September 29, 2026 2:57 am

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पितृ पक्ष 2026: पूर्वजों की मुक्ति के लिए गया से बद्रीनाथ तक ये 14 पावन धाम हैं बेहद खास

सनातन हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय दिवंगत पूर्वजों, पितरों की आत्मा की शांति, उनके मोक्ष और त्रिप्ति के लिए समर्पित सबसे पवित्र काल माना जाता है। साल 2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर से शुरू हो चुका है और इसका समापन 10 अक्टूबर 2026 को ‘सर्वपितृ अमावस्या’ के महान पर्व पर होगा। इन 16 दिनों के श्राद्ध पक्ष के दौरान देश-विदेश से श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन की परंपरा का पूरी श्रद्धा के साथ निर्वहन करते हैं। हिंदू धार्मिक शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, किसी भी पवित्र नदी के तट, सरोवर, झील या प्राचीन तीर्थ स्थल के प्रांगण में श्राद्ध कर्म करने का फल अनंत गुना अधिक प्राप्त होता है।

भारत भूमी पर ऐसे कई ऐतिहासिक और आत्मीय रूप से जुड़े पावन धाम मौजूद हैं, जिन्हें साक्षात मोक्ष और पितृ मुक्ति का द्वार कहा जाता है। गया के फल्गु तट से लेकर हिमालय की गोद में बसे बद्रीनाथ धाम तक, देश के ये 14 प्रमुख तीर्थस्थल पितृ दोष से मुक्ति और पूर्वजों के आशीर्वाद प्राप्ति के लिए सर्वोच्च माने गए हैं। यदि आप भी इस पितृ पक्ष अपने पूर्वजों का पिंडदान या श्राद्ध कर्म करने की योजना बना रहे हैं, तो इन 14 पावन तीर्थों का धार्मिक और पौराणिक महत्व आपके लिए जानना बेहद जरूरी है।

बिहार राज्य में स्थित गया जिला संपूर्ण विश्व में पिंडदान और श्राद्ध कर्म के लिए सबसे प्रमुख और पवित्र तीर्थ माना जाता है। यहां बहने वाली फल्गु नदी को हिंदू धर्म में बेहद पवित्र दर्जा प्राप्त है। वायु पुराण के अनुसार, फल्गु नदी को साक्षात भगवान विष्णु का रूप माना गया है। देश-दुनिया से लाखों तीर्थयात्री अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए गयाजी पहुंचते हैं। फल्गु नदी के किनारे लगभग 48 विशेष चबूतरे बने हुए हैं, जहां विद्वान पंडाओं और ब्राह्मणों की देखरेख में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान कराया जाता है। मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों को जन्म-मजन्तर के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है।

दुनिया के सबसे प्राचीन जीवंत शहरों में शुमार वाराणसी (काशी) अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक भव्यता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। पंचांग और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, काशी मोक्ष की नगरी है। पितृ पक्ष के दौरान वाराणसी में मां गंगा के प्राचीन घाटों पर पिंडदान, तर्पण और महाब्राह्मणों को दान-पुण्य करने का अनुष्ठान किया जाता है। गंगा नदी के तट पर बैठकर किया गया श्राद्ध कर्म पितरों को सीधे बैकुंठ लोक की प्राप्ति कराता है, यही कारण है कि यहां पूरे साल देश के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं।

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक तीर्थ नगरी प्रयागराज, जिसे प्राचीन काल में इलाहाबाद कहा जाता है, हिंदू सनातन धर्म के प्रत्येक अनुयायी के लिए जीवन में कम से कम एक बार जाने योग्य अनिवार्य तीर्थ है। गंगा, यमुना और गुप्त सरस्वती के पवित्र मिलन स्थल ‘त्रिवेणी संगम’ के पावन जल में स्नान और तर्पण करने से समस्त पाप और पितृ बाधाएं नष्ट हो जाती हैं। पितृ पक्ष के दौरान संगम तट पर हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों के नाम का संकल्प लेकर पिंडदान करते हैं और उनकी आत्मा की तृप्ति की प्रार्थना करते हैं।

