September 30, 2026 2:27 pm

सऊदी का दुश्मन हमारा भी दुश्मन’: पाकिस्तानी रक्षा मंत्री के हूतियों पर तीखे तेवर

मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों और लाल सागर में लगातार बढ़ रहे तनाव के बीच पाकिस्तान की ओर से एक ऐसा बड़ा और विस्फोटक बयान सामने आया है जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने यमन के हूती विद्रोहियों को लेकर बेहद तीखा और स्पष्ट रुख अपनाते हुए उन्हें सीधे तौर पर सऊदी अरब और पाकिस्तान दोनों का साझा दुश्मन करार दिया है। इस सनसनीखेज बयान के सामने आने के बाद से यह कयास लगाए जाने लगे हैं कि क्या आने वाले दिनों में जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सेना प्रत्यक्ष रूप से इस भीषण क्षेत्रीय संघर्ष या जंग का हिस्सा बनने जा रही है। इस्लामाबाद से लेकर रियाद और तेहरान तक इस कूटनीतिक बयान के गहरे और दूरगामी परिणाम निकाले जा रहे हैं।

सऊदी अरब की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता पर पाकिस्तान का स्पष्ट और दो टूक स्टैंड

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ द्वारा दिए गए इस बयान के पीछे पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सदियों पुराने और रणनीतिक रूप से बेहद गहरे सैन्य एवं कूटनीतिक संबंध मुख्य वजह माने जा रहे हैं। जब भी खाड़ी देशों की सुरक्षा पर किसी भी प्रकार का बाहरी खतरा मंडराता है, पाकिस्तान पारंपरिक रूप से रियाद के समर्थन में खड़ा नजर आता है। लाल सागर और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर लगातार हमले करने वाले हूती विद्रोहियों को लेकर पाकिस्तानी नेतृत्व का यह ताजा रुख इस बात का पुख्ता संकेत देता है कि इस्लामाबाद अपनी विदेश नीति में खाड़ी देशों की स्थिरता को सर्वोपरि रखता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब की संप्रभुता के खिलाफ किसी भी ताकत को बर्दाश्त न करने की यह नीति पाकिस्तानी हुक्मरानों की पुरानी कूटनीतिक प्राथमिकता का ही एक नया और अधिक आक्रामक विस्तार है।

क्या मुनीर सेना सीधी जंग में उतरेगी या कूटनीतिक मोर्चे पर बढ़ेगा पाकिस्तानी दखल

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री के इस तीखे बयान के बाद सबसे बड़ा और अहम सवाल यह उठ रहा है कि क्या फील्ड मार्शल या सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सेना (मुनीर सेना) सचमुच यमन या लाल सागर के इस प्रत्यक्ष युद्ध में अपने सैनिक उतारने का जोखिम उठाएगी। वर्तमान में पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट और अपनी घरेलू आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है, जिसके चलते यमन के मोर्चे पर सीधे तौर पर थल सेना या नौसेना को भेजना इस्लामाबाद के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा साबित हो सकता है। हालांकि, कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि पाकिस्तान सैन्य बल भेजने के बजाय खुफिया जानकारी साझा करने, सामरिक सहयोग बढ़ाने या सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत करने जैसी रणनीतिक भूमिकाएं निभा सकता है, जिससे मिडिल ईस्ट के शक्ति संतुलन में एक नया मोड़ आ सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!