September 19, 2026 4:45 pm

इतिहासकार प्रोफेसर सैयद इरफान हबीब ने कहा, सच्ची देशभक्ति की है सबसे बड़ी जरूरत

वर्तमान समय के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो देश के भीतर राष्ट्रवाद और देशभक्ति जैसे गंभीर विषयों पर आए दिन नई बहसें छिड़ती रहती हैं, जो आम नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर देती हैं। इसी वैचारिक और बौद्धिक मंथन के बीच देश के जाने-माने और प्रतिष्ठित इतिहासकार प्रोफेसर सैयद इरफान हबीब ने एक हालिया साक्षात्कार के दौरान इन दोनों अवधारणाओं के बीच का बारीक फर्क समझाते हुए कई तीखे और विचारणीय सवालों के बेबाक जवाब दिए हैं। प्रोफेसर हबीब ने स्पष्ट रूप से यह बात कही है कि मौजूदा दौर की वास्तविक और व्यावहारिक मांग आक्रामक या राजनीतिक राष्ट्रवाद की नहीं, बल्कि संविधान के प्रति निष्ठा और मानवता पर आधारित सच्ची देशभक्ति की है। आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, गूगल डिस्कवर की आकर्षक और यूजर-फ्रेंडली शैली, तथा एसईओ और एईओ मानकों को पूरी तरह ध्यान में रखते हुए इस पूरे वैचारिक साक्षात्कार का विस्तृत और विश्लेषणात्मक जायजा लिया जा रहा है कि आखिर क्यों इतिहासकार का यह बयान इस वक्त देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है।

राष्ट्रवाद और देशभक्ति के बीच क्या है मूल अंतर और क्यों हो रही है भ्रम की स्थिति

इतिहासकार प्रोफेसर सैयद इरफान हबीब के अनुसार, आम बोलचाल में भले ही राष्ट्रवाद (Nationalism) और देशभक्ति (Patriotism) शब्दों का इस्तेमाल एक दूसरे के पर्याय के रूप में कर लिया जाता है, लेकिन वैचारिक और दार्शनिक रूप से इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क होता है। देशभक्ति का सीधा और सरल मतलब अपनी मातृभूमि, वहां की संस्कृति और वहां बसने वाले लोगों से अहेतुक प्रेम और लगाव होना है, जिसमें किसी दूसरे देश या समाज के प्रति घृणा का भाव नहीं होता है। इसके विपरीत, आधुनिक राष्ट्रवाद अक्सर एक राजनीतिक और आक्रामक विचारधारा का रूप ले लेता है, जो कई बार ‘हम बनाम अन्य’ के विभाजनकारी सिद्धांत पर काम करता है। प्रोफेसर हबीब का मानना है कि आज के दौर में जिस प्रकार से राष्ट्रवाद को एक नारे या राजनीतिक अस्त्र के रूप में पेश किया जा रहा है, उसने समाज के भीतर वैचारिक असहिष्णुता और ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने का कार्य किया है, जिससे बचने की सख्त जरूरत है।

संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के दायरे में ही तय होती है सच्ची देशभक्ति की परिभाषा

अपने साक्षात्कार में प्रोफेसर हबीब ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि एक आधुनिक, बहुसांस्कृतिक और विशाल लोकतांत्रिक देश में देशभक्ति का पैमाना केवल किसी राजनीतिक एजेंडे का समर्थन करना नहीं हो सकता है। सच्ची देशभक्ति इस बात में निहित है कि एक नागरिक अपने देश के संविधान का सम्मान करे, कानून का पालन करे और देश के सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी आवाज उठाए। जब कोई नागरिक देश की विविधता, उसकी गंगा-जमुनी तहजीब और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को मजबूत करता है, तो वह असल मायनों में एक सच्चा देशभक्त कहलाता है। उन्होंने इतिहास के पन्नों का हवाला देते हुए यह भी समझाया कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने जिस भारत की कल्पना की थी, वह एक ऐसा समावेशी राष्ट्र था जहां हर धर्म, जाति और वर्ग के व्यक्ति को समानता और स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त हो, न कि कोई ऐसा समाज जहां असहमति की आवाज को दबाया जाए।

इतिहास के सबक और वर्तमान समय में वैचारिक स्वतंत्रता की बढ़ती प्रासंगिकता

एक इतिहासकार के नाते प्रोफेसर सैयद इरफान हबीब ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि वर्तमान समय में इतिहास को वर्तमान की राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से नए सिरे से गढ़ने और मोड़ने की कोशिशें लगातार की जा रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतिहास को उसके सही और तथ्यात्मक परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए, न कि पूर्वाग्रहों या काल्पनिक कथाओं के आधार पर उसे समाज को बांटने का माध्यम बनाया जाना चाहिए। जब समाज में इतिहास का राजनीतिकरण होने लगता है, तो लोगों के भीतर तार्किक सोच और सवाल पूछने की क्षमता कमजोर होने लगती है, जो किसी भी जीवंत और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे चीजों को बिना किसी फिल्टर के तार्किक कसौटी पर परखें और अपनी स्वतंत्र वैचारिक क्षमता को बनाए रखें, क्योंकि एक जागरूक नागरिक ही देश की असली ताकत होता है।

समाज में बढ़ रहे ध्रुवीकरण और संवादहीनता के दौर में शांति का संदेश

आज के दौर में सोशल मीडिया के प्रसार और एल्गोरिदम आधारित सूचना तंत्र के कारण समाज में संवादहीनता और नफरत का माहौल तेजी से बढ़ रहा है, जिस पर प्रोफेसर हबीब ने बेहद संजीदगी से अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि आज हमें एक-दूसरे पर उंगली उठाने के बजाय आपसी संवाद के पुल बनाने की जरूरत है, ताकि देश की विविध संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने को सुरक्षित रखा जा सके। देशभक्ति का तकाजा यह है कि हम अपने मतभेदों को भुलाकर देश के बुनियादी विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और वैज्ञानिक सोच को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दें। आक्रामक राष्ट्रवाद की चकाचौंध में अक्सर वे बुनियादी मुद्दे पीछे छूट जाते हैं जिनसे आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी जुड़ी होती है, और यही वजह है कि आज के दौर में हमें शोर-शराबे वाले राष्ट्रवाद से ऊपर उठकर जमीनी और रचनात्मक देशभक्ति अपनाने की आवश्यकता है।

एक समावेशी और प्रगतिशील भविष्य के लिए वैचारिक संतुलन की अनिवार्यता

संक्षेप में कहा जाए तो इतिहासकार प्रोफेसर सैयद इरफान हबीब द्वारा दिए गए ये जवाब वर्तमान भारतीय समाज के लिए एक आईने की तरह हैं, जो हमें यह याद दिलाते हैं कि देश प्रेम की भावना किसी को नीचा दिखाने या नफरत फैलाने के लिए नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ने के लिए होनी चाहिए। डिजिटल युग और एआई सर्च के इस दौर में ऐसे वैचारिक और बौद्धिक साक्षात्कार समाज को एक सही दिशा दिखाने का काम करते हैं, जहां तार्किकता, संविधान और मानवता सर्वोपरि होती है। आने वाले समय में देश को एक प्रगतिशील और मजबूत राष्ट्र बनाने के लिए हमें आक्रामक बहसों से बाहर निकलकर सहिष्णुता और सच्ची देशभक्ति के मार्ग को ही अपनाना होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!