देवभूमि उत्तराखंड में स्थित हरिद्वार सनातन संस्कृति में आस्था रखने वालों के लिए सबसे पूजनीय स्थलों में से एक है। यहीं से पवित्र गंगा मैया मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार के हर की पौड़ी और अन्य प्रमुख घाटों पर पितृ पक्ष के दौरान विशेष तर्पण और पिंडदान के आयोजन होते हैं। ऐसा विश्वास है कि हरिद्वार में विधि-विधान से श्राद्ध कर्म करने से पितर अपनी पीढ़ियों को आरोग्यता और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक नगरी उज्जैन, जिसे प्राचीन काल में अवंतिका कहा जाता है, पवित्र क्षिप्रा नदी के तट पर बसी है। वेदों और पुराणों में क्षिप्रा नदी को पावन सलिला और दिवंगत आत्माओं को शांति प्रदान करने वाली नदी बताया गया है। इस स्थल को शक्तिभया तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान क्षिप्रा नदी के घाटों पर पिंडदान करने से पूर्वजों की अशांत आत्मा को तृप्ति और परलोक में उत्तम गति की प्राप्ति होती है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की पावन जन्मस्थली अयोध्या में सरयू नदी के तट पर स्थित राम पैड़ी और आसपास के घाट पितृ कार्यों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। सरयू नदी के तट पर स्थित भरत कुंड का भी श्राद्ध कर्म में विशेष स्थान है। मान्यताओं के अनुसार, सरयू नदी के जल में स्नान करने और यहां पितरों के निमित्त तर्पण करने से कुल के सभी पितृ प्रसन्न होकर अपने परिजनों को सुख-समृद्धि का वरदान देते हैं।

हिमालय की वादियों में भगवान विष्णु के धाम बद्रीनाथ के पास स्थित अलकनंदा नदी के किनारे प्रसिद्ध ‘ब्रह्म कपाल घाट’ मौजूद है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति इसी स्थान पर मिली थी। यही कारण है कि बद्रीनाथ धाम को पितरों के मोक्ष के लिए सबसे अचूक और अंतिम तीर्थ माना जाता है। यहां ब्रह्म कपाल पर पिंडदान करने से पितरों का पुनर्जन्म का चक्र हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है और उन्हें सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

भगवान श्रीकृष्ण की पावन द्वारका नगरी गोमती नदी के तट पर बसी हुई है। गोमती घाट पर देश के पश्चिमी हिस्से से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि समुद्र तट और गोमती के संगम पर पिंडदान करने से कुल के वे पितर भी तृप्त हो जाते हैं जो किसी अकाल मृत्यु या दुर्घटना का शिकार हुए थे।

ओडिशा का जगन्नाथ पुरी धाम भगवान जगन्नाथ की पावन लीलाओं के साथ-साथ पितृ कर्मों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ है। यहां भार्गवी नदी और महानदी के पवित्र संगम स्थल पर तीर्थयात्री स्नान करके अपने सांसारिक बंधनों से मुक्त होते हैं। दक्षिण और पूर्वी भारत के तमाम श्रद्धालु विशेष रूप से पितृ पक्ष के दिनों में पुरी पहुंचकर अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के थानेसर में स्थित ‘सन्निहित सरोवर’ हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र जल भंडार माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस सरोवर को सात पवित्र सरस्वती नदियों का संगम स्थल माना गया है। सूर्य ग्रहण और पितृ पक्ष के विशेष अवसरों पर यहां स्नान करने और दिवंगत रिश्तेदारों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है।

भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली मथुरा में विश्रांति तीर्थ, बोधिनी तीर्थ और वायु तीर्थ जैसे कई पवित्र स्थल हैं, जहां पूरे वर्ष भर दिवंगत आत्माओं के लिए धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। ब्रज भूमि की पावन धूल में पिंडदान करने से पितरों को भगवान श्री कृष्ण के चरणों में स्थान प्राप्त होता है, ऐसी सनातन मान्यता है।

राजस्थान के रेगिस्तानी आंचल में बसा पुष्कर शहर अपने प्राचीन पुष्कर सरोवर और उसके चारों ओर बने 52 पवित्र घाटों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस पवित्र झील के जल में स्नान करने से समस्त पाप धुल जाते हैं। इसके साथ ही जन्म और पुनर्जन्म के दुखों से छुटकारा पाने तथा पितरों को तृप्त करने के लिए पुष्कर के घाटों पर विशेष पिंडदान अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।

गुजरात के पाटन जिले में स्थित सिद्धपुर शहर विशेष रूप से पितरों और माताओं के श्राद्ध कर्म के लिए देश भर में विख्यात है। सरस्वती नदी के तट पर स्थित यह स्थान मातृ-ऋण से मुक्ति पाने और दिवंगत माताओं की आत्मा की शांति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों का सबसे प्रमुख केंद्र माना जाता है।

उज्‍जैन में शिप्रा नदी के तट पर स्थित प्राचीन ‘सिद्धवट’ (बरगद का पेड़) को अमर वटवृक्ष माना गया है। माता पार्वती द्वारा इस वट को कभी न सूखने का वरदान दिया गया था। गया और प्रयागराज की तरह ही उज्जैन के सिद्धवट पर किया जाने वाला पिंडदान पितरों को अमोघ फल प्रदान करता है। पितृ पक्ष के इन 16 दिनों में इन 14 पावन धामों में से किसी एक या अपनी सुविधा के अनुसार नजदीकी पवित्र नदी के तट पर श्रद्धापूर्वक तर्पण करने से पितृगण वर्ष भर प्रसन्न रहते हैं।

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