September 1, 2026 6:23 pm

विलय करने से पहले अभिभावकों और ग्राम समुदाय को विश्वास में लिया जाए

बारिश का खौफ- कभी भी गिर सकता है जीआईसी लोधिया का भवन

अल्मोड़ा। अल्मोड़ा में लगातार हो रही बारिश के बीच नगर से करीब तीन किलोमीटर दूर राजकीय इंटर कॉलेज लोधिया का जर्जर भवन बच्चों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गया है।

भवन की हालत इतनी खराब है कि अभिभावकों को इसके किसी भी समय गिरने की आशंका सता रही है। यही वजह है कि मंगलवार को 200 से अधिक छात्र संख्या वाले इस विद्यालय में महज 25 बच्चे ही स्कूल पहुंचे।

स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि विद्यालय भवन की स्थिति को लेकर लंबे समय से संबंधित विभाग और प्रशासन से शिकायत की जा रही है। भवन की मरम्मत या नए भवन के निर्माण की मांग भी उठती रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बारिश ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

सवाल यह है कि क्या शिक्षा विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? जब भवन की स्थिति इतनी खराब है कि अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने से डर रहे हैं, तो जिम्मेदार विभाग ने अब तक भवन का तकनीकी निरीक्षण कराकर वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की?
लोधिया क्षेत्र केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा के संसदीय क्षेत्र में आता है। वहीं हाल ही में राज्य मंत्री बने कुंदन लटवाल का घर भी इसी क्षेत्र में बताया जाता है। इसके बावजूद एक सरकारी इंटर कॉलेज के बच्चे वर्षों से जर्जर भवन में पढ़ने को मजबूर हैं। यह स्थिति सिर्फ एक भवन की बदहाली नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है

सरकारी स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित वातावरण देने के दावे किए जाते हैं, लेकिन लोधिया का स्कूल इन दावों की जमीनी हकीकत सामने ला रहा है। 200 से अधिक बच्चों के विद्यालय में बारिश के डर से महज 25 बच्चों का पहुंचना व्यवस्था के प्रति अभिभावकों के अविश्वास को भी दर्शाता है।

अभिभावकों की मांग है कि प्रशासन तत्काल मौके का निरीक्षण कर भवन की सुरक्षा स्थिति स्पष्ट करे। यदि भवन असुरक्षित है तो बच्चों की जान जोखिम में डालकर कक्षाएं संचालित करने के बजाय तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। साथ ही भवन के पुनर्निर्माण अथवा मरम्मत की कार्रवाई शुरू की जाए, ताकि किसी हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करने की नौबत न आए।

सरकारी स्कूलों का संकट- 5 हजार विद्यालय बंदी की कगार पर, सरकार जवाब दे- यशपाल आर्य

नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि उत्तराखंड में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर सामने आए आंकड़े बेहद गंभीर और चिंताजनक है। प्रदेश में करीब 5,000 सरकारी प्राथमिक एवं जूनियर हाईस्कूल ऐसे हैं, जहां छात्र संख्या 10 या उससे कम रह गई है। इनमें 4,275 प्राथमिक विद्यालय और लगभग 650 जूनियर हाईस्कूल शामिल हैं। कुछ विद्यालयों में तो विद्यार्थियों की संख्या महज 1, 3 या 4 तक रह गई है।

आर्य ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी विद्यालय लगातार विद्यार्थियों से खाली हो रहे हैं, तब सरकार शिक्षा की गुणवत्ता और नामांकन बढ़ाने के अपने दावों का हिसाब जनता को कब देगी?

उन्होंने कहा कि ₹12 हजार करोड़ के आसपास के वार्षिक शिक्षा बजट के बावजूद यह स्थिति क्यों? यह केवल विद्यार्थियों की संख्या का मामला नहीं है, बल्कि यह सरकारी शिक्षा नीति, विद्यालय प्रबंधन, शिक्षक उपलब्धता, आधारभूत सुविधाओं और सार्वजनिक धन के उपयोग पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सरकार को यह बताना चाहिए कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या क्यों नहीं बढ़ी? कितने विद्यालयों में शिक्षक स्वीकृत पदों के मुकाबले कम हैं? कितने विद्यालयों में भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, प्रयोगशाला और डिजिटल सुविधाओं की कमी है? कितने शिक्षक गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जा रहे हैं? पिछले पांच वर्षों में नामांकन बढ़ाने के लिए कितनी राशि खर्च हुई और उसका परिणाम क्या निकला? कितने विद्यालय बंद/विलय/मर्ज किए गए और उसके बाद उन क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा व्यवस्था का क्या हुआ?
श्री आर्य ने कहा कि ऐसे में सरकार से सीधा सवाल है क्या सरकार बच्चों की संख्या कम होने के बाद स्कूल बंद करेगी, या पहले उन कारणों को खत्म करेगी जिनकी वजह से बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ रहे हैं?

