
सनातन धर्म और वैष्णव परंपरा में राधा अष्टमी का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, प्रेम और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाता है। पौराणिक धर्मग्रंथों, पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पावन अष्टमी तिथि को प्रेम और भक्ति की अधिष्ठात्री देवी वृषभानु दुलारी राधारानी का प्राकट्य हुआ था। जगत जननी किशोरी जी के प्राकट्योत्सव को ब्रजमंडल, बरसाना, मथुरा, वृंदावन सहित संपूर्ण देश और दुनिया भर में राधा अष्टमी के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो साधक इस पावन दिन पर लाड़ली जी की निष्काम भाव से उपासना करते हैं, उनके घर-परिवार में सदा सुख, शांति, समृद्धि और दिव्य प्रेम का वास बना रहता है। इस पर्व की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि जहां अधिकांश देवी-देवताओं की उपासना प्रातःकाल या संध्या वेला में होती है, वहीं राधारानी की मुख्य पूजा दोपहर यानी मध्याह्न काल में ही संपन्न की जाती है।
दोपहर में ही क्यों की जाती है किशोरी जी की पूजा: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और राधा प्राकट्य का अनूठा संबंध
शास्त्रों और वैदिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी एक ही परम तत्व के दो रूप हैं। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में घनघोर अंधेरी मध्यरात्रि यानी निशीथ काल में हुआ था और इसी कारण जन्माष्टमी की मुख्य पूजा रात्रि 12 बजे की जाती है, ठीक उसी आध्यात्मिक विधान के तहत राधारानी का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दोपहर के ठीक 12 बजे मध्याह्न काल में हुआ था। मान्यता है कि बरसाना के राजा वृषभानु जी को रावल गांव के निकट एक दिव्य सरोवर में खिले हुए कमल के पुष्प पर नन्ही लाड़ली जी साक्षात प्राप्त हुई थीं। चूंकि देवी का प्राकट्य दोपहर के समय हुआ था, इसलिए राधा अष्टमी के दिन दोपहर की वेला में किशोरी जी का पंचामृत अभिषेक, विशेष श्रृंगार और महाआरती करना सर्वाधिक फलदायी और शास्त्रसम्मत माना गया है। मध्याह्न काल में की गई आराधना से साधक को वैकुंठ लोक और राधा-माधव के चरणों में अटूट भक्ति का आशीर्वाद मिलता है।
राधा अष्टमी 2026: तिथि, उदया तिथि और मध्याह्न पूजा का सबसे सटीक शुभ मुहूर्त
पंचांग गणनाओं के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 18 सितंबर 2026 को दोपहर 01 बजकर 02 मिनट से हो रहा है, जबकि इस पावन अष्टमी तिथि का समापन 19 सितंबर 2026 को दोपहर 03 बजकर 28 मिनट पर होगा। हिंदू धर्म की सनातन उदया तिथि परंपरा के अनुसार, जिस तिथि में सूर्योदय होता है, उसी दिन व्रत और उत्सव का पालन किया जाता है। अतः सूर्योदय व्यापिनी उदया तिथि के आधार पर राधा अष्टमी का महापर्व शनिवार, 19 सितंबर 2026 को पूरे विधि-विधान से मनाया जाएगा। इस दिन किशोरी जी की पूजा का सर्वश्रेष्ठ मध्याह्न शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 12 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 38 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालुओं को इस लगभग ढाई घंटे की पावन अवधि के भीतर राधारानी का अभिषेक, भोग अर्पण और धूप-दीप से आरती संपन्न कर लेनी चाहिए।
राधा अष्टमी के सिद्ध उपाय: अखंड सौभाग्य, धन लाभ और शीघ्र विवाह के लिए करें ये काम
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, राधा अष्टमी का दिन पुण्य अर्जित करने और जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए अत्यंत सिद्ध माना गया है। इस दिन मध्याह्न काल की पूजा के उपरांत किसी पावन मंदिर में अथवा जरूरतमंद निर्धन व्यक्तियों को सामर्थ्य अनुसार पीले वस्त्र, अन्न, मौसमी फल और दक्षिणा का दान अवश्य करना चाहिए। मान्यता है कि सच्चे मन से किया गया यह दान दरिद्रता का नाश करता है और जीवन में कभी भी अन्न-धन की कमी नहीं होने देता। जिन युवक-युवतियों के विवाह में अनावश्यक विलंब हो रहा हो या वैवाहिक जीवन में तनाव बना रहता हो, उन्हें राधा अष्टमी के दिन राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप की संयुक्त पूजा करनी चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी को सुगंधित चंदन, इत्र, पीले और नीले पुष्प अर्पित करें, माखन-मिश्री का भोग लगाएं और शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित कर युगल स्तुति का पाठ करें। इस अचूक उपाय से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और अविवाहित जातकों के लिए शीघ्र विवाह के मंगलकारी योग बनते हैं।
बरसाना से लेकर हर घर तक लाड़ली जी के जन्मोत्सव की गूंज
राधा अष्टमी के अवसर पर बरसाना स्थित श्री लाड़ली जी मंदिर में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर प्रांगण में दोपहर 12 बजे शंख, घंटे और घड़ियाल की गूंज के बीच महाभिषेक किया जाता है और राधारानी को छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं। संतों का मत है कि भगवान श्रीकृष्ण की कृपा तब तक पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो सकती, जब तक राधारानी का आश्रय न लिया जाए। इसलिए जो भी भक्त इस दिन दोपहर के पावन काल में ‘राधे-राधे’ महामंत्र का जप करते हुए निष्कपट भाव से किशोरी जी का स्मरण करते हैं, उनके समस्त संताप, भय और पापों का तत्काल निवारण हो जाता है और जीवन में आध्यात्मिक प्रगति के नए मार्ग खुलते हैं।









