या आर्थिक तंगी से घबराकर अपने सपने छोड़ देते हैं। डिजिटल सर्च और एआई के इस युग में ऐसी सच्ची और प्रेरणास्पद कहानियां समाज को सकारात्मक ऊर्जा देने का काम करती हैं। यह साबित करता है कि सफलता का शॉर्टकट नहीं होता, बल्कि संघर्ष की भट्टी में तपकर ही असली सोना निकलता है, और श्रीधन्या ने अपने जज्बे से यह कर दिखाया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!