
रबी सीजन में नकदी फसलों की खेती करने वाले किसानों के लिए लहसुन हमेशा से एक अत्यधिक लाभकारी विकल्प रहा है। बाजार में लहसुन की लगातार मजबूत कीमतों और बढ़ती मांग के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (NHRDF) द्वारा विकसित उन्नत किस्में किसानों की आय को कई गुना बढ़ाने में मील का पत्थर साबित हो रही हैं। लहसुन की ऐसी ही उन्नत और अधिक उपज देने वाली किस्मों (जैसे भीमा ओंकार, यमुना सफेद-3 / G-282 और एग्रीफाउंड पार्वती) ने किसानों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह फसल मात्र 130 से 135 दिनों के भीतर पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है और उचित प्रबंधन से प्रति एकड़ 35 से 40 क्विंटल (लगभग 80 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) तक बंपर पैदावार देने की क्षमता रखती है।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश (विशेष रूप से मंदसौर और नीमच मंडी क्षेत्र), राजस्थान (कोटा और बारां बेल्ट), गुजरात, हरियाणा और बिहार के प्रमुख कृषि अंचलों में लहसुन की यह उन्नत किस्में तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। इस किस्म के कंद (Bulbs) मध्यम से बड़े आकार के, आकर्षक चमकदार सफेद रंग के और बेहद ठोस होते हैं। इसमें पाए जाने वाले तीखेपन और एलिसिन (Allicin) नामक औषधीय तत्व की उच्च मात्रा के कारण इसे घरेलू रसोई के साथ-साथ मसाला व फार्मास्यूटिकल उद्योगों में भी हाथों-हाथ खरीदा जाता है।
इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी एक समान कलियां और बेहतरीन भंडारण क्षमता (Storage Capacity) है। अक्सर पारंपरिक देशी लहसुन में यह समस्या देखी जाती है कि फसल कटाई के कुछ महीनों बाद कंद सूखने लगते हैं या अंदर से खोखले हो जाते हैं, जिससे किसानों को औने-पौने दाम पर फसल बेचनी पड़ती है। इसके विपरीत, इस उन्नत किस्म के कंदों का छिलका मोटा और सख्त होता है, जिससे इसे सामान्य तापमान वाले हवादार गोदामों में भी 6 से 8 महीने तक बिना किसी वजन या चमक के नुकसान के आसानी से स्टोर किया जा सकता है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता के मामले में भी यह किस्म काफी आगे है। यह लहसुन के प्रमुख रोगों जैसे ‘बैंगनी धब्बा रोग’ (Purple Blotch), डाउनी मिल्ड्यू (Downy Mildew) और तना झुलसा रोग के प्रति सामान्य किस्मों के मुकाबले कहीं अधिक सहनशील है। इसके मजबूत तने और चौड़ी पत्तियां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को तेज करती हैं, जिससे जमीन के नीचे गांठों का विकास तेजी से और भरपूर होता है।
लहसुन ठंडी जलवायु की फसल है, जिसके वानस्पतिक विकास के लिए 15 से 20 डिग्री सेल्सियस और कंद पकने के समय 25 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान आदर्श माना जाता है। उत्तर भारत और मध्य भारत के मैदानी इलाकों में इसकी बुवाई के लिए अक्टूबर के पहले सप्ताह से लेकर नवंबर के मध्य तक का समय सबसे मुफीद रहता है।
खेत की तैयारी के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है, जिसका पीएच (pH) मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। खेत को 2 से 3 बार गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लें। अंतिम जुताई के समय प्रति एकड़ 8 से 10 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या 2 टन वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। संतुलित पोषण के लिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश के साथ-साथ 10 से 12 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से सल्फर (गंधक) का प्रयोग अनिवार्य रूप से करें, क्योंकि सल्फर लहसुन के कंदों में तीखापन, सुगंध और कड़कपन बढ़ाने में सीधी भूमिका निभाता है।
एक एकड़ खेत में बुवाई के लिए स्वस्थ और मोटे कंदों से निकली लगभग 1.5 से 2 क्विंटल (150-200 किग्रा) कलियों (Cloves) की आवश्यकता होती है। बुवाई से पहले कलियों का उपचार करना बेहद जरूरी है। इसके लिए कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा विरिडी (5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) के घोल से कलियों को 15-20 मिनट तक उपचारित करके छाया में सुखा लें। इससे बीज जनित और भूमि जनित फंगल बीमारियों का खतरा पूरी तरह टल जाता है।
बुवाई करते समय पंक्ति से पंक्ति की दूरी (Row to Row) 15 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी (Plant to Plant) 8 से 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। कलियों को जमीन में 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर कलिका का नुकीला सिरा ऊपर की ओर रखते हुए गाड़ना चाहिए। बुवाई के तुरंत बाद एक हल्की सिंचाई करें। आधुनिक समय में ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) और रेज्ड बेड (उठी हुई क्यारियों) पर लहसुन की बुवाई करने से पानी की 40% तक बचत होती है और कंदों का आकार 25 से 30% तक बड़ा प्राप्त होता है।
एक एकड़ में लहसुन की इस उन्नत किस्म की वैज्ञानिक खेती करने में बीज, जुताई, खाद-उर्वरक, सिंचाई और मजदूरी मिलाकर लगभग 45,000 से 55,000 रुपये तक की कुल लागत आती है। यदि किसान को औसतन 35 से 40 क्विंटल प्रति एकड़ की पैदावार मिलती है और बाजार में सामान्य थोक भाव भी औसतन ₹6,000 से ₹8,000 प्रति क्विंटल (या ऑफ-सीजन में ₹10,000 से ₹15,000 प्रति क्विंटल) मिल जाता है, तो प्रति एकड़ 2.4 लाख से 3.2 लाख रुपये तक का सकल राजस्व आसानी से मिल सकता है।
सभी इनपुट खर्चों को घटाने के बाद भी किसान मात्र 135 दिनों की अवधि में एक एकड़ से लगभग 1.8 से 2.5 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं। यदि किसान कटाई के तुरंत बाद फसल बेचने के बजाय उसे 3-4 महीने उचित भंडारण में रोककर ऑफ-सीजन में बेचें, तो यह मुनाफा और भी अधिक बढ़ जाता है। उन्नत बीजों का चयन और आधुनिक कृषि तकनीक अपनाकर किसान लहसुन की खेती को वास्तविक अर्थों में मुनाफे की एक ठोस मशीन बना सकते हैं।


















