
उत्तर प्रदेश की राजनीति के गलियारों में सुगबुगाहट का दौर कभी थम नहीं सकता, और जब बात बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा (BSP) की सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की हो, तो हर एक बयान या प्रतिक्रिया पर राष्ट्रीय स्तर की मीडिया से लेकर आम जनता की निगाहें टिक जाती हैं। हाल ही में सूबे के राजनीतिक पटल पर एक बार फिर से उस वक्त भूचाल आ गया जब मायावती के स्वास्थ्य को लेकर तरह-तरह की भ्रामक और मनगढ़ंत खबरें सोशल मीडिया और राजनीतिक चौपालों पर तैरने लगीं। इन तमाम अफवाहों ने पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच एक असमंजस और चिंता का माहौल पैदा कर दिया था, जिसके बाद खुद पार्टी की सर्वसर्वा मायावती ने मैदान में उतरकर इन सभी दावों की हवा निकाल दी है। उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सेहत को लेकर फैलाई जा रही बातें पूरी तरह से निराधार, मनगढ़ंत और दुर्भावनापूर्ण हैं, जिनके पीछे कुछ खास राजनीतिक ताकतों और उन लोगों का हाथ है जिन्हें पार्टी अनुशासनहीनता या अन्य कारणों से पहले ही बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है।
राजनीतिक जीवन में विरोधियों द्वारा अफवाहों का सहारा लेना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब बात मायावती जैसी कद्दावर और जमीन से जुड़ी नेत्री की हो, तो यह खेल और भी अधिक गंभीर हो जाता है। पिछले कुछ दिनों से लगातार ऐसी चर्चाएं गर्म थीं कि मायावती किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रही हैं और इसी वजह से वे सक्रिय राजनीति या पार्टी के कामकाज से दूरी बना रही हैं। जैसे ही यह सुगबुगाहट तेज हुई, मायावती ने बिना एक पल गंवाए इसका करारा जवाब देते हुए साफ कर दिया कि वे पूरी तरह से स्वस्थ, तंदुरुस्त और पार्टी को मजबूत करने के लिए पहले की तरह ही पूरी तरह से सक्रिय हैं। उन्होंने अपने आधिकारिक बयानों के जरिए यह बताया कि उनकी छवि को धूमिल करने और पार्टी के भीतर भ्रम का माहौल पैदा करने के लिए विरोधी खेमे के साथ-साथ वे लोग लगातार सक्रिय हैं, जिन्हें बसपा के अनुशासित संगठन से अनुशासनहीनता के आरोप में बाहर निकाला जा चुका है। यह स्पष्टीकरण न केवल उनके आलोचकों के मुंह पर एक करारा तमाचा है, बल्कि पार्टी के उन लाखों कार्यकर्ताओं के लिए भी एक बड़ा संदेश है जो अपनी नेता की सेहत को लेकर अंदरखाने चिंतित हो रहे थे।
अपने इस हालिया बयान में बसपा प्रमुख ने सीधे तौर पर उन तमाम चेहरों और तत्वों को आड़े हाथों लिया जो पार्टी से बाहर होने के बावजूद लगातार मायावती और बहुजन समाज पार्टी के खिलाफ साजिश रचने का काम कर रहे हैं। मायावती ने यह दो टूक कहा कि जो लोग पार्टी के भीतर रहकर अपने निजी स्वार्थों को साधने में नाकाम रहे और जिन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते बाहर का रास्ता देखना पड़ा, वे अब बौखलाहट में इस तरह की ओछी हरकतें कर रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य केवल यही है कि वे किसी तरह जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम फैलाकर बसपा के जनाधार को नुकसान पहुंचा सकें। मायावती ने अपने दशकों लंबे राजनीतिक सफर का हवाला देते हुए कार्यकर्ताओं को यह समझाया कि ऐसे स्वार्थी और अवसरवादी तत्वों के बहकावे में आने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है, क्योंकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि संगठन को कैसे चलाना है और बहुजन समाज के हितों की रक्षा कैसे करनी है। उनका यह कड़ा रुख यह साबित करने के लिए काफी है कि वे पार्टी के आंतरिक मामलों और अनुशासन के मुद्दे पर किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक गलियारों में एक और नाम की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है, और वह नाम है आकाश आनंद का। पिछले कुछ समय में पार्टी के भीतर आकाश आनंद की भूमिका और उनके बयानों को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में तरह-तरह के कयास लगाए जाते रहे हैं। विरोधियों द्वारा यह प्रोपोगंडा भी फैलाया जा रहा था कि पार्टी के भीतर उत्तराधिकार और नेतृत्व के सवाल पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, जिसका फायदा उठाने की कोशिश लगातार विपक्षी दल कर रहे हैं। हालांकि, मायावती ने इन तमाम कयासों और अटकलों पर विराम लगाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी पूरी तरह से एकजुट है और उनके हर फैसले के पीछे संगठन की मजबूती का ही उद्देश्य निहित है। उन्होंने आकाश आनंद और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं को लेकर चल रही तमाम हवा-हवाई बातों को खारिज करते हुए कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे केवल और केवल जमीन पर पार्टी के विस्तार और आगामी रणनीतियों पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित रखें, न कि मीडिया में चल रही बेसिर-पैर की चर्चाओं पर अपना वक्त बर्बाद करें।
उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है, जहां आगामी चुनावों और राजनीतिक समीकरणों को साधने के लिए हर एक दल अपनी-अपनी बिसात बिछा रहा है। ऐसे में मायावती का यह सामने आकर सीधे मोर्चा संभालना और हर एक अफवाह का डटकर मुकाबला करना इस बात का सुबूत है कि वे अभी भी यूपी के राजनीतिक रण में उतनी ही आक्रामक और सतर्क हैं जितनी पहले हुआ करती थीं। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को यह मजबूत संदेश दिया है कि वे विरोधियों के किसी भी षड्यंत्र या मानसिक युद्ध में न उलझें, बल्कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और कांशीराम जी के विचारों को घर-घर तक पहुंचाने के मिशन में जुट जाएं। पार्टी से निकाले गए लोगों द्वारा फैलाई जा रही इस तरह की नकारात्मक ऊर्जा का जवाब केवल और केवल संगठनात्मक एकता और जमीनी स्तर पर जनता के बीच जाकर ही दिया जा सकता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो मायावती के इस आक्रामक रुख ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि बसपा अभी भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बहुत बड़ी और निर्णायक ताकत है, जिसे कमजोर आंकने की भूल कोई भी राजनीतिक दल नहीं कर सकता।









