October 29, 2026 4:44 am

BREAKING NEWS

जिला दिव्यांग पुनर्वास केंद्रों को मजबूत बनाएं, निर्बाध संचालन सुनिश्चित करें : मंत्री कुशवाहा चीन के पास 1800 लड़ाकू विमान, फिर भी भारत से हवाई जंग में क्यों कमजोर पड़ सकता है ड्रैगन? India-China Air War: चीन के पास ज्यादा फाइटर जेट, लेकिन तिब्बत के एयरबेस बन सकते हैं बड़ी चुनौती; जानें वजह भारत-चीन हवाई मुकाबले में सिर्फ विमानों की संख्या नहीं, ऊंचाई और हथियार भी अहम; समझें ड्रैगन की मुश्किलें दर्दनाक हादसा: पति की मौत के सदमे में गर्भवती महिला ने बेटे संग दी जान, बेटी भागकर बची शिवराज सिंह चौहान की कॉरपोरेट जगत से अपील, गांव-गरीब और खेती को न भूलें 29 अक्टूबर राशिफल: गुरुवार को इन राशियों की चमकेगी किस्मत, कुछ जातकों को बरतनी होगी सावधानी IPS की कार्रवाई के बाद शराब का ‘खेल’: मौके पर 50 लीटर बरामद, थाने पहुंचते-पहुंचते 5 लीटर कम! भोपाल में मचा हड़कंप

मानव भारती स्कूल में पुरातत्वविद प्रो. बीआर मणि ने छात्रों से किया संवाद

मानव भारती स्कूल में प्रख्यात पुरातत्वविद प्रो.बीआर मणि का छात्रों से संवादप्रो. मणि ने पुरातत्व में करिअर की संभावनाओं और देशभर में महत्वपूर्ण उत्खनन पर विस्तार से चर्चा की

देहरादून, 25 सितंबर, 2026ः मानव भारती स्कूल में पद्मश्री से सम्मानित देश के विख्यात पुरातत्वविद् एवं आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक प्रो. (डॉ.) बीआर मणि ने छात्र-छात्राओं के साथ विशेष संवाद किया।

उन्होंने पुरातत्व के क्षेत्र में करियर बनाने, शोध की चुनौतियों और प्राचीन भारतीय इतिहास के अनछुए पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। प्रो. मणि ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए सारनाथ के निकट गुप्त वंश के संस्थापक महाराजा श्रीगुप्त के दुर्लभ अभिलेख के ऐतिहासिक महत्व को भी रेखांकित किया।

छात्रों के ऑर्कियोलॉजी में रोजगार और करिअर की संभावनाओं पर पूछे गए सवालों पर नेशनल म्युजियम के महानिदेशक रहे प्रो. मणि ने कहा कि मेडिकल या इंजीनियरिंग जैसे पारंपरिक क्षेत्रों की तुलना में इस विषय में नौकरियों की संख्या सीमित होती है, लेकिन यह उन युवाओं के लिए बेहद समृद्ध क्षेत्र है, जो इतिहास और शोध के प्रति गहरा समर्पण रखते हैं।

उन्होंने बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) में संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से ग्रुप-ए और ग्रुप-बी स्तर के क्लास-वन गजटेड पदों पर करिअर के बेहतरीन अवसर मिलते हैं। इसके अलावा, विभिन्न राज्यों के पुरातत्व विभागों, संग्रहालयों और अभिलेखागारों में सहायक पुरातत्वविद् के रूप में भी सेवाएं शुरू की जा सकती है।

प्रो. मणि ने स्पष्ट किया कि पुरातत्व एक बहुविषयक विज्ञान है। उच्च शिक्षा (एमए और पीएच.डी.) के बाद विश्वविद्यालयों व डिग्री कॉलेजों में प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व के अध्यापन में रोजगार के व्यापक अवसर हैं। इसके साथ ही, वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले छात्र पैलियोन्टोलॉजी (जीवाश्म विज्ञान) की प्रयोगशालाओं, जैसे लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान में पुरातात्विक वैज्ञानिक के रूप में करिअर बना सकते हैं। वहीं, प्राचीन लिपियों और पांडुलिपियों को पढ़ने व उनका अनुवाद करने में रुचि रखने वाले युवाओं के लिए पुरालेखशास्त्र (एपिग्राफी) शाखा में विशेषज्ञ बनने के बेहतरीन रास्ते खुले हैं।

श्रीगुप्त का दुर्लभ अभिलेखीय साक्ष्यकरिअर के दौरान मिली ऐतिहासिक खोजों का उल्लेख करते हुए प्रो. मणि ने एक सवाल पर गुप्त वंश के इतिहास पर विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि गुप्त काल को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है, जहां साहित्य, कला और स्थापत्य का अभूतपूर्व विकास हुआ। इतिहास की पुस्तकों में चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य), कुमारगुप्त और स्कंदगुप्त जैसे प्रतापी गुप्त शासकों के अभिलेख तो प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, लेकिन इस राजवंश के संस्थापक महाराजा श्रीगुप्त का कोई प्रत्यक्ष अभिलेख उपलब्ध नहीं था। प्रो. मणि ने बताया कि सारनाथ के समीप स्थित बरईपुर गांव से उन्होंने बौद्ध देवी ‘हारीती’ की एक प्राचीन प्रतिमा खोजी थी। इस प्रतिमा पर ब्राह्मी लिपि में स्पष्ट रूप से उत्कीर्ण था, ‘श्री राज्ञा श्रीगुप्त स्वामिना प्रतिष्ठापिता’, अर्थात, इस प्रतिमा की स्थापना स्वयं राजा श्रीगुप्त ने कराई थी। उन्होंने बताया, श्रीगुप्त, महाराजा चंद्रगुप्त प्रथम के दादा थे। इतिहास में पहली बार श्रीगुप्त के नाम का सीधा लिखित प्रमाण मिलना गुप्तकालीन इतिहास की एक युगांतरकारी उपलब्धि साबित हुई, जिसने न केवल आरंभिक गुप्त शासकों की ऐतिहासिकता को ठोस आधार दिया, बल्कि यह भी प्रमाणित किया कि उनका प्रभाव क्षेत्र बनारस और सारनाथ के आसपास तक फैला हुआ था। साथ ही, यह अभिलेख उस काल में बौद्ध धर्म के प्रति गुप्त शासकों के उदार दृष्टिकोण को भी दर्शाता है।

अपने अन्य प्रमुख कार्यों का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए प्रो. मणि ने बताया कि वर्ष 2003 में अदालत के आदेश पर अयोध्या स्थल का वैज्ञानिक उत्खनन कराया गया था, जिसकी व्यापक तकनीकी रिपोर्ट को न्यायालय ने स्वीकार किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने प्राचीन भारतीय आर्थिक इतिहास का जिक्र करते हुए ऋग्वैदिक काल में प्रचलित स्वर्ण मुद्रा ‘निष्क’ के मानकीकरण और वजन प्रणाली के पुरातात्विक प्रमाणों के बारे में भी विद्यार्थियों को बताया।

कार्यक्रम के आरंभ में उन्होंने मानव भारती के संस्थापक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ. दुर्गा प्रसाद पांडेय के योगदान को याद किया। अंत में प्रो. मणि ने विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और संस्कृत वंदना की सराहना करते हुए उन्हें अपनी संस्कृति और इतिहास से जुड़े रहने की प्रेरणा दी।  मानव भारती स्कूल के निदेशक डॉ. हिमांशु शेखर ने अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!