September 20, 2026 4:09 pm

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धूम्रपान न करने वालों को भी फेफड़ों का कैंसर: 33 लाख लोगों पर हुई महा-रिसर्च ने खोली आंखें, EGFR म्यूटेशन से 60 गुना बढ़ा खतरा

आधुनिक चिकित्सा जगत में दशकों से यह आम सामाजिक और चिकित्सीय धारणा गहराई से बैठी रही है कि फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer) मुख्य रूप से केवल उन्हीं व्यक्तियों को अपनी गिरफ्त में लेता है जो नियमित रूप से सिगरेट, बीड़ी या हुक्का जैसे तंबाकू उत्पादों का धुआं उड़ाते हैं। सामान्य जनमानस यह मानकर निश्चिंत रहता आया है कि अगर वे धूम्रपान की लत से पूरी तरह दूर हैं, तो उनके फेफड़े हर प्रकार के प्राणघातक ऑन्कोलॉजिकल खतरों से स्वतः सुरक्षित हैं। हालांकि, प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंस’ (Science Journal) में प्रकाशित एक युगांतरकारी और विस्तृत वैश्विक अध्ययन ने इस रूढ़िवादी धारणा को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। 33 लाख से अधिक व्यक्तियों के विशाल जेनेटिक और क्लीनिकल डेटाबेस पर किए गए गहन शोध ने साबित कर दिया है कि जीवनशैली से जुड़ी आदतों के अलावा इंसानी डीएनए के भीतर छिपे सूक्ष्म अनुवांशिक बदलाव (Inherited Genetic Mutations) भी फेफड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को घातक ट्यूमर में बदलने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हो सकते हैं।

शोधकर्ताओं द्वारा संकलित किए गए चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित कुल मरीजों में से लगभग 20 प्रतिशत मरीज ऐसे सामने आ रहे हैं जिन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में कभी किसी तंबाकू उत्पाद को छुआ तक नहीं है। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने जब इस रहस्यमयी ट्रेंड की जड़ तक पहुंचने के लिए 33 लाख से अधिक लोगों के जीनोम प्रोफाइल का बारीक परीक्षण किया, तो पाया गया कि ‘एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर’ (EGFR) नामक जीन में होने वाला एक दुर्लभ वंशानुगत म्यूटेशन इस घातक बीमारी की मुख्य धुरी है। सामान्य आबादी की तुलना में यह विशेष जेनेटिक विसंगति किसी भी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में फेफड़ों के कैंसर के समग्र जोखिम को सीधे तौर पर 25 गुना तक बढ़ाने की क्षमता रखती है, भले ही संबंधित व्यक्ति प्रदूषण और धुएं से कोसों दूर एक संतुलित और अनुशासित जीवन जी रहा हो।

इस विस्तृत जांच में वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से ‘EGFR T790M’ नामक आनुवंशिक उत्परिवर्तन को चिन्हित किया है, जो फेफड़ों के ऊतकों में असामान्य सेलुलर वृद्धि को अप्रत्याशित रफ्तार देता है। अध्ययन के सांख्यिकीय मॉडल दर्शाते हैं कि यदि यह म्यूटेशन किसी ऐसे व्यक्ति में पाया जाता है जो धूम्रपान करता है, तो उसमें लंग कैंसर होने की आशंका सामान्य स्मोकर के मुकाबले 10 गुना तक बढ़ जाती है। लेकिन इसका सबसे भयावह और विस्मयकारी पहलू नॉन-स्मोकर्स से जुड़ा हुआ सामने आया है। शोध के निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि जिन लोगों ने जीवन में कभी भी सिगरेट या तंबाकू का सेवन नहीं किया, यदि उनके डीएनए में EGFR T790M म्यूटेशन वंशानुगत रूप से मौजूद है, तो उनमें बिना म्यूटेशन वाले सामान्य व्यक्तियों की तुलना में फेफड़ों का कैंसर विकसित होने की आशंका 60 गुना से भी अधिक दर्ज की गई है, जो इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि कैंसर का खतरा केवल धुएं से तय नहीं होता।

