October 20, 2026 1:40 pm

चलो, एक दिन के लिए ही सही… रोशन तो हुआ मऊगंज!

चलो, एक दिन के लिए ही सही… रोशन तो हुआ मऊगंज!

विजयादशमी की रोशनी में नगर परिषद की व्यवस्था पर उठे सवाल ?

मऊगंज। कहते हैं कि त्योहार खुशियां लेकर आते हैं, लेकिन मऊगंज में विजयादशमी की रोशनी ने एक अलग ही सवाल खड़ा कर दिया है—क्या शहर की सड़कें सालभर रोशन नहीं रह सकतीं, या फिर रोशनी के लिए किसी त्योहार का इंतजार करना जरूरी है?

विजयादशमी के मद्देनजर मऊगंज नगर परिषद शहर की सड़कों को रोशन करने में जुटी है। सड़कों पर रोशनी देखकर शहरवासी राहत की सांस तो ले सकते हैं, लेकिन मन में एक सवाल भी उठना लाजिमी है—यह उजाला त्योहार तक सीमित रहेगा या इसके बाद भी कायम रहेगा?

क्योंकि शहर की आम तस्वीर को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। शाम ढलते ही कई सड़कों पर अंधेरा पसरा रहने की शिकायतें सामने आती हैं। ऐसे में त्योहार के लिए अचानक सक्रिय हुई व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर नियमित स्ट्रीट लाइट व्यवस्था की जिम्मेदारी भी तो नगर परिषद की ही है!

बल्बों की खरीदी पर सवाल, रोशनी का हिसाब कौन देगा?

नगर परिषद में बिजली उपकरणों की खरीदी और रखरखाव पर होने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि खरीदे गए बल्बों और बिजली व्यवस्था पर खर्च के बावजूद शहर की सड़कों को अपेक्षित रोशनी नहीं मिलती। वहीं, कुछ लोगों का आरोप है कि प्रभावशाली लोगों के घरों के आसपास रोशनी की व्यवस्था बेहतर दिखाई देती है।

यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो निष्पक्ष जांच से तस्वीर साफ हो सकती है। कितने बल्ब खरीदे गए, कितने लगाए गए, कितने चालू हैं और रखरखाव पर कितना खर्च हुआ—इन सवालों का सार्वजनिक हिसाब आखिर कब सामने आएगा? खरीदी के बिल, स्टॉक रजिस्टर और मौके पर लगी लाइटों का मिलान ही बहुत कुछ स्पष्ट कर सकता है।

सियासत बदली, व्यवस्था बदली या सिर्फ आरोप बढ़े?

नगर परिषद अध्यक्ष के सत्ताधारी दल में शामिल होने के बाद स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर भी चर्चाएं और आरोप सामने आ रहे हैं। कुछ लोग परिषद में कथित पक्षपात और सजातीय समीकरणों के प्रभाव पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि निष्पक्ष जांच और दस्तावेजी तथ्यों से ही हो सकती है।

फिलहाल सवाल किसी राजनीतिक समीकरण से बड़ा है—जनता के पैसे से खरीदी गई रोशनी जनता की सड़कों तक क्यों नहीं पहुंचती, यदि शिकायतें सही हैं? तो नगर परिषद को इन सवालों का जवाब आंकड़ों और जमीनी स्थिति के आधार पर देना चाहिए।

जनता को त्योहारों वाला नहीं, रोज का उजाला चाहिए!

विजयादशमी पर शहर का रोशन होना अच्छी बात है। लेकिन असली परीक्षा त्योहार के बाद होगी। अगर कुछ दिनों बाद फिर वही अंधेरा लौट आया, तो इस अस्थायी उजाले का मतलब क्या रह जाएगा?

फिलहाल मऊगंज के लोग तंज कसते हुए यही कह सकते हैं—

“चलो, एक दिन के लिए ही सही… नगर परिषद ने सड़कों को रोशन तो किया! अब देखना यह है कि विजयादशमी के बाद भी बल्ब जलते हैं या फिर शहर को दोबारा अंधेरे के भरोसे छोड़ दिया जाता है।”

नगर परिषद से अपेक्षा है कि वह बिजली उपकरणों की खरीदी, रखरखाव के खर्च और बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटों की स्थिति पर तथ्यात्मक जानकारी सार्वजनिक करे, ताकि शहरवासियों को सिर्फ त्योहारों की चमक नहीं, बल्कि सालभर सुरक्षित और रोशन सड़कें मिल सकें।

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