
उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली समेत पूरे देश में शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के बीच इन दिनों एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जो छात्र कुछ साल पहले तक बैचलर ऑफ एजुकेशन यानी बी.एड. (B.Ed.) की डिग्री लेने के लिए लाखों रुपये खर्च करने को तैयार रहते थे, वे अब डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन यानी डी.एल.एड. (D.El.Ed.), जिसे उत्तर प्रदेश में पूर्व में बीटीसी (BTC) कहा जाता था, की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं। लखनऊ, प्रयागराज, पटना, जयपुर और भोपाल जैसे बड़े एजुकेशन हब्स में डीएलएड कॉलेजों की खाली रहने वाली सीटें अब पहली ही काउंसलिंग में भर रही हैं। इस अचानक बदले रुख के पीछे कोई अस्थायी ट्रेंड नहीं है, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत का एक ऐतिहासिक कानूनी फैसला और सरकारी शिक्षक भर्तियों में पदों का जमीनी गणित है जिसने पूरे परिदृश्य को उलट कर रख दिया है।
डीएलएड की मांग में आए इस भारी उछाल की सबसे मुख्य और निर्णायक वजह सुप्रीम कोर्ट का वह बहुचर्चित फैसला है, जिसमें प्राथमिक विद्यालयों (कक्षा 1 से 5) में शिक्षक बनने की अनिवार्य योग्यता को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ कर दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि प्राथमिक कक्षाओं के छोटे बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास और बुनियादी शिक्षा के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित डिप्लोमा धारक (D.El.Ed.) ही सर्वाधिक उपयुक्त हैं। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTCTE) के पुराने गजट को अमान्य ठहराए जाने के बाद अब किसी भी राज्य की बेसिक शिक्षा परिषद या प्राइमरी स्कूलों में बी.एड. डिग्री धारक शिक्षक भर्ती के लिए सीधे तौर पर पात्र नहीं रह गए हैं। इस एक कानूनी फैसले ने शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रहे छात्रों के सामने प्राथमिक स्तर पर केवल डीएलएड का ही एकमात्र और सुरक्षित विकल्प छोड़ा है।
शिक्षक भर्ती में सीटों और वेकेंसीज की संख्या का अनुपात समझना इस पूरे मामले का सबसे बड़ा गणित है। राज्यों के शिक्षा विभागों के आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा रिक्त पद हमेशा प्राइमरी लेवल (कक्षा 1 से 5) पर ही निकलते हैं। उत्तर प्रदेश में 68,500 और 69,000 जैसी विशाल शिक्षक भर्तियां हों या बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC TRE) के तहत प्राथमिक शिक्षकों के पदों की भारी भरकम संख्या—प्राइमरी स्कूलों में भर्तियों की संख्या अपर प्राइमरी (कक्षा 6 से 8), टीजीटी (TGT) या पीजीटी (PGT) के मुकाबले तीन से चार गुना तक अधिक होती है। जब प्राथमिक भर्तियों के दरवाजे केवल डीएलएड अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित हो गए, तो छात्रों को यह स्पष्ट समझ आ गया कि सरकारी नौकरी पाने की सबसे तेज और सबसे ज्यादा संभावना इसी कोर्स के जरिए संभव है।
बी.एड. डिग्री धारकों के पास कक्षा 6 से 8 के जूनियर हाई स्कूल, कक्षा 9-10 के टीजीटी और कक्षा 11-12 के पीजीटी स्तर पर आवेदन करने का अधिकार जरूर सुरक्षित है, लेकिन यहां प्रतिस्पर्धा का स्तर बेहद कठिन और सीमित होता है। टीजीटी और पीजीटी के लिए विषयवार (Subject-wise) पद निकाले जाते हैं, जैसे हिंदी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान आदि। अक्सर एक विषय के लिए पूरे प्रदेश में महज कुछ सौ या हजार पद ही आते हैं, जिन पर लाखों परास्नातक और स्नातक अभ्यर्थी एक-एक नंबर के लिए कड़ा मुकाबला करते हैं। इसके अलावा इन माध्यमिक भर्तियों की प्रक्रिया में कई बार सालों का वक्त लग जाता है। दूसरी तरफ, प्राइमरी लेवल पर विषयवार विभाजन नहीं होता और सभी पात्र अभ्यर्थी एक ही बड़ी कॉमन मेरिट लिस्ट में मुकाबला करते हैं, जिससे सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग दोनों के लिए चयन की दर काफी सुगम हो जाती है।
शिक्षक बनने के लिए केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (CTET) या राज्य स्तरीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET, REET, BTET आदि) पास करना अनिवार्य होता है। इसमें दो पेपर होते हैं—पेपर-1 (कक्षा 1 से 5 के लिए) और पेपर-2 (कक्षा 6 से 8 के लिए)। वर्तमान नियमों के अनुसार, डीएलएड पास अभ्यर्थी यदि स्नातक हैं, तो वे पेपर-1 और पेपर-2 दोनों देने के लिए पूरी तरह पात्र हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि डीएलएड अभ्यर्थी प्राइमरी के साथ-साथ जूनियर हाई स्कूल (कक्षा 6 से 8) की भर्तियों में भी हिस्सा ले सकते हैं। इसके विपरीत, बी.एड. डिग्री धारक केवल पेपर-2 और उससे ऊपर के स्तरों तक ही सीमित रह जाते हैं। इस दोहरे अवसर के चलते छात्रों का झुकाव स्वाभाविक रूप से डीएलएड की तरफ अधिक बढ़ गया है।
पिछले कुछ वर्षों में स्थिति यह हो गई थी कि उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के प्राइवेट डीएलएड संस्थानों में सन्नाटा पसरा रहता था और हजारों सीटें बिना एडमिशन के खाली छूट जाती थीं। लेकिन हाल के सत्रों में काउंसलिंग की स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। स्टेट रैंक और मेरिट लिस्ट में शामिल होने के लिए युवाओं में भारी होड़ मच रही है। डाइट (DIET यानी जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान) की सरकारी सीटों के लिए कटऑफ आसमान छू रही है, वहीं प्राइवेट कॉलेज जो पहले सीधे एडमिशन के लिए छात्रों की तलाश करते थे, अब उनकी सीटें पहले ही राउंड में फुल हो रही हैं। यह बदलता रुझान इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि करियर की स्थिरता और सरकारी सेवा में शीघ्र चयन की उम्मीद ने इस दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स को फिर से सर्वाधिक लोकप्रिय बना दिया है।
यदि आप भी शिक्षक बनने का सपना देख रहे हैं और बी.एड. बनाम डीएलएड के बीच असमंजस में हैं, तो फैसला अपनी शैक्षणिक योग्यता और लक्ष्य के आधार पर ही लें। यदि आपका एकमात्र और प्राथमिक लक्ष्य किसी भी हाल में सरकारी प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर चयन पाना है, तो मौजूदा कानूनी स्थिति के मुताबिक डीएलएड ही सबसे सटीक, सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प है। वहीं यदि आप उच्च शिक्षा, माध्यमिक विद्यालयों में लेक्चरर, केंद्रीय विद्यालय (KVS) या नवोदय विद्यालय (NVS) में टीजीटी-पीजीटी स्तर पर अध्यापन करने का दीर्घकालिक विजन रखते हैं, तो बी.एड. आज भी एक अनिवार्य और प्रतिष्ठित डिग्री बनी हुई है। सही समय पर सही कोर्स का चुनाव आपको सालों के भटकाव और अनावश्यक कोर्ट-कचहरी के विवादों से बचाकर सीधे आपके लक्ष्य तक पहुंचा सकता है।


