‘साइंस जर्नल’ में छपे इस पेपर में फेफड़ों के भीतर कैंसर कोशिकाओं के अनियंत्रित प्रसार के आणविक तंत्र (Molecular Mechanism) का भी विस्तार से खुलासा किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस पूरे रोग चक्र में ‘फ्यूजन प्रोटीन’ (Fusion Protein) की भूमिका अत्यंत विनाशकारी सिद्ध होती है। जैविक प्रक्रिया के दौरान जब शरीर की कोशिकाएं विभाजित हो रही होती हैं, तब असामान्य आनुवंशिक त्रुटियों के कारण दो अलग-अलग जीन अप्रत्याशित रूप से आपस में जुड़ जाते हैं। इस असामान्य विलय के परिणामस्वरूप एक बिल्कुल नए और विकृत ‘फ्यूजन प्रोटीन’ का निर्माण होता है। यह विकृत प्रोटीन फेफड़ों की सामान्य कोशिकाओं के भीतर पाए जाने वाले सिग्नलिंग पाथवे को हैक कर लेता है और अनियंत्रित रूप से ट्यूमर कोशिकाओं को तेजी से विभाजित होने का रासायनिक आदेश देने लगता है, जिससे बिना किसी बाहरी धुएं के संपर्क के भी फेफड़े गंभीर ट्यूमर से घिर जाते हैं।

वैश्विक स्तर पर ऑन्कोलॉजी शोध के शीर्ष संस्थान, बोस्टन स्थित डाना-फार्बर कैंसर इंस्टीट्यूट (Dana-Farber Cancer Institute) की प्रमुख वैज्ञानिक एवं शोधकर्ता डॉ. जैकलिन लोपिकोलो ने इस अध्ययन के व्यावहारिक महत्व को रेखांकित किया है। डॉ. लोपिकोलो ने बताया कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में आज तक फेफड़ों के कैंसर की प्रारंभिक स्क्रीनिंग और डायग्नोसिस केवल मरीज के पिछले धूम्रपान इतिहास (Smoking History) और उम्र को आधार बनाकर की जाती रही है। यदि कोई व्यक्ति सिगरेट नहीं पीता था, तो डॉक्टर आमतौर पर उसे लंग कैंसर स्क्रीनिंग की सलाह नहीं देते थे, जिसके कारण नॉन-स्मोकर्स में यह बीमारी तीसरे या चौथे चरण में जाकर ही पकड़ में आती थी। डॉ. लोपिकोलो के अनुसार, इस नई खोज के बाद अब भविष्य में चिकित्सा प्रोटोकॉल पूरी तरह बदलने वाले हैं, जहां फैमिली हिस्ट्री और वंशानुगत जेनेटिक मैपिंग के आधार पर समय रहते उच्च जोखिम वाले नॉन-स्मोकर्स की भी प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग की जा सकेगी।

इस बहुचर्चित वैज्ञानिक जांच का एक और सबसे महत्वपूर्ण और राहत देने वाला निष्कर्ष यह सामने आया कि यह विशिष्ट आनुवंशिक वैरिएंट अध्ययन किए गए 17 अन्य सामान्य कैंसरों—जैसे स्तन कैंसर, कोलोरेक्टल कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर या लिवर कैंसर—में से किसी से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ नहीं पाया गया। इसका वैज्ञानिक अर्थ यह है कि EGFR T790M म्यूटेशन का जैविक प्रभाव लगभग पूरी तरह से फेफड़ों की श्वसन प्रणाली और उपकला कोशिकाओं (Epithelial Cells) तक ही सीमित रहता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस टारगेटेड व्यवहार की पहचान हो जाने से दवा निर्माता कंपनियों के लिए ऐसे कस्टमाइज्ड ‘टारगेटेड थेरेपी’ मॉलिक्यूल्स और दवाएं विकसित करना बेहद आसान हो जाएगा, जो बिना कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों के सीधे इस म्यूटेशन को ब्लॉक कर ट्यूमर की ग्रोथ को शुरुआत में ही पूरी तरह रोक सकें।

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