October 2, 2026 6:22 pm

देश में औपचारिक नौकरियों को लेकर लगातार बढ़ रही हैं गंभीर चिंताएं

आधुनिक डिजिटल युग और तकनीकी क्रांतियों के इस दौर में रोजगार के तौर-तरीकों में एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसमें ‘गिग इकॉनमी’ (Gig Economy) यानी फ्रीलांस और प्रोजेक्ट-आधारित काम-धंधों का चलन तेजी से बढ़ा है। आज के समय में फूड डिलीवरी, कैब ड्राइविंग, ऑनलाइन सर्विस और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर काम करने वाले युवाओं की संख्या में भारी इजाफा हुआ है, जिसे कई लोग आधुनिक रोजगार का एक बड़ा विकल्प बता रहे हैं। हालांकि, इसके विपरीत देश-विदेश के आर्थिक विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और श्रम अर्थशास्त्रियों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि गिग इकॉनमी को कभी भी पारंपरिक, सुरक्षित और स्थाई बेरोजगारी का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता है। भारत जैसे विशाल जनसांख्यिकी वाले विकासशील देश में जहां युवाओं की फौज लगातार बढ़ रही है, वहां औपचारिक और सुरक्षित नौकरियों (Formal Jobs) की कमी को लेकर चिंताएं लगातार गहराती जा रही हैं। आज के इस विस्तृत और विश्लेषणात्मक आलेख में हम इसी बात पर चर्चा करने जा रहे हैं कि आखिर क्यों केवल गिग इकॉनमी के भरोसे देश के रोजगार संकट को हल नहीं किया जा सकता और क्यों देश में नियमित नौकरियों का होना अर्थव्यवस्था के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है।

पारंपरिक औपचारिक नौकरियों और गिग इकॉनमी के बीच का बुनियादी फर्क

रोजगार के बाजार को गहराई से समझने वाले जानकारों का यह स्पष्ट मानना है कि एक नियमित नौकरी और गिग इकॉनमी के तहत मिलने वाले काम में जमीन-आसमान का फर्क होता है। पारंपरिक औपचारिक नौकरी में कर्मचारी को एक निश्चित मासिक वेतन, भविष्य निधि (PF), ग्रेच्युटी, मेडिकल इंश्योरेंस, पेड लीव्स और नौकरी की सुरक्षा जैसी कई बुनियादी सामाजिक सुरक्षा (Social Security) सुविधाएं मिलती हैं, जो उसके और उसके परिवार के भविष्य को सुरक्षित रखती हैं। इसके विपरीत, गिग वर्कर्स या फ्रीलांसर के रूप में काम करने वाले युवाओं के पास किसी भी प्रकार का कोई जॉब सिक्योरिटी गार्ड नहीं होता है। उन्हें न तो कोई निश्चित वेतन की गारंटी मिलती है और न ही बीमारी, दुर्घटना या वृद्धावस्था के समय किसी प्रकार का वित्तीय सपोर्ट मिलता है। वे केवल उतने ही पैसे कमा पाते हैं जितने घंटों वे प्लेटफॉर्म पर काम करते हैं या जितने आर्डर पूरे करते हैं। यही वजह है कि जब नीति निर्माताओं द्वारा गिग इकॉनमी को बेरोजगारी के विकल्प के रूप में पेश किया जाता है, तो विशेषज्ञ इसे एक खतरनाक छलावा मानते हैं, क्योंकि यह श्रमिकों को दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता देने में पूरी तरह असमर्थ है।

देश में क्यों बढ़ रही हैं औपचारिक नौकरियों की कमी को लेकर गंभीर चिंताएं?

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है, जहां हर साल करोड़ों युवा अपनी उच्च शिक्षा पूरी करके रोजगार के बाजार में उतरते हैं। देश की इस विशाल युवा शक्ति को खपाने के लिए पर्याप्त मात्रा में मैन्युफैक्चरिंग, कॉर्पोरेट, बैंकिंग और सरकारी सेक्टर में नियमित और औपचारिक नौकरियों का सृजन होना बेहद आवश्यक है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों के आर्थिक आंकड़ों और रोजगार सर्वे पर नजर डालें तो यह बात खुलकर सामने आती है कि जितनी तेजी से ग्रेजुएट युवाओं की संख्या बढ़ रही है, उतनी तेजी से अच्छी और स्थाई नौकरियों के अवसर पैदा नहीं हो पा रहे हैं। इस मांग और आपूर्ति के असंतुलन के कारण मजबूरी में उच्च शिक्षित युवा भी डिलीवरी ब्वॉय, राइड-शेयरिंग या अन्य गिग कार्यों में जुटने को विवश हो रहे हैं, जिसे कुछ लोग रोजगार के रूप में देख सकते हैं, लेकिन वास्तव में यह ‘अंडर-एम्प्लॉयमेंट’ (Under-employment) यानी योग्यता से कम स्तर का काम मिलने की एक गंभीर समस्या है। जब देश के सबसे प्रतिभाशाली युवाओं को उनकी क्षमता के अनुसार नियमित और सम्मानजनक रोजगार नहीं मिलता, तो देश की मानवीय पूंजी (Human Capital) का सही उपयोग नहीं हो पाता है।

गिग वर्कर्स के अधिकार, श्रम कानून और सामाजिक सुरक्षा की बड़ी चुनौतियां

चूंकि भारत में गिग इकॉनमी का दायरा तेजी से फैल रहा है, इसलिए सरकार और विभिन्न संगठनों का ध्यान अब इन श्रमिकों के अधिकारों और सुरक्षा की तरफ भी आकर्षित होने लगा है। कई राज्यों और केंद्रीय स्तर पर गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने के लिए नीतियां बनाने की प्रक्रिया शुरू तो की गई है, लेकिन अभी भी जमीनी स्तर पर स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं है। ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म चलाने वाली बड़ी कंपनियाँ अक्सर इन कामगारों को कर्मचारी (Employee) न मानकर ‘पार्टनर’ या स्वतंत्र ठेकेदार बताती हैं, जिसके चलते वे श्रम कानूनों के न्यूनतम लाभों से भी वंचित रह जाते हैं। काम के लंबे घंटे, एल्गोरिदम के जरिए होने वाला नियंत्रण, इंसेंटिव में अचानक कटौती और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों के बीच इन युवाओं का भविष्य अनिश्चितता के बादलों से घिरा रहता है। यदि देश की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक मजबूत और समावेशी बनाए रखना है, तो केवल गिग आधारित प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर रहने के बजाय देश के भीतर स्थाई और औपचारिक रोजगार के अवसरों को बड़े पैमाने पर बढ़ाना होगा, ताकि हर नागरिक गरिमापूर्ण जीवन जी सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!