November 4, 2026 2:08 pm

पहाड़ों में गुलदार का बढ़ता आतंक: 7 साल की मासूम की मौत, कोटद्वार में 8 वर्षीय बच्ची पर हमला, ग्रामीणों ने विधायक को घेरा

पौड़ी/कोटद्वार।

पौड़ी जिले के खांडूसैंण में गुलदार ने घर के आंगन से सात वर्षीय बच्ची को उठाकर मार डाला, वहीं कोटद्वार के सनेह क्षेत्र में आठ वर्षीय बच्ची पर हमला कर उसे घायल कर दिया। लगातार बढ़ते हमलों से ग्रामीणों में दहशत और आक्रोश है। खांडूसैंण में आक्रोशित ग्रामीणों ने मौके पर पहुंचे भाजपा विधायक की गाड़ी को करीब डेढ़ घंटे तक घेरे रखा। ग्रामीण गुलदार को पकड़ने या मारने, प्रभावित परिवार को मुआवजा देने और गांवों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने की मांग कर रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में उत्तराखंड में गुलदार के हमलों में 219 लोगों की मौत और 1,019 लोग घायल हुए हैं।

उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब खतरनाक मोड़ ले चुका है। जंगल से निकलकर गुलदार अब सीधे बस्ती और रिहायशी इलाकों में घुसकर हमले कर रहा है।

ताजा मामला पौड़ी जिले के खांडूसैंण क्षेत्र का है, जहां गुलदार के हमले में सात वर्षीय बच्ची की दर्दनाक मौत के बाद ग्रामीणों का सब्र टूट गया। आक्रोशित ग्रामीणों ने क्षेत्रीय भाजपा विधायक को घेर लिया और करीब डेढ़ घंटे तक उनकी गाड़ी को बंधक बनाए रखा। मौके पर पुलिस के समझाने के बाद भी लोग शांत नहीं हुए।

आंगन से उठा ले गया गुलदार

जानकारी के अनुसार, खांडूसैंण में शाम के समय बच्ची घर के आंगन में थी, तभी घात लगाए बैठे गुलदार ने उस पर हमला कर दिया और उसे घसीटकर झाड़ियों में ले गया। परिजनों के शोर मचाने पर ग्रामीण जुटे, लेकिन तब तक मासूम की मौत हो चुकी थी। इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में दहशत और आक्रोश दोनों फैल गए।

ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले एक साल में पौड़ी, अल्मोड़ा, टिहरी और नैनीताल जिलों में गुलदार के हमलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। पहले गुलदार रात में जंगल के किनारे हमला करता था, लेकिन अब उसका पैटर्न बदल गया है। वह दिन-दहाड़े गांव की बस्ती, बाजार, स्कूल के रास्ते और घरों के आंगन में घुसकर बच्चों और महिलाओं को निशाना बना रहा है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक उत्तराखंड में गुलदार के हमले में 20 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें अधिकतर 5 से 12 वर्ष के बच्चे हैं।

जब विधायक पहुंचे तो फूटा गुस्सा

घटना की सूचना पर जब स्थानीय भाजपा विधायक मौके पर पहुंचे तो ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं का गुस्सा फूट पड़ा। महिलाओं ने विधायक की गाड़ी को चारों ओर से घेर लिया और वन विभाग व सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। ग्रामीणों ने कहा कि कई बार वन विभाग को पिंजरा लगाने और गश्त बढ़ाने की मांग की गई, लेकिन केवल कागजी आश्वासन मिला।

स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि विधायक को सुरक्षा कारणों से करीब डेढ़ घंटे तक अपनी गाड़ी में ही बैठे रहना पड़ा। पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों ने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन आक्रोशित ग्रामीण पुख्ता कार्रवाई की मांग पर अड़े रहे।

ग्रामीणों की मांग है कि आदमखोर घोषित कर गुलदार को तुरंत पकड़ा या मारा जाए, प्रभावित परिवार को 10 लाख का मुआवजा दिया जाए, गांव में सोलर फेंसिंग, स्ट्रीट लाइट और वन विभाग की स्थायी टीम तैनात की जाए।

यह घटना एक बार फिर बताती है कि पहाड़ में पलायन, जंगलों में घटता शिकार और बस्तियों के पास बढ़ती झाड़ियां गुलदार को मानव बस्ती की ओर धकेल रही हैं। यदि समय रहते मानव-वन्यजीव संघर्ष के लिए ठोस नीति नहीं बनी, तो खांडूसैंण जैसी घटनाएं और बढ़ेंगी।

कोटद्वार में भी गुलदार का हमला

लैंसडाउन वन प्रभाग की कोटद्वार रेंज के सनेह क्षेत्र में गुलदार ने एक 8 वर्षीय बच्ची पर हमला कर दिया।
ग्रामीणों के हो हल्ले के बाद गुलदार बच्ची को वहीं छोड़ गया। हमले में बच्ची घायल हो गई, जिसे उपचार के लिए बेस अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
घटना के बाद क्षेत्र में दहशत का माहौल है । ये इलाका कॉर्बेट के अंतर्गत आता है।

10 साल में 219 मौतें, 1019 घायल – आंकड़े डराने वाले

यह कोई अकेली घटना नहीं है। वन विभाग के आंतरिक आंकड़े इस संकट की भयावहता को उजागर करते हैं। 2014 से 2024 के बीच केवल 10 साल में गुलदार के हमलों में उत्तराखंड में 219 लोगों की मौत हुई है और 1,019 लोग घायल हुए हैं। एक अन्य सरकारी रिपोर्ट में यह संख्या 214 मौतें और 1,006 घायल बताई गई है।

यदि पूरे मानव-वन्यजीव संघर्ष को देखें तो तस्वीर और भी चिंताजनक है। मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रो. विशंभर प्रसाद सती के अध्ययन के अनुसार 2000 से 2025 के बीच जंगली जानवरों के हमले में 954 लोगों की मौत हुई, जिसमें 46 प्रतिशत मौतें यानी 438 मौतें अकेले पिछले 6 साल 2020-2025 के बीच हुई हैं। इस अवधि में गुलदार सबसे घातक साबित हुआ है, जिसने 548 लोगों की जान ली और 2,127 लोगों को घायल किया।

एक अन्य आंकड़े के अनुसार जनवरी 2000 से मई 2025 तक कुल 1,241 मौतें वन्यजीव हमलों में हुईं, जिनमें 539 मौतें केवल गुलदार के कारण हुईं।

बस्ती की ओर क्यों आ रहा है गुलदार?

विशेषज्ञों के अनुसार इसके तीन बड़े कारण हैं। पहला, कॉर्बेट और राजाजी में बाघों की संख्या 2018 में 442 से बढ़कर 2023 में 560 से अधिक हो गई है, जिससे बाघों ने जंगल के मुख्य इलाकों पर कब्जा कर लिया है और गुलदार को जंगल से बाहर धकेला है। दूसरा, उत्तराखंड के लगभग 79 प्रतिशत गुलदार अब संरक्षित क्षेत्रों के बाहर रह रहे हैं। तीसरा, पिछले एक दशक में 5 लाख से अधिक लोगों के पहाड़ों से पलायन के कारण हजारों गांव खंडहर बन गए हैं, जहां झाड़ियां उग आई हैं जो गुलदार के लिए आदर्श ठिकाना बन गई हैं।

पौड़ी जिला, जहां सबसे अधिक गुलदार हैं, सबसे अधिक प्रभावित है। अब ग्रामीण सुरक्षा के लिए सोलर फेंसिंग, स्ट्रीट लाइट और पिंजरे लगाने की मांग नहीं, बल्कि स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!