September 6, 2026 9:45 pm

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12 साल में होने वाली हिमालय की महाकुंभ यात्रा: आस्था, परंपरा और विरासत की जीवंत पहचान ‘मां नंदा राजजात’

!! मां नन्दा राजजात यात्रा एक परम्परागत विरासत!!
(डॉ कमल किशोर डुकलान ‘सरल’)

भारतवर्ष के सभी भौगोलिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों का अध्ययन करने से पता चलता है,कि लोक इतिहास को अपने अनुभव के आधार पर अधिक प्रमाणित, सटिक और सामान्य लोगों के जुड़े सम्बन्धित सही घटनाएं हैं।

लिखित इतिहास व्यक्ति या परिवार विशेष पर केन्द्रित होता है। बाबरनामा, अकबरनामा, शाहजहाँनामा इत्यादि जितने भी इतिहास हैं सभी कहीं न कहीं तथ्य को राजा के हित को ध्यान में रखकर राज्य से पोषित विद्वान या दरबारी के द्वारा लिख गये हैं। अमीर खुसरों दिल्ली के सात राजाओं के मंत्री एवं सलाहकार रहे हैं। एक बार उन्होंने अपने पुत्र के सामने इस तथ्य को स्वीकार किया कि नहीं चाहते हुए भी उन्हें अकर्मन्य एवं गलत राजा के बारे में बहुत अच्छी बातें लिखनी पड़ी।

पश्चिम बंगाल के बिस्नूम जनपद के केन्डुली मेले के बारे में सभी जानते ही होंगे। यह मेला गंगासागर मेला के पश्चात् पश्चिम बंगाल का सबसे विशाल मेला होता है। प्रति वर्ष 14 जनवरी मकर संक्रान्ति से प्रारम्भ होने वाले इस सात दिवसीय मेला में लगभग साढ़े पाँच लाख लोग भाग लेते है।

पश्चिम बंगाल एवं बंगलादेश के बाऊल साधुओं का तो यह एक प्रकार से मक्का है। प्रति वर्ष मेला के दौरान बाऊल साधुओं के एक हजार से अधिक अखाड़े लगते है। यह मेला गीतगोविन्द के रचनाकार जयदेव से भी जुड़ा है। लोगों का विश्वास है कि जयदेव का जन्म केन्डुली गाँव में हुआ था। अगर मेले के लोक इतिहास को देखें तो शैव, शाक, वैष्णव, तंत्र एवं बाऊल साधुओं के बीच सामंजस्य का यह एक अनूठा स्थान है।

लोक इतिहास के अनुसार 12 वर्षों में उत्तराखंड के गढ़ कुमाऊं की संस्कृति को जोड़ने वाली हिमालय कुंभ के नाम से जाना जाता है। यात्रा उत्तराखंड पर्यटन के अनुसार गढ़वाल और कुमाऊं की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जो दोनों क्षेत्रों के लोगों को आपस में जोड़ती है।

नंदा राजजात उत्तराखंड की सबसे प्राचीन, कठिन और पवित्र धार्मिक यात्राओं में से एक है। मां नंदा नन्द गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुँमाऊ के कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थी। ईष्टदेवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी को पार्वती की बहन के रुप में देखा जाता है। पूरे उत्तराखंड में समान रुप से पूजे जाने के कारण नन्दादेवी के समस्त प्रदेश में धार्मिक एकता के सूत्र के रुप में देखा जाता है। मान्यता के अनुसार नन्दादेवी दक्ष प्रजापति की सात कन्याओं में से एक थीं।

नन्दादेवी का विवाह शिव के साथ होना माना जाता है। शिव के साथ ऊँचे बर्फीले पर्वतों पर नन्दादेवी रहती हैं। पति के साथ होने के सुख के बदले भीषण से भीषण कष्ट वह हंसकर सह लेती है। कहीं-कहीं नन्दादेवी को पार्वती का रुप ही माना गया है। शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी मां नंदा के अनेक नामों में प्रमुख है।

