November 5, 2026 1:57 am

नासा का 1.5 टन वजनी अंतरिक्ष यान आज पृथ्वी पर गिरेगा: मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद पर मलबा गिरने का अलर्ट

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) द्वारा दो दशक से भी अधिक समय पहले अंतरिक्ष में स्थापित की गई ऐतिहासिक ‘नील गेहरेल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी’ (Neil Gehrels Swift Observatory) आज 4 नवंबर को अपने 22 साल लंबे गौरवशाली सफर को समाप्त करते हुए पृथ्वी के वायुमंडल में अनियंत्रित रूप से प्रवेश करने जा रही है। लगभग 1.5 टन यानी करीब 1500 किलोग्राम वजनी इस विशालकाय वैज्ञानिक सैटेलाइट के पृथ्वी की निचली कक्षा से तेजी से नीचे गिरने की प्रक्रिया ने पूरी दुनिया के खगोलविदों और अंतरिक्ष निगरानी एजेंसियों को अलर्ट मोड पर ला खड़ा किया है। वायुमंडलीय घर्षण के कारण अंतरिक्ष यान का अधिकांश हिस्सा जलकर राख होने की संभावना के बावजूद वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इसके कई अत्यधिक मजबूत धातु से बने घटक, जैसे टाइटेनियम और बेरिलियम के भारी टुकड़े, वायुमंडल की भीषण गर्मी को झेलकर ठोस मलबे के रूप में जमीन या समुद्र तक पहुंच सकते हैं। इस घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि नासा और अमेरिकी स्पेस फोर्स द्वारा जारी किए गए संभावित ग्राउंड ट्रैक में भारत के कई घनी आबादी वाले महानगर शामिल हैं, जिससे सुरक्षा को लेकर व्यापक चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार, जब कोई 1.5 टन वजनी ऑब्जेक्ट 27,000 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की प्रचंड गति से पृथ्वी के घने वायुमंडल में दाखिल होता है, तो अत्यधिक तापमान के कारण उसमें भयानक विस्फोट होते हैं और वह सैकड़ों टुकड़ों में बंट जाता है। हालांकि अधिकांश आधुनिक उपग्रहों को मिशन खत्म होने के बाद नियंत्रित रूप से प्रशांत महासागर के दूरदराज ‘पॉइंट निमो’ (अंतरिक्ष यान का कब्रिस्तान) पर गिराया जाता है, लेकिन 2004 में डिजाइन किए गए इस उपग्रह में अब ईंधन न होने की वजह से इसे नियंत्रित करना संभव नहीं रहा है। इस कारण यह प्राकृतिक रूप से नीचे आ रहा है, जिसके चलते इसके मलबे के अंतिम री-एंट्री बिंदु को लेकर सटीक समय और स्थान तय करना वैश्विक अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए एक बेहद जटिल गणितीय चुनौती बन गया है।

अमेरिकी स्पेस फोर्स (US Space Force) और अंतरराष्ट्रीय ऑर्बिटल ट्रैकिंग नेटवर्क के नवीनतम सिमुलेशन के अनुसार, स्विफ्ट अंतरिक्ष यान के अंतिम चक्करों का रास्ता पृथ्वी के कई प्रमुख भू-भागों के ऊपर से होकर गुजर रहा है। इन संभावित जोखिम क्षेत्रों में भारत के प्रमुख राज्य, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कुछ बड़े हिस्से शामिल हैं। विशेष रूप से भारत के संदर्भ में बात की जाए तो इसका अनुमानित प्रक्षेपवक्र (Trajectory) देश के दक्षिणी और मध्य हिस्से को सीधे कवर कर रहा है। अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा जारी किए गए कोऑर्डिनेट्स के मुताबिक मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, भुवनेश्वर और कोच्चि जैसे बड़े औद्योगिक और आवासीय महानगर इस उपग्रह के संभावित पाथवे (मार्ग) के दायरे में आ रहे हैं। इस खबर के सामने आते ही स्थानीय आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों और आम नागरिकों के बीच कौतूहल और चिंता दोनों का माहौल देखा जा रहा है।

हालांकि, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो (ISRO) की तरफ से अब तक इस मामले पर कोई आधिकारिक आपातकालीन बयान जारी नहीं किया गया है। इसरो का टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (ISTRAC) और ‘नेत्रा’ (NETRA) प्रोजेक्ट लगातार भारतीय उपग्रहों और भारतीय वायुसीमा के ऊपर से गुजरने वाले अंतरिक्षीय मलबे की वास्तविक समय में निगरानी करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यद्यपि किसी व्यक्ति या शहरी इमारत पर अंतरिक्षीय मलबे के टुकड़े गिरने की सांख्यिकीय संभावना कई अरबों में एक होती है, लेकिन चूंकि यह 1.5 टन का सैटेलाइट है और इसके रास्ते में भारत के सबसे बड़े महानगर आ रहे हैं, इसलिए नागरिक सुरक्षा एजेंसियों के लिए इस घटनाक्रम की उपेक्षा करना बिल्कुल संभव नहीं है।

नील गेहरेल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी का इतिहास आधुनिक खगोल विज्ञान के सबसे सुनहरे पन्नों में दर्ज है। नासा ने इस बहुउद्देश्यीय वेधशाला को नवंबर 2004 में फ्लोरिडा के केप कैनावेरल एयर फोर्स स्टेशन से डेल्टा II रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया था। इस महत्वाकांक्षी मिशन का मूल उद्देश्य सुदूर ब्रह्मांड में होने वाले सबसे भीषण और शक्तिशाली ऊर्जा विस्फोटों, जिन्हें ‘गामा-रे बर्स्ट’ (GRBs) कहा जाता है, का वास्तविक समय में पता लगाना और उनका विस्तृत अध्ययन करना था। जब यह वेधशाला लॉन्च की गई थी, तब यह अपनी तरह की दुनिया की पहली ‘मल्टीवेवलेंथ’ अंतरिक्ष वेधशाला थी। इसमें तीन अत्याधुनिक वैज्ञानिक टेलीस्कोप एक साथ लगाए गए थे—बर्स्ट अलर्ट टेलीस्कोप (BAT), एक्स-रे टेलीस्कोप (XRT), और अल्ट्रावॉयलेट/ऑप्टिकल टेलीस्कोप (UVOT)। इन तीनों उपकरणों के अद्भुत समन्वय ने खगोलविदों को गामा किरणों, एक्स-रे और दृश्य प्रकाश में एक ही खगोलीय घटना को एक साथ रिकॉर्ड करने की अभूतपूर्व क्षमता दी थी।

अपने 22 वर्षों के शानदार और ऐतिहासिक कार्यकाल के दौरान इस वेधशाला ने विज्ञान जगत को ऐसी जानकारियां प्रदान कीं जिन्होंने ब्रह्मांडीय भौतिकी की कई पुरानी धारणाओं को पूरी तरह बदलकर रख दिया। नासा के खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार, स्विफ्ट ने सुपरमैसिव ब्लैक होल से ऊर्जा प्राप्त करने वाली सक्रिय आकाशगंगाओं के केंद्र, एक्स-रे फ्लेयर्स उत्सर्जित करने वाले रहस्यमयी न्यूट्रॉन तारों, महाविशाल तारों के जीवन के अंतिम क्षणों में होने वाले सुपरनोवा विस्फोटों और हमारे अपने सौर मंडल के भीतर चक्कर काटने वाले बर्फीले धूमकेतुओं व क्षुद्रग्रहों की संरचना को समझने में दुनिया भर के शोधकर्ताओं की अमूल्य मदद की। स्विफ्ट ने हजारों ऐसे क्षणिक प्रकाश स्रोतों को रिकॉर्ड किया जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति और बिग बैंग के बाद के शुरुआती तारों के निर्माण की गुत्थियों को सुलझाने में आज भी मील का पत्थर माने जाते हैं।

नासा के वैज्ञानिकों द्वारा जारी किए गए तकनीकी बुलेटिन के अनुसार, जब यह अंतरिक्ष यान पृथ्वी के घने वायुमंडल के संपर्क में आएगा, तो अत्यधिक घर्षण और थर्मोडायनामिक दबाव के कारण उत्पन्न होने वाली हजारों डिग्री सेल्सियस की गर्मी इसके लगभग 80 प्रतिशत ढांचे को जलाकर भस्म कर देगी। अंतरिक्ष यान के सोलर पैनल्स, हल्के एल्यूमीनियम के फ्रेम और इलेक्ट्रॉनिक सर्किट आसमान में ही पिघल जाएंगे। हालांकि, वेधशाला के भारी ऑप्टिकल लेंस, एक्स-रे शील्डिंग में इस्तेमाल किए गए भारी धातु घटक और मजबूत प्रोपल्शन टैंक वायुमंडलीय प्रवेश को आंशिक रूप से सहन करने की क्षमता रखते हैं। वैज्ञानिकों का आकलन है कि लगभग 10 से 20 प्रतिशत ठोस मलबा, जो दर्जनों अलग-अलग टुकड़ों में बंट चुका होगा, जमीन या समुद्र की सतह से टकरा सकता है।

अमेरिकी अंतरिक्ष कमान और नासा का प्राथमिक अनुमान यही है कि इस बचे हुए मलबे का अधिकांश भाग खुले समुद्र में गिरे, क्योंकि पृथ्वी की सतह का सत्तर प्रतिशत से अधिक हिस्सा पानी से ढका हुआ है। स्पेस फोर्स के वैज्ञानिकों ने गणना की थी कि यह अंतरिक्ष यान चार नवंबर को सुबह लगभग 3:30 बजे के आसपास वातावरण में प्रवेश करेगा, हालांकि वायुमंडलीय खिंचाव और सौर हवाओं की अनियमितता के कारण इसमें 11 घंटे तक की समयावधि का अंतर आ सकता है। विश्वभर की सभी प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियां, जिनमें यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) और जापानी अंतरिक्ष एजेंसी (JAXA) शामिल हैं, अपने ग्राउंड स्टेशनों से इस स्पेसक्राफ्ट के लगातार गिरते ऑर्बिटल पैरामीटर्स को ट्रैक कर रही हैं ताकि यदि कोई बड़ा मलबा घनी आबादी वाले रिहायशी इलाके की ओर बढ़ता दिखे, तो स्थानीय विमानन और आपदा नियंत्रण प्राधिकरणों को समय रहते सतर्क किया जा सके।

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