
भारतीय राजनीति के सबसे मुखर और बेबाक वक्ताओं में गिने जाने वाले ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने देश में समानता और पर्सनल लॉ को लेकर एक बार फिर बेहद तीखा और विवादित बयान दिया है। ओवैसी ने एक सार्वजनिक मंच से साफ शब्दों में कहा है कि वे और उनका समुदाय ऐसे किसी भी कानून या अवधारणा की पैरवी नहीं करते जो उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे और उनके मानने वाले लोग पूरी तरह से ‘कुरान और सुन्नत’ (पैगंबर साहब की परंपराओं) की पैरवी करने वाले लोग हैं। ओवैसी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में समान नागरिक संहिता (UCC) और आधुनिक समानता के सिद्धांतों को लेकर लगातार बहस छिड़ी हुई है। ओवैसी ने देश के मौजूदा राजनीतिक और कानूनी परिदृश्य पर खुलकर हमला बोलते हुए अपनी बात रखी, जिसके बाद से राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से जुबानी जंग तेज हो गई है। उनके इस बयान ने देश के सेक्युलर ढांचे, पर्सनल लॉ और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिस पर विभिन्न राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों की तरफ से प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं।
असदुद्दीन ओवैसी ने अपने भाषण के दौरान जिस अंदाज में आधुनिक समानता की अवधारणा पर निशाना साधते हुए कहा कि “हम ऐसी इक्वलिटी को ठोकर मारते हैं”, उसने सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक हलचल मचा दी है। उनका तर्क था कि यदि आधुनिक समानता या कानूनों के नाम पर किसी समुदाय के धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) में जबरन हस्तक्षेप किया जाता है, तो उसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है। ओवैसी का मानना है कि भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और विविधताओं से भरे देश में हर धर्म और समुदाय को अपने धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं के अनुसार जीवन जीने की पूरी स्वतंत्रता संविधान द्वारा दी गई है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि देश के एक खास वर्ग और राजनीतिक विचारधारा के तहत भारतीय मुसलमानों की पहचान और उनके पारिवारिक कानूनों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। ओवैसी ने अपनी पार्टी और समर्थकों के सामने यह संदेश देने की कोशिश की कि वे अपनी धार्मिक पहचान और शरिया से जुड़े मामलों में किसी भी तरह के बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उनके इस आक्रामक तेवर को उनके राजनीतिक वोटबैंक और वैचारिक रुख को मजबूत करने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है, जो अक्सर इस तरह के मुद्दों पर मुखर नजर आते हैं।
असदुद्दीन ओवैसी का यह ताज़ा बयान सीधे तौर पर देश में चर्चा का विषय बने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) और विभिन्न समुदायों के पर्सनल लॉ से जुड़ा हुआ है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में नीति निर्देशक तत्वों के तहत पूरे देश के लिए एक समान कानून लागू करने की बात कही गई है, जिसको लेकर लंबे समय से राजनीतिक और कानूनी स्तर पर बहस जारी है। एक तरफ जहां सरकार समर्थकों का तर्क है कि देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में एक जैसा कानून होना चाहिए ताकि लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके, वहीं ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता और कई अन्य विपक्षी दल इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला करार देते हैं। उनका कहना है कि भारत की खूबसूरती इसकी विविधता में बसी है और यहां हर धर्म के लोगों को अपने पर्सनल लॉ के तहत जीने का अधिकार मिला हुआ है। ओवैसी का यह बयान इसी वैचारिक टकराव की कड़ी का एक हिस्सा है, जिसमें वे लगातार यह दावा करते आए हैं कि सरकार अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करना चाहती है। इस तरह के बयानों से देश का राजनीतिक माहौल अक्सर गरमा जाता है और चुनाव या अन्य मौकों पर यह एक बड़ा ध्रुवीकरण का मुद्दा बन जाता है।
असदुद्दीन ओवैसी के इस बयान के बाद देश की मुख्य सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य हिंदुवादी संगठनों ने उन पर तीखा हमला बोला है। बीजेपी के प्रवक्ताओं और नेताओं का कहना है कि ओवैसी का यह बयान देश के संविधान, कानून और आधुनिक न्याय व्यवस्था का सीधा अपमान है। उनका तर्क है कि जब देश का संविधान लैंगिक न्याय और सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों की बात करता है, तो किसी खास धार्मिक कानून को संविधान से ऊपर रखना देश की एकता और अखंडता के खिलाफ है। आलोचकों का यह भी कहना है कि ओवैसी केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए इस तरह के भड़काऊ बयान देते हैं ताकि समाज में वैमनस्य और धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिल सके। देश की न्यायपालिका और कानून के जानकारों का भी एक वर्ग यह मानता है कि समय के साथ समाज में सुधार और महिलाओं को उनके बराबर के अधिकार दिलाने के लिए कानूनों में बदलाव करना आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है। ओवैसी और उनके समर्थकों के तर्कों के विपरीत, देश का एक बड़ा वर्ग इस बात का समर्थन करता है कि देश में एक समान कानून होना चाहिए जो जाति, धर्म और लिंग से ऊपर उठकर हर नागरिक को समान सुरक्षा और अधिकार प्रदान करे।
असदुद्दीन ओवैसी का यह बयान इस बात का एक बार फिर प्रमाण है कि भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक अधिकार, लैंगिक समानता और राष्ट्र की एकार्यकता के बीच संतुलन बनाना कितना संवेदनशील और जटिल काम है। एक तरफ जहां आधुनिक समय की मांग है कि देश के हर नागरिक, विशेषकर महिलाओं को उनके समान कानूनी अधिकार मिलें और किसी भी धर्म की आड़ में उनके साथ भेदभाव न हो, वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदायों के भीतर अपनी धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत को बचाने की गहरी चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं। ओवैसी की शैली हमेशा से आक्रामक और अपने समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ने वाली रही है, और उनका यह बयान इसी वैचारिक लड़ाई का एक और जीवंत अध्याय है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या देश में समान नागरिक संहिता या अन्य कानूनी सुधारों को लेकर सरकार कोई ठोस कदम उठाती है और उस पर देश की राजनीति किस प्रकार प्रतिक्रिया देती है, लेकिन फिलहाल इस बयान ने भारतीय राजनीति के पटल पर एक बार फिर से धार्मिक और कानूनी बहसों के द्वार खोल दिए हैं।