7वीं शताब्दी में गढ़वाल के राजा शालिपाल ने राजधानी चांदपुर गढ़ी से देवी श्रीनंदा को 12वें वर्ष में मायके से कैलास भेजने की परंपरा शुरू की। राजा कनकपाल ने इस यात्रा को भव्य रूप दिया। इस परंपरा का निर्वहन 12 वर्ष या उससे अधिक समय के अंतराल में गढ़वाल राजा के प्रतिनिधि कांसुवा गांव के राज कुंवर, नौटी गांव के राजगुरु नौटियाल ब्राह्मण सहित 12 थोकी ब्राह्मण और चौदह सयानों के सहयोग से होता है।

उत्तराखंड में देवताओं की स्तुति में रात-दिन जगकर गाए जाने वाले गीत को जागर कहते हैं। नन्दादेवी के सम्बन्ध में कई जागरों के अनुसार विभिन्न कथाएँ पायी जाती है। एक जागर में नन्दा को नन्द महाराज की बेटी बताया जाता है। कहते हैं कि देवकी और वसुदेव के कारागार में कृष्ण जन्म से पूर्व नंद महाराज की पुत्री कंस के हाथों से निकलकर आकाश में उड़कर नगाधिराज हिमालय की पत्नी मैना की गोद में पहुँच गई थी।

हम जानते हैं कि गढ़वाल में बावन गढ़ हैं। एक जागर में नन्दादेवी को चान्दपुर गढ़ के राजा भानुप्रताप की पुत्री बताया जाता है। एक और जागर में ऐसा वर्णन आता है कि नन्दादेवी का जन्म ॠषि हिमवंत और उनकी पत्नी मैना के घर पर हुआ था। यह सब अलग-अलग धारणायें होते हुए भी नन्दादेवी पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के लोक मानस की एक दृढ़ आस्था का प्रतीक है तथा इस परम्परा के अनुसार हर बारहवें वर्ष में नंदा राजजात यात्रा का भव्य आयोजन होता है। यह यात्रा इस वर्ष चार सितम्बर से प्रारंभ हो चुकी है।

नन्दा राजजात का अर्थ है मां राज राजेश्वरी नन्दादेवी की यात्रा। गढ़वाल क्षेत्र में देवी देवताओं की जात बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। जात का अर्थ होता है देवयात्रा। लोक विश्वास यह है कि नन्दा देवी हिन्दी माह के भाद्रपद के कृष्णपक्ष में अपने मैत (मायके) पधारतीं हैं। कुछ दिन के पश्चात उन्हें अष्टमी को मायके से विदा किया जाता है।

राजजात या नन्दाजात देवी नन्दा की अपने मायके से एक सजीं संवरी दुल्हन के रुप में ससुराल जाने की यात्रा है। ससुराल को स्थानीय भाषा में सौरास कहते हैं। इस अवसर पर नन्दादेवी को सजाकर डोली में बिठाकर एवं वस्र, आभूषण, खाद्यान्न, कलेवा, दूज, दहेज आदि उपहार देकर पारम्परिक रुप में जो भी गढ़वाल के रीति-रिवाज हैं उसके अनुसार मां नंदा को विदा किया जाता है।

वैसे तो हर साल नन्दाजात का आयोजन की प्रथा है परन्तु बारहवें वर्ष पर भव्य और मनोरंजक राजजात किया जाता है। नन्दाजात प्रतिवर्ष शुक्ल अष्टमी के दिन मनाई जाती है। नन्दा अष्टमी के दिन नन्दा को डोली में बिठाकर विदा किया जाता है। नैनीताल, वैजनाथ और अल्मोड़ा में विशेष धूमधाम से यह उत्सव मनाया जाता है।

नैनीताल का प्रसिद्ध नन्दा-सुनन्दा मेला प्रतिवर्ष आयोजन किया जाता है जिसमें नन्दा-सुनन्दा बहनों की विशिष्ट और अनूठी केले के पेड़ से बनी मूर्तियों को- जो कि समस्त भारत में केवल कुमाऊँ में ही बनाई जाती है- डोले में बिठाकर घुमाया जाता है। अनतत: मूर्ति को नैनी झील में विसर्जित कर दिया जाता है।

नंदा राजजात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि हिमालयी समाज की आस्था, परंपरा और प्रकृति-पूजन का यह जीवंत प्रतीक है। यह यात्रा उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, इतिहास और देवी-भक्ति की अद्भुत मिसाल है।

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