यदि विद्यालयों में शिक्षक, सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी तो अभिभावक निजी विद्यालयों की ओर जाएंगे। इसके बाद कम नामांकन को स्कूल बंद करने का आधार बनाना समस्या का समाधान नहीं, समस्या से पलायन होगा।
उन्होंने कहा कि हम सरकार से मांग करते हैं कि 30 दिनों के भीतर निम्न सूचनाएं सार्वजनिक की जाएं-

प्रदेश के प्रत्येक सरकारी विद्यालय की छात्र संख्या की जिला एवं विद्यालयवार सूची।

10 या उससे कम विद्यार्थियों वाले सभी विद्यालयों की विद्यालयवार सूची।

पिछले पांच वर्षों में बंद, विलय अथवा मर्ज किए गए विद्यालयों का पूरा विवरण।

प्रत्येक जिले में स्वीकृत बनाम कार्यरत शिक्षकों की संख्या।

जर्जर भवनों और बुनियादी सुविधाओं से वंचित विद्यालयों की सूची।

पिछले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने पर खर्च की गई राशि और उसके परिणाम।

विद्यालयों में गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिए लगाए गए शिक्षकों का विवरण।
कम नामांकन वाले विद्यालयों के लिए सरकार की विद्यालयवार पुनर्जीवन योजना।

स्कूल बंद/विलय करने के लिए अपनाए जाने वाले मानकों और प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाए।

नेता विपक्ष ने कहा कि प्रत्येक बंद अथवा विलय प्रस्ताव से पहले संबंधित ग्रामसभा, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की राय लेने की व्यवस्था स्पष्ट की जाए। सरकार को प्रचार नहीं, परिणाम का हिसाब देना होगा।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सरकारी स्कूल किसी भी राज्य की गरीब, ग्रामीण और दूरस्थ आबादी के बच्चों के लिए शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। विशेषकर पर्वतीय उत्तराखंड में विद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं बल्कि गांव के सामाजिक अस्तित्व का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि पांच हजार के आसपास विद्यालय कम छात्र संख्या के कारण बंदी की स्थिति में पहुंच रहे हैं, तो सरकार को यह बताना होगा कि पिछले वर्षों की शिक्षा नीतियों का मूल्यांकन किस स्तर पर किया गया और जिम्मेदारी किसकी तय हुई? केवल नए नाम, नई योजनाएं, नए मॉडल स्कूल और नए घोषणापत्र सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गिरती स्थिति को नहीं छिपा सकते।

उन्होंने कहा कि हमारी स्पष्ट मांग है कि सरकार स्कूल बंद करने से पहले स्कूल बचाने की नीति घोषित करे। हर कम-नामांकन वाले विद्यालय के लिए विशेष पुनर्जीवन पैकेज हो। पर्याप्त एवं नियमित शिक्षक उपलब्ध कराए जाएं। जर्जर भवनों और मूलभूत सुविधाओं को समयबद्ध तरीके से सुधारा जाए। दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यालयों के लिए स्थानीय आवश्यकता आधारित मॉडल बनाया जाए।

नामांकन बढ़ाने की योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाए। शिक्षा बजट के खर्च और परिणाम का सार्वजनिक सोशल ऑडिट कराया जाए और सबसे महत्वपूर्ण स्कूल बंद/विलय करने से पहले अभिभावकों और ग्राम समुदाय को विश्वास में लिया जाए।


आर्य ने कहा कि जनता के पैसे से चलने वाले विद्यालय जनता के बच्चों के लिए हैं। सरकार की जिम्मेदारी बच्चों को विद्यालय तक पहुंचाना है, न कि बच्चों की संख्या घटने के बाद विद्यालयों को ही खत्म कर देना।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अब सरकार को बयान नहीं, जवाब देना होगा। आंकड़े नहीं छिपाने होंगे-आंकड़ों का हिसाब देना होगा और यदि नीति विफल हुई है तो जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।

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