बृजेन्द्र मिश्रा. भोपाल27 मिनट पहले

ई-अटेंडेंस नहीं लगाने पर वेतन काटे जाने का विरोध स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह से किया गया
मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में ई-अटेंडेंस सिस्टम लागू करने के फैसले पर सरकार किसी भी तरह की रियायत देने के मूड में नहीं है. स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह के हालिया बयान के बाद भी शिक्षक संगठन लगातार इसका विरोध कर रहे हैं.
मंत्री ने साफ कहा है कि जब शिक्षक पूरे दिन मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं तो ई-अटेंडेंस लगाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. इस बीच शिक्षक संगठनों का कहना है कि वे ई-अटेंडेंस के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से लागू किया जाना चाहिए.
साथ ही शिक्षकों के निजी मोबाइल फोन, इंटरनेट और सिम कार्ड के इस्तेमाल पर भी सरकार को स्पष्ट नीति बनानी चाहिए. दो दिन पहले स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने बैतूल दौरे के दौरान कहा था कि ई-अटेंडेंस लागू करने में कोई दिक्कत नहीं है.
उन्होंने कहा, 'जब शिक्षक पूरे दिन मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं तो ई-अटेंडेंस लगाने में क्या दिक्कत है?' मंत्री ने कहा कि जहां भी नेटवर्क की समस्या है, सरकार उसका समाधान ढूंढने का प्रयास कर रही है और ऐसे स्थानों पर तैनात शिक्षकों की गरिमा और व्यावहारिक कठिनाइयों पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है.
उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में हाल के दिनों में लगभग 1,000 स्थानों पर नेटवर्क से संबंधित समस्याएं सामने आईं, लेकिन उन स्थानों पर तैनात किसी भी शिक्षक का वेतन नहीं काटा गया. सरकार का दावा है कि तकनीकी दिक्कतों के कारण किसी भी कर्मचारी के साथ अन्याय नहीं होगा.

शिक्षक संघ ने कहा- वेतन कटौती और दंडात्मक कार्रवाई अनुचित
मध्य प्रदेश टीचर्स एसोसिएशन ने भी लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा ई-अटेंडेंस के संबंध में जारी आदेश पर गंभीर आपत्ति जताते हुए स्कूल शिक्षा एवं परिवहन मंत्री उदय प्रताप सिंह को ज्ञापन सौंपा है।
एसोसिएशन ने मांग की है कि 1 जुलाई, 2026 को जारी आदेश, जिसमें ई-अटेंडेंस दर्ज नहीं होने पर वेतन कटौती और संबंधित आहरण एवं संवितरण अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक और निलंबन की कार्रवाई का प्रावधान है, को तुरंत रद्द किया जाए।
एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. क्षत्रवीर सिंह राठौड़, प्रदेश महासचिव राकेश गुप्ता एवं प्रांतीय कोषाध्यक्ष विनोद कुमार पुनी ने कहा कि विभाग ने स्वयं माना है कि प्रदेश के लगभग 90 प्रतिशत विद्यालयों में ई-अटेंडेंस सफलतापूर्वक दर्ज की जा रही है तथा अधिकांश जिलों में इसकी सफलता दर 94 से 95 प्रतिशत है।
इसके बावजूद बाकी तकनीकी कारणों से उत्पन्न समस्याओं के लिए शिक्षकों को दोषी ठहराना और उनका वेतन काटना उचित नहीं है।

'व्यावहारिक-तकनीकी और मानवीय पहलुओं की उपेक्षा'
ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन मध्य प्रदेश के अध्यक्ष डीके सिंगौर ने ई-अटेंडेंस को लेकर कहा- सरकार अगर ई-अटेंडेंस जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर पारदर्शिता बढ़ाना चाहती है तो उसके उद्देश्य पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती. हालाँकि, ई-अटेंडेंस को जिस रूप में लागू किया जा रहा है, उसमें कई व्यावहारिक, तकनीकी और मानवीय पहलुओं की अनदेखी होती दिख रही है।

मशीन के आधार पर अनुपस्थिति मानना गलत है
केवल मशीन की उपस्थिति रिपोर्ट के आधार पर किसी शिक्षक को अनुपस्थित मानना और उनका पक्ष सुने बिना वेतन कटौती जैसी कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। सिंगौर का कहना है कि एक शिक्षक की जिम्मेदारी कक्षा में पढ़ाने तक ही सीमित नहीं है। उन्हें कई प्रशासनिक और सरकारी कार्य भी करने पड़ते हैं.
अक्सर उन्हें विभागीय बैठकों, प्रशिक्षण, सर्वेक्षण, परीक्षा संबंधी कार्य, चुनाव कर्तव्य, छात्र हित में सामुदायिक समन्वय और आवश्यक विद्यालय व्यवस्थाओं के लिए विद्यालय परिसर से बाहर भी जाना पड़ता है।
सॉलिसिटर जनरल के जरिए सुप्रीम कोर्ट से इजाजत मांगी गई है
स्कूल शिक्षा मंत्री सिंह ने शिक्षक पात्रता परीक्षा को लेकर कहा है कि 2005 से 2009 के बीच परीक्षा देने वाले शिक्षकों के मामले में सॉलिसिटर जनरल के माध्यम से कोर्ट से अनुमति मांगी गई है. कहा गया है कि इन शिक्षकों को सरकार की पात्रता परीक्षा के आधार पर नौकरी मिली है. अगर कोर्ट ने रियायत दी तो ठीक, नहीं तो परीक्षा करानी पड़ेगी.








