August 6, 2026 10:13 pm

‘जब तक सामाजिक भेदभाव रहेगा तब तक आरक्षण की जरूरत, लेकिन जिनका उत्थान हो गया वो दूसरों को मौका दें’, रिजर्वेशन पर बोले मोहन भागवत

मुंबई में आयोजित I.I.M.U.N. इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आरक्षण और समाज निर्माण पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक समाज में असमानता और भेदभाव की भावना मौजूद है, तब तक आरक्षण की व्यवस्था पूर्ण रूप से जारी रहनी चाहिए।

संघ प्रमुख के इस बयान ने देश में आरक्षण को लेकर समय-समय पर उठने वाली आशंकाओं, भ्रम और राजनीतिक बयानबाजी पर विराम लगा दिया है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने सामाजिक बदलाव, राजनीति के दुष्प्रभाव, रोजगार और श्रम के सम्मान जैसे विषयों पर देश के युवाओं का ध्यान आकर्षित किया।

सामाजिक भेदभाव खत्म होने तक आरक्षण क्यों जरूरी?

मोहन भागवत ने कहा कि आरक्षण के पूरे विषय को उसके सही विषय में समझने के लिए हमें सबसे पहले डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों को गहराई से पढ़ना और जीवन में उतारना होगा। आरक्षण कोई आर्थिक राहत योजना नहीं है, बल्कि यह सदियों से चले आ रहे सामाजिक उत्पीड़न और भेदभाव को समाप्त करने का संवैधानिक साधन है। जब तक समाज के किसी भी वर्ग में असमानता का दंश कायम है, तब तक आरक्षण की उपयोगिता और आवश्यकता बनी रहेगी।

उत्थान का माध्यम, न कि स्थायी व्यवस्था

कार्यक्रम के दौरान युवाओं से संवाद करते हुए संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि आरक्षण का मूल स्वरूप एक माध्यम का है। यह समाज के पिछड़े, शोषित और वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाकर बराबरी के स्तर पर खड़ा करने का संबल है। एक समय ऐसा अवश्य आएगा जब समाज में पूर्ण समरसता स्थापित होगी और भेदभाव मिट जाएगा। उस दिन इसकी आवश्यकता खुद ही समाप्त हो जाएगी। हालांकि, जब तक वह आदर्श स्थिति प्राप्त नहीं होती, तब तक समाज के कमजोर वर्गों को यह सुरक्षा कवच देना राष्ट्र का दायित्व है।

आरक्षण का मूल उद्देश्य और राजनीति का नकारात्मक प्रभाव

संविधान निर्माताओं का मुख्य लक्ष्य इसके जरिए सामाजिक एकता स्थापित करना था। भागवत ने इस बात पर दुख जताया कि वर्तमान राजनीति ने इस कल्याणकारी व्यवस्था को समाज जोड़ने के बजाय मतभेदों को गहरा करने का औजार बना दिया है। यदि राजनीतिक लाभ-हानि से परे हटकर इस विषय पर ईमानदारी से काम किया जाए, तो सामाजिक बराबरी का लक्ष्य तेजी से हासिल किया जा सकता है।

अब स्वयं आरक्षण का लाभ पा चुके समुदायों के भीतर से यह आवाज उठ रही है कि वंचितों में से भी अति-वंचितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इसी आधार पर राज्यों में ‘वर्गीकरण’ की मांग जोर पकड़ रही है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं।

समस्या आरक्षण नहीं, बल्कि उसकी राजनीति है

आरएसएस का रुख हमेशा से आरक्षण के समर्थन में रहा है। संघ प्रमुख ने पूर्व के बयानों को दोहराते हुए कहा कि सामाजिक कलंक को मिटाने के लिए यह व्यवस्था अति आवश्यक है। मोहन भागवत ने कहा कि ‘आरक्षण कोई समस्या नहीं है, बल्कि आरक्षण पर की जाने वाली राजनीति असली समस्या है।’उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आरक्षण कब तक चलना चाहिए, इसका निर्णय भी केवल वही वर्ग करे जिसके लिए यह व्यवस्था बनाई गई है। जब उन्हें महसूस हो कि वे पूर्ण रूप से सक्षम हो चुके हैं, तब वे स्वयं इस पर निर्णय ले सकते हैं।

रोजगार की सोच और मानसिकता में बदलाव की जरूरत

आरक्षण के साथ-साथ भागवत ने युवाओं का आह्वान किया कि वे रोजगार और आजीविका को लेकर अपनी पारंपरिक सोच को बदलें। हमारे समाज में ‘रोजगार’ का अर्थ केवल सरकारी नौकरी या दफ्तर की टेबल-कुर्सी वाली नौकरी तक सीमित कर दिया गया है। असल में, यह है कि रोजगार का दायरा केवल नौकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्वरोजगार, उद्यमिता और कौशल-आधारित कार्य भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

पेट किसान के पसीने से उगे अनाज से ही भरता है- मोहन भागवत 

भागवत ने समाज में शारीरिक श्रम करने वालों के प्रति घटते सम्मान पर गहरा चिंतन व्यक्त किया और इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझाया कि  यदि किसी व्यक्ति के पास 4 लाख रुपये नकद हों और एक किसान के पास 4 लाख रुपये मूल्य का अनाज हो, तो समाज प्रायः पैसे वाले को अधिक प्रतिष्ठा देता है। 

कागजी नोटों से किसी का पेट नहीं भरता, पेट किसान के पसीने से उगे अनाज से ही भरता है। जब तक हम शारीरिक श्रम करने वाले कारीगरों और किसानों को उचित मान-सम्मान नहीं देंगे, तब तक वास्तविक सामाजिक सुधार अधूरी रहेगी।

देश का युवा एक ही अंधी दौड़ में शामिल है

आज देश का युवा एक ही अंधी दौड़ में शामिल है। हर किसी को अपने घर के पास सरकारी या सुरक्षित नौकरी चाहिए। जिन्हें हम अक्सर ‘छोटे कार्य’ मानकर छोड़ देते हैं, वे आर्थिक समृद्धि के बड़े माध्यम बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, औपचारिक शिक्षा छोड़कर छोटे व्यवसाय जैसे ठेले या पंडाल कार्य से शुरुआत करने वाले कई युवाओं ने अपनी मेहनत के बल पर लाखों की संपत्ति और रोजगार खड़ा किया है। सफलता किसी पद या डिग्री की मोहताज नहीं होती है।

शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक दृष्टिकोण में सुधार

बेरोजगारी का समाधान केवल नई नौकरियां निकालने से नहीं, बल्कि काम को ‘छोटे या बड़े’ के चश्मे से देखना बंद करने से होगा। ईमानदारी से आजीविका कमाने वाला हर व्यक्ति चाहे वह किसान हो, कारीगर हो, छोटा व्यापारी हो या निजी कर्मचारी बराबर सम्मान का हकदार है।हमारी शिक्षा प्रणाली में युवाओं को केवल ‘नौकरी मांगने वाला’ बनाने के बजाय ‘सफल, हुनरमंद और नौकरी देने वाला’ बनाने के संस्कार विकसित करने होंगे।

ये भी पढ़ें – झारखंड में विरोध प्रदर्शन को लेकर घिरे राहुल गांधी, भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने चुप्पी पर उठाए सवाल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!