
कश्मीर घाटी को लेकर दशकों तक देश और दुनिया के अखबारों में जो सुर्खियां बनती थीं, वे मुठभेड़ों, बंद के आह्वानों, शुक्रवार को होने वाली हिंसक पत्थरबाजी और युवाओं के आतंक की राह पकड़ने की दर्दनाक कहानियों से भरी होती थीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सुरक्षाबलों, केंद्रीय गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के समन्वित ‘होल-ऑफ-नेशन’ (Whole-of-Nation) दृष्टिकोण ने इस पूरे परिदृश्य को बुनियादी रूप से बदलकर रख दिया है। रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी ताजा वार्षिक रिपोर्ट ने घाटी में आए इस ऐतिहासिक और जमीनी बदलाव पर आधिकारिक मुहर लगा दी है। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, कश्मीर घाटी में अब पत्थरबाजी की घटनाएं पूरी तरह ‘शून्य’ (Zero Stone Pelting Incidents) हो चुकी हैं और हिंसक प्रदर्शनों का दौर लगभग समाप्त हो चुका है। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला और सुखद आंकड़ा स्थानीय युवाओं की आतंकी संगठनों में भर्ती को लेकर सामने आया है। कभी साल में सैकड़ों स्थानीय लड़कों को बरगलाने वाले आतंकी तंजीमों के सामने अब अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। रिपोर्ट दर्शाती है कि पाकिस्तान समर्थित प्रोपेगैंडा और अलगाववादी इकोसिस्टम के ताबूत में आखिरी कील ठोंकी जा चुकी है।
रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट का सबसे अहम और ऐतिहासिक पहलू कश्मीरी युवाओं द्वारा आतंक का रास्ता छोड़ने से जुड़ा है। वर्ष 2021 में जहां 146 स्थानीय कश्मीरी युवाओं ने आतंकी संगठनों (जैसे लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और टीआरएफ) की सदस्यता ली थी, वहीं 2025 में यह आंकड़ा घटकर मात्र 1 रह गया है। यानी स्थानीय आतंकी भर्ती में 99.3 प्रतिशत की सीधी और अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गई है।
आइए पिछले 5 वर्षों के दौरान स्थानीय युवाओं की आतंकी भर्ती के आधिकारिक आंकड़ों को समझें:
| वर्ष (Year) | आतंकी संगठनों में शामिल हुए स्थानीय युवा | सुरक्षाबलों द्वारा नियंत्रण की स्थिति |
| 2021 | 146 युवा | अलगाववादी नेटवर्क पर कड़े प्रहार की शुरुआत |
| 2022 | 121 युवा | सक्रिय ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) पर शिकंजा |
| 2023 | 19 युवा | आतंकी फंडिंग नेटवर्क का खात्मा, तेज गिरावट |
| 2024 | 4 युवा | भर्ती लगभग नगण्य, सिर्फ इक्का-दुक्का मामले |
| 2025 | मात्र 1 युवा | स्थानीय भर्ती का ढांचा पूरी तरह ध्वस्त |
इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे सरकार की बहुस्तरीय नीति रही है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और राज्य जांच एजेंसी (SIA) ने अलगाववादियों के हवाला नेटवर्क, टेरर फंडिंग और विदेशी पैसों से चलने वाले सिंडिकेट को जड़ से उखाड़ फेंका है। सरकार ने कड़ा फैसला लेते हुए आतंकियों और पत्थरबाजों के परिजनों को सरकारी नौकरियों और पासपोर्ट क्लीयरेंस से बाहर कर दिया। इसके साथ ही, स्थानीय सुरक्षाबलों ने भटके हुए युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाने के लिए ‘सरेंडर पॉलिसी’ और परिजनों के जरिए लाइव एनकाउंटर के दौरान आत्मसमर्पण कराने की मानवीय नीति को प्राथमिकता दी, जिससे आतंकी तंजीमों की नई पौध तैयार करने की साजिशें पूरी तरह नाकाम हो गईं।
एक दौर वह भी था जब श्रीनगर की जामिया मस्जिद, सोपोर, पुलवामा, कुलगाम और अनंतनाग की गलियों में सुरक्षाबलों के काफिलों और आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान पत्थरबाजों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती थी। एनकाउंटर साइट्स पर आतंकियों को भगाने के लिए पत्थरबाजी को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता था। रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में पूरे जम्मू-कश्मीर के भीतर पत्थरबाजी (Stone Pelting) की एक भी घटना दर्ज नहीं की गई है।
यह बदलाव केवल पुलिस की लाठी या कानून के डर से नहीं आया है, बल्कि कश्मीरी समाज की सामूहिक चेतना में आए बदलाव का नतीजा है। जिन युवाओं के हाथों में कभी 500 रुपये की दिहाड़ी देकर पत्थर थमाए जाते थे, आज वही युवा डिजिटल साक्षरता, प्रतियोगी परीक्षाओं, खेलकूद प्रतियोगिताओं और स्टार्टअप्स में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई ‘मिशन यूथ’, ‘उड़ान’, खेलो इंडिया विंटर गेम्स (गुलमर्ग) और स्थानीय स्तर पर क्रिकेट व फुटबॉल टूर्नामेंटों ने युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दी है। स्कूल-कॉलेजों में अब साल भर सामान्य कक्षाएं चलती हैं और हड़तालों का पुराना कैलेंडर इतिहास बन चुका है।
