
आज के दौर में टैटू बनवाना युवाओं के बीच अपनी भावनाएं, व्यक्तित्व और स्टाइल स्टेटमेंट जाहिर करने का एक बेहद लोकप्रिय जरिया बन चुका है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ और बंगलुरु जैसे शहरों में टैटू स्टूडियोज की भरमार है, जहां कॉलेज के छात्रों से लेकर वर्किंग प्रोफेशनल्स तक शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर तरह-तरह की कलाकृतियां बनवा रहे हैं। हालांकि, त्वचा विशेषज्ञों (डर्मेटोलॉजिस्ट) के अनुसार, स्किन पर स्थायी स्याही उकेरने की यह प्रक्रिया पूरी तरह से जोखिम-मुक्त नहीं है। टैटू मशीन की सुई प्रति मिनट हजारों बार त्वचा की ऊपरी परत (एपिडर्मिस) को चीरकर अंदरूनी परत (डर्मिस) तक स्याही पहुंचाती है। यह प्रक्रिया अनिवार्य रूप से त्वचा पर एक खुला घाव बनाती है, और यदि स्वच्छता या सही मानकों का पालन न किया जाए, तो यह कई गंभीर बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है।
टैटू बनवाते समय सबसे गंभीर जोखिम रक्त जनित संक्रमणों (Blood-Borne Diseases) का होता है। यदि टैटू आर्टिस्ट एक ही सुई का इस्तेमाल बिना स्टेरलाइज किए एक से अधिक ग्राहकों पर करता है, तो यह हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और एचआईवी जैसी जानलेवा बीमारियों के सीधे संचार का माध्यम बन सकता है। ये वायरस संक्रमित रक्त के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं और लिवर व इम्यून सिस्टम को स्थायी रूप से नष्ट कर सकते हैं। चिकित्सा मानकों के अनुसार, टैटूिंग के लिए हमेशा नई, डिस्पोजेबल और सीलबंद सुइयों का उपयोग अनिवार्य होना चाहिए, लेकिन लोकल और अनरजिस्टर्ड पार्लरों में कई बार इस नियम की अनदेखी कर दी जाती है।
टैटू बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली इंक में कई तरह के मेटल्स और सिंथेटिक पिगमेंट्स मौजूद होते हैं। लाल, नीली, पीली और हरी स्याही से एलर्जी होने की संभावना सबसे अधिक देखी जाती है। लाल इंक में अक्सर मरकरी सल्फाइड (सिनाबार) या कैडमियम जैसे तत्व होते हैं, जो त्वचा में तीव्र खुजली, चकत्ते, लालिमा और सूजन पैदा कर सकते हैं। यह एलर्जिक रिएक्शन टैटू बनवाने के तुरंत बाद, कुछ हफ्तों बाद या कई बार सालों बाद भी अचानक उभर सकती है। कुछ लोगों में यह कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस का रूप ले लेती है, जिसे ठीक करने के लिए लंबे समय तक स्टेरॉयड और दवाओं का सहारा लेना पड़ता है।
टैटू बनने के बाद शुरुआती कुछ दिनों तक त्वचा अत्यधिक संवेदनशील और खुले घाव की तरह होती है। इस दौरान वातावरण में मौजूद बैक्टीरिया जैसे स्टैफिलोकोकस (Staphylococcus) घाव में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे मवाद पड़ना, गंभीर दर्द, तेज बुखार और छाले होने की समस्या हो सकती है। इसके अलावा, हमारा शरीर टैटू की स्याही को एक बाहरी अवांछित तत्व (फॉरेन बॉडी) मानता है, जिसके कारण इंक के कणों के चारों ओर सूजन की छोटी-छोटी गांठें बन सकती हैं, जिन्हें ‘ग्रैनुलोमा’ कहा जाता है। जिन लोगों की त्वचा में केलॉइड (घाव भरने के बाद अत्यधिक उभरा हुआ कठोर निशान) बनने की प्रवृत्ति होती है, उन्हें टैटू बनवाने से गंभीर विकृति का सामना करना पड़ सकता है।
टैटू केवल त्वचा की सतह तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह अन्य मेडिकल प्रक्रियाओं पर भी असर डालता है। कई टैटू इंक में आयरन ऑक्साइड जैसे फेरोमैग्नेटिक धातु होते हैं। जब किसी टैटू वाले व्यक्ति का एमआरआई (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) स्कैन कराया जाता है, तो शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड के कारण टैटू वाले हिस्से में तेज जलन, चुभन या सूजन महसूस हो सकती है। इसके अलावा, मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत टैटू बनवाने के बाद कम से कम 6 महीने से 1 साल तक व्यक्ति को रक्तदान (Blood Donation) करने की अनुमति नहीं दी जाती, ताकि किसी भी संभावित गुप्त संक्रमण को मरीज तक पहुंचने से रोका जा सके।
यदि आप टैटू बनवाने का मन बना ही चुके हैं, तो कुछ बुनियादी सावधानियां बरतकर जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हमेशा किसी लाइसेंस प्राप्त, अनुभवी और स्वच्छता के कड़े मानकों का पालन करने वाले प्रोफेशनल स्टूडियो का ही चुनाव करें। आर्टिस्ट के सामने नई डिस्पोजेबल सुई की सील खुलवाएं और सुनिश्चित करें कि वह डिस्पोजेबल ग्लव्स पहनकर ही काम करे। टैटू बनने के बाद आर्टिस्ट द्वारा दी गई ‘आफ्टरकेयर गाइड’ का सख्ती से पालन करें—घाव पर एंटीबैक्टीरियल ऑइंटमेंट लगाएं, उस हिस्से को धूप और गंदे पानी से बचाएं, और पपड़ी को कभी भी खुरच कर न हटाएं। यदि टैटू के आसपास अत्यधिक सूजन, मवाद या तेज दर्द हो, तो बिना देर किए डर्मेटोलॉजिस्ट से संपर्क करें।









