मऊगंज में पत्रकारों के आक्रोश व विरोध का असर! थाना प्रभारी मऊगंज राम सिंह ने प्रेस नोट पर जताया खेद, कहा—किसी की गरिमा ठेस पहुंचाना उद्देश्य नहीं था
मऊगंज।
कल एक प्रेस नोट… पत्रकारों में नाराजगी… कलेक्टर से मुलाकात… मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन… और आज थाना प्रभारी की ओर से सफाई के साथ खेद प्रकट करने वाला प्रेस नोट।



मामला मऊगंज थाना प्रभारी रामसिंह द्वारा जारी किए गए उस प्रेस नोट से जुड़ा है, जिसमें इस्तेमाल की गई कुछ शब्दावली को लेकर पत्रकार समुदाय में तीखी नाराजगी सामने आई थी।
मऊगंज जिले के आक्रोशित पत्रकारों ने कलेक्टर संजय कुमार जैन से मुलाकात की और थाना प्रभारी की कार्यशैली को लेकर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। पत्रकारों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए प्रेस नोट की भाषा को लेकर कार्रवाई की मांग रखी।
कलेक्टर ने पत्रकारों को आश्वस्त किया कि पत्रकारों के सम्मान के साथ किसी भी स्तर पर खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा।
इसके बाद घटनाक्रम ने तेजी से करवट ली।
मऊगंज थाना प्रभारी रामसिंह ने आज नया प्रेस स्पष्टीकरण जारी किया। इसमें उन्होंने पूर्व प्रेस नोट में प्रयुक्त कुछ शब्दों से पत्रकार साथियों की भावनाओं को ठेस पहुंचने की बात स्वीकार करते हुए खेद व्यक्त किया। साथ ही स्पष्ट किया कि किसी सम्मानित पत्रकार या मीडिया वर्ग की गरिमा को ठेस पहुंचाना उनका उद्देश्य नहीं था। प्रेस स्पष्टीकरण में निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया का पालन करने की बात भी कही गई है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा संदेश जरूर दिया है—
पत्रकार सवाल पूछता है, आवाज उठाता है और आम आदमी की शिकायत जिम्मेदारों तक पहुंचाता है। ऐसे में उसी पत्रकार की आवाज को हल्के में लेना किसी भी व्यवस्था के लिए भारी पड़ सकता है।
थाना प्रभारी का खेद जताना विवाद को शांत करने की दिशा में एक कदम जरूर है, लेकिन पत्रकार समुदाय के लिए यह घटनाक्रम एक सवाल छोड़ गया है—
प्रेस नोट में शब्दों का इस्तेमाल कितना जिम्मेदार होना चाहिए?
क्योंकि कलम की ताकत को रोकने से पहले यह समझना जरूरी है कि पत्रकार सिर्फ खबर नहीं लिखता… वह उस आम आदमी की आवाज भी उठाता है, जिसकी बात शायद सिस्टम तक पहुंच ही न पाए।
मऊगंज में फिलहाल विवाद पर खेद का मरहम लग गया है, लेकिन पत्रकारों की गरिमा और पुलिस-प्रेस संबंधों को लेकर उठे सवाल अभी भी चर्चा में हैं।

