रक्षा मंत्रालय के ताजा डेटा के अनुसार, नियंत्रण रेखा (LoC) पर भारतीय सेना की अभेद्य मल्टी-टियर घुसपैठ रोधी ग्रिड (Anti-Infiltration Obstacle System) के चलते सीमा पार से आतंकियों के घुसने के प्रयास ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर आ गए हैं। वर्ष 2025 के दौरान एलओसी पर घुसपैठ की केवल 6 कोशिशें दर्ज की गईं, जिनमें सतर्क जवानों ने घुसपैठ कर रहे 12 पाकिस्तानी आतंकियों को सीमा पर ही ढेर कर दिया।
आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2021 से 2025 के बीच भारतीय सेना ने सीमा पर घुसपैठ की कोशिश कर रहे कुल 97 खूंखार आतंकियों को मार गिराया है। एलओसी पर थर्मल इमेजर, अत्याधुनिक सेंसर, नाइट विजन डिवाइस और स्मार्ट फेंसिंग के कड़े पहरे के कारण पाकिस्तान की सेना अब पारंपरिक रास्तों से आतंकियों को भेजने में लाचार हो चुकी है। इसी हताशा के चलते सीमा पार से आतंकी आकाओं ने अपने तौर-तरीके बदलते हुए अंतरराष्ट्रीय सीमा (IB) और पंजाब-राजस्थान सीमा से ड्रोनों के जरिए हथियारों और हेरोइन (ड्रग्स) की तस्करी का नया ‘हाइब्रिड मॉडल’ अपनाने की कोशिश की है। हालांकि, भारतीय सेना और बीएसएफ द्वारा स्वदेशी डीआरडीओ ‘D4’ एंटी-ड्रोन सिस्टम, स्पूफर्स और जैमर्स की तैनाती ने इस खतरे को भी काफी हद तक निष्प्रभावी कर दिया है।
घाटी के भीतरी इलाकों (Hinterland) में भी सुरक्षाबलों ने आतंकवाद विरोधी अभियानों की तेज रफ्तार बनाए रखी है। वर्ष 2025 के दौरान सुरक्षाबलों ने 19 दुर्दांत आतंकियों को मार गिराया। इनमें सबसे ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि मारे गए 19 आतंकियों में से 8 आतंकी विशुद्ध रूप से पाकिस्तानी मूल के थे, जो कुल संख्या का लगभग 40 प्रतिशत है। यह इस बात का अकाट्य सबूत है कि कश्मीर में स्थानीय समर्थन खत्म होने के बाद पाकिस्तान अब पूरी तरह अपने विदेशी लड़ाकों के सहारे छद्म युद्ध (Proxy War) को जिंदा रखने की नाकाम कोशिश कर रहा है।
रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का भी प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। पहलगाम में निर्दोष नागरिकों पर हुए कायराना आतंकी हमले के जवाब में भारतीय सेना ने सीमा पार पाकिस्तान और गुलाम कश्मीर (PoJK) में स्थित 9 प्रमुख आतंकी शिविरों पर मिसाइलों से सटीक सर्जिकल स्ट्राइक की थी, जिसमें 100 से अधिक आतंकी मारे गए थे। इस सैन्य कार्रवाई के दौरान सीमा पर संघर्ष विराम उल्लंघन (Ceasefire Violations) में अस्थायी उछाल देखा गया और वर्ष 2025 में 163 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें से 124 उल्लंघन अकेले ऑपरेशन सिंदूर के 4 दिनों के टकराव के दौरान हुए। इसके बावजूद, यदि 2020 के 4,645 और 2019 के 3,233 सीजफायर उल्लंघनों से तुलना की जाए, तो समग्र सीमा पर भारतीय सेना का दबदबा और नियंत्रण पूरी तरह कायम है।
सुरक्षा की इस बदली हुई फिजा का सबसे बड़ा आर्थिक प्रमाण कश्मीर में पर्यटन और व्यापार की रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि है। कभी बंद और कर्फ्यू के साए में रहने वाला श्रीनगर का लाल चौक आज देर रात तक गुलजार रहता है, जहां स्थानीय नागरिक और देश-विदेश के पर्यटक बिना किसी खौफ के आइसक्रीम और कश्मीरी कहवा का आनंद लेते नजर आते हैं। वर्ष 2025-26 के दौरान 2 करोड़ से अधिक घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों ने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया है। डल झील में शिकारे, गुलमर्ग के गोंडोला, सोनमर्ग और पहलगाम के होटल महीनों पहले से पूरी तरह बुक चल रहे हैं।
इसके साथ ही, बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर ऐतिहासिक काम हुए हैं। दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे आर्च ब्रिज ‘चिनाब ब्रिज’ के पूरा होने और उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक (USBRL) के जरिए कश्मीर घाटी को देश के बाकी रेल नेटवर्क से सीधे वंदे भारत ट्रेनों द्वारा जोड़ना इस सदी का सबसे बड़ा गेमचेंजर साबित हो रहा है। एम्स (AIIMS) अवंतीपोरा, रिंग रोड परियोजनाएं, हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स और सुदूर गांवों तक 4G/5G इंटरनेट कनेक्टिविटी ने स्थानीय लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाया है। जनता को अब यह स्पष्ट समझ आ चुका है कि उनका और उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बंदूकों और पाकिस्तान के खोखले नारों में नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक और आर्थिक विकास के मुख्य प्रवाह में है। रक्षा मंत्रालय की यह ताजा रिपोर्ट केवल आंकड़ों का संकलन नहीं, बल्कि ‘नया कश्मीर’ के उस संकल्प की गाथा है जो आतंकवाद की विदाई और स्थायी शांति के एक नए युग का ऐलान कर रही है